जनवरी 2025 में नवादा जिले के वारिसलीगंज थाना क्षेत्र के चैनपुरा गांव में लोगों ने अडानी समूह की कंपनी अंबुजा सीमेंट के प्लांट का जमकर विरोध किया। विरोध के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज में दर्जनों ग्रामीण घायल हो गए।
यह विरोध तब शुरू हुआ जब अंबुजा सीमेंट की निर्माणाधीन सीमेंट ग्राइंडिंग यूनिट को 133 केवी हाई वोल्टेज बिजली आपूर्ति के लिए पोल और टावर लगाने का काम शुरू किया गया।
स्थानीय निवासी आशुतोष कुमार के अनुसार, सीमेंट प्लांट के लिए बिजली की लाइन गांव के पश्चिमी हिस्से से गुजर रही है, जहां ग्रामीणों की निजी खेती और आवासीय भूमि है। उनका कहना है कि इसके लिए न तो ग्रामीणों की सहमति ली गई और न ही उचित मुआवजा दिया गया। ग्रामीणों की अनुमति के बिना ही पोल गाड़े जा रहे हैं। इससे उनकी जमीन का मूल्य घट जाएगा और भविष्य में वह जमीन उनके किसी काम की नहीं रह जाएगी।
गांव के लोग इसे ‘जबरन भूमि हड़पने’ की साजिश बता रहे हैं। उनका कहना है कि बड़े कॉरपोरेट के सामने गरीब किसानों की जमीन और उनकी आवाज दोनों कुचली जा रही हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे आंदोलन तेज करेंगे।

इस घटना के लगभग एक महीने बाद गौतम अडानी भागलपुर जिले के पीरपैंती पहुंचे, जहां उनकी कंपनी 2400 मेगावाट क्षमता का अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट स्थापित कर रही है। बिहार के पीरपैंती प्रखंड में बन रहा यह प्रोजेक्ट राज्य में कई दशकों का सबसे बड़ा निजी औद्योगिक निवेश माना जा रहा है।

सरकार का कहना है कि यह परियोजना बिहार की ऊर्जा संरचना को मजबूत करेगी और राज्य को औद्योगिक मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिलाने में सहायक होगी। अडानी का यह दौरा भी औद्योगिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
‘एक रुपये में एक हजार एकड़’ जमीन का मामला
पीरपैंती का यह प्रोजेक्ट पहले भी काफी चर्चा में रहा है। गौतम अडानी की कंपनी अडानी पाॅवर को बिहार सरकार ने थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए करीब 1000 एकड़ जमीन 25 वर्षों के लिए लीज पर दी है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस परियोजना के लिए कुल 1020 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई है। इसमें से 988.335 एकड़ जमीन किसानों की है, जबकि शेष जमीन बिहार सरकार और रेलवे की है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2015-16 तक लगभग 80 प्रतिशत जमीन मालिकों को मुआवजा दे दिया गया था। सरकार का दावा है कि जुलाई 2025 तक 97 प्रतिशत जमीन मालिकों को मुआवजा मिल चुका है।
फरवरी 2025 में बिहार सरकार ने भागलपुर के पीरपैंती में 2400 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट की परियोजना को नए सिरे से प्रस्तावित किया था।
फरवरी 2025 में बिहार सरकार ने नए सिरे से भागलपुर के पीरपैंती में 2400 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट लगाने की परियोजना प्रस्तावित की थी।

राज्य सरकार ने तय किया कि यह थर्मल प्लांट टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग यानी बोली प्रक्रिया के माध्यम से लगाया जाएगा।
16 जुलाई 2025 को ऑनलाइन नीलामी में बिजली बेचने के लिए अडानी पाॅवर ने सबसे कम बोली 6.075 रुपये प्रति किलो वाट-घंटा लगाकर यह प्रोजेक्ट हासिल कर लिया।
सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी को लगभग 1000 एकड़ जमीन एक रुपये सालाना किराये पर 25 वर्षों