‘कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हम दूर से निहारते हैं और उनसे प्रेरित होते हैं, और कुछ ऐसे, जिनसे हमें जीवन में मिलने का सौभाग्य मिलता है। ब्रॉड पीक की इस त्रासदी ने मुझसे दोनों लोग छीन लिए।’
पाकिस्तान के ब्रॉड पीक (8,051 मीटर) पर आया विनाशकारी हिमस्खलन पर्वतारोहण के इतिहास की सबसे हृदयविदारक घटनाओं में से एक बन गया। कुछ ही क्षणों में दुनिया ने दस ऐसे साहसी पर्वतारोहियों को खो दिया, जिन्होंने अपना पूरा जीवन ऊँचाइयों से संवाद करने, अपनी सीमाओं को चुनौती देने और असंभव को संभव बनाने में समर्पित कर दिया था।
यह केवल दस लोगों की मृत्यु नहीं है। यह दस सपनों, दस परिवारों, दस अधूरी यात्राओं और अनगिनत प्रेरणाओं का एक साथ मौन हो जाना है। आज केवल नेपाल, पाकिस्तान, अमेरिका, ओमान और चीन ही नहीं, बल्कि पूरा वैश्विक पर्वतारोहण समुदाय शोक में डूबा हुआ है।
आख़िर ब्रॉड पीक पर हुआ क्या था?
कराकोरम पर्वतमाला में स्थित ब्रॉड पीक (8,051 मीटर) दुनिया की बारहवीं सबसे ऊँची चोटी है और तकनीकी दृष्टि से बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। अभियान के अंतिम चरण में, जब पर्वतारोहियों की टीम शिखर की ओर बढ़ रही थी, तभी अचानक आए एक भीषण हिमस्खलन ने पूरी टीम को अपनी चपेट में ले लिया। कुछ ही क्षणों में अनुभवी पर्वतारोही बर्फ़ के अथाह समुद्र में समा गए।
अत्यधिक ऊँचाई, लगातार खराब मौसम, तेज़ हवाएँ और हिमस्खलन का ख़तरा बचाव अभियान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ बन गए। हर संभव प्रयास के बावजूद किसी को भी जीवित नहीं बचाया जा सका। इस एक दुर्घटना ने न केवल दस अनमोल जीवन छीन लिए, बल्कि पर्वतारोहण जगत को यह भी याद दिलाया कि वर्षों का अनुभव, असाधारण कौशल और अटूट साहस भी प्रकृति की विराट शक्ति के सामने कभी-कभी असहाय हो जाते हैं।
श्रद्धांजलि उन दस अमर आत्माओं को
निर्मल “निम्सदाई” पुर्जा – नेपाल
युक्ता गुरुंग – नेपाल
निमा शेर्पा – नेपाल
ग्यालु शेर्पा – नेपाल
न्वांग थेंडु शेर्पा – नेपाल
किली पेम्बा शेर्पा – नेपाल
सोहेल साखी – पाकिस्तान
मैलोरी गीस – संयुक्त राज्य अमेरिका
नादिरा अल हार्ती – ओमान
वांग ज़ोंग – चीन
ये केवल दस नाम नहीं हैं। ये साहस, समर्पण, विश्वास और मानव जिजीविषा की दस अमर गाथाएँ हैं। अलग-अलग देशों, भाषाओं और संस्कृतियों से आए ये लोग अंततः पर्वतों की गोद में एक ही परिवार बन गए। आज पूरा विश्व उनकी स्मृति को नमन कर रहा है।
निर्मल “निम्सदाई” पुर्जा: जिन्होंने ‘असंभव’ शब्द के मायने बदल दिए
यदि इस त्रासदी में किसी ने पूरी दुनिया को सबसे अधिक झकझोरा है, तो वह नाम है- निर्मल “निम्सदाई” पुर्जा।
नेपाल के एक साधारण परिवार से निकलकर दुनिया के सबसे महान पर्वतारोहियों में अपनी पहचान बनाना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। ब्रिटिश गोरखा रेजिमेंट से लेकर यूनाइटेड किंगडम की प्रतिष्ठित स्पेशल बोट सर्विस (SBS) तक का उनका सफर अनुशासन, साहस और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक था।
फिर आया वर्ष 2019, जब उन्होंने केवल 6 महीने और 6 दिनों में दुनिया की सभी 14 आठ-हज़ारी चोटियों पर चढ़कर इतिहास रच दिया। जिसे पर्वतारोहण जगत कभी असंभव मानता था, उसे उन्होंने अपनी मेहनत और संकल्प से संभव बना दिया।
इसके बाद उन्होंने बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के सभी 14 आठ-हज़ारी चोटियों का आरोहण पूरा किया और ‘किलर माउंटेन’ कही जाने वाली K2 पर्वत चोटी की पहली शीतकालीन सफल चढ़ाई करने वाली ऐतिहासिक नेपाली टीम का नेतृत्व किया।
अपने अंतिम अभियान तक वे 57 बार 8,000 मीटर से अधिक ऊँची चोटियों पर सफलतापूर्वक आरोहण कर चुके थे। यह केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उनकी अद्भुत क्षमता, अनुशासन और अटूट समर्पण का प्रमाण था लेकिन निम्सदाई की विरासत केवल रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रही।
उन्होंने अपनी असाधारण यात्रा को “Beyond Possible” नामक पुस्तक में दर्ज किया, जिसने दुनिया भर के युवाओं को बड़े सपने देखने का साहस दिया। उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि पर आधारित Netflix की चर्चित डॉक्यूमेंट्री “14 Peaks: Nothing Is Impossible” ने लाखों लोगों को यह विश्वास दिलाया कि इच्छाशक्ति के सामने कुछ भी असंभव नहीं है।
उनकी एक पंक्ति आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है-
”Giving up is not in the blood, Sir… it’s not in the blood.”
उन्होंने इसे केवल कहा नहीं, बल्कि अपने जीवन के हर अभियान में जीकर भी दिखाया।
मेरे लिए निम्सदाई केवल एक महान पर्वतारोही नहीं थे। उनसे कभी मिलने का अवसर नहीं मिला, लेकिन मेरे पर्वतारोहण के सफर में वे हमेशा सबसे बड़ी प्रेरणा बने रहे। उन्होंने मुझे और मेरी तरह अनगिनत लोगों को सिखाया कि सबसे ऊँचा पर्वत बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है और उसे पार करने का साहस भी हमें स्वयं ही जुटाना होता है।
सोहेल साखी: जिनका दिल सरहदों से कहीं बड़ा था
लेकिन इस त्रासदी में एक नाम ऐसा भी है, जिसने इस घटना को मेरे लिए बेहद व्यक्तिगत बना दिया। सोहेल साखी से मेरी मुलाकात “मेरा पीक” अभियान के दौरान खारे गाँव में हुई थी। एक आत्मीय बातचीत ने उस परिचय को दोस्ती में बदल दिया, और यह दोस्ती उनकी आख़िरी साँस तक कायम रही। कुछ लोग जीवन में कम समय के लिए आते हैं, लेकिन ऐसी स्मृतियाँ छोड़ जाते हैं जो जीवन भर साथ रहती हैं। सोहेल उन्हीं लोगों में से एक थे।
हम केवल दो पर्वतारोहियों की तरह नहीं मिले थे। हम दो पड़ोसी देशों से थे, लेकिन हमारी असली पहचान पहाड़ों ने तय की थी।
बातों-बातों में उन्होंने मुस्कुराते हुए, लेकिन भीतर छिपे दर्द के साथ कहा- “सियासी सरहदों ने क्या कर डाला, माधवी… इन सरहदों ने पहाड़ भी बाँट डाले।” उनके ये शब्द आज भी मेरे भीतर गूँजते हैं।विदा होने से पहले उन्होंने कहा था- “माधवी, तुम जब भी पाकिस्तान आओ, हुन्ज़ा में मेरे हॉस्टल को तुम्हारा इंतज़ार रहेगा।”
हमने एक-दूसरे को सुरक्षित वापसी की शुभकामनाएँ देते हुए विदा ली, इस विश्वास के साथ कि किसी न किसी पर्वत पर फिर मुलाक़ात होगी लेकिन नियति ने वह अवसर मुझसे हमेशा के लिए छीन लिया।
आज जब मैं उन्हें याद करती हूँ, तो महसूस होता है कि पर्वतों पर बनने वाले रिश्ते पासपोर्ट, वीज़ा और राजनीतिक सीमाओं से कहीं बड़े होते हैं।
सोहेल, आप सही कहते थे- “सियासी सरहदों ने पहाड़ भी बाँट डाले।” लेकिन एक बात शायद सरहदें कभी नहीं बाँट पाएँगी- पर्वतों से प्रेम करने वालों के दिल।
अंतिम प्रणाम
ब्रॉड पीक ने इन दस महान आत्माओं को हमसे छीन लिया है, लेकिन उनका साहस, उनका जीवन और उनकी कहानियाँ किसी हिमस्खलन के नीचे दब नहीं सकतीं।
जब भी कोई युवा पर्वतारोही पहली बार अपने जूते बाँधेगा, जब भी कोई बर्फ़ीली ढलान पर डर और विश्वास के बीच खड़ा होगा, जब भी कोई किसी असंभव लगने वाले शिखर की ओर पहला कदम बढ़ाएगा-कहीं न कहीं निम्सदाई की आवाज़ उसके भीतर गूँजेगी-
“Giving up is not in the blood, Sir.” और शायद उसी क्षण कराकोरम की किसी ठंडी हवा के साथ सोहेल की वह आत्मीय मुस्कान भी याद आएगी, जो कहती थी-
“धीरे चलना… पहाड़ हमेशा जल्दी करने वालों की परीक्षा लेते हैं।” इन दस लोगों ने केवल शिखरों पर चढ़ाई नहीं की। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि साहस कैसा होता है, दोस्ती कैसी होती है और सपनों की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती।
निम्सदाई नेपाल से थे, सोहेल पाकिस्तान से थे, मैलोरी अमेरिका से थीं, नधीरा ओमान से थीं और वांग झोंग चीन से थे। लेकिन पहाड़ों पर उनकी पहचान केवल एक थी-वे पर्वतारोही थे। शायद यही कारण है कि उनके जाने का दुःख भी पूरी दुनिया का दुःख बन गया।
आज ब्रॉड पीक की ढलानों पर बर्फ़ पहले जैसी ही होगी। हवा पहले की तरह बह रही होगी। सूरज भी हर सुबह उसी तरह उगेगा। बदला है तो बस इतना कि अब उन हवाओं में दस मज़बूत आवाज़ें कम हैं। दस मुस्कुराते चेहरे कम हैं। दस परिवार आज भी उस दस्तक का इंतज़ार कर रहे हैं, जो अब कभी नहीं होगी।
इतिहास इन दस नामों को एक दुर्घटना के रूप में दर्ज करेगा। लेकिन पर्वतों से प्रेम करने वाले लोग इन्हें साहस, विनम्रता और मानवीय आत्मा की उन अमर कहानियों के रूप में याद रखेंगे, जिन्होंने हमें सिखाया कि ऊँचाई केवल शिखरों की नहीं, बल्कि साहस, चरित्र और इंसानियत की भी होती है।










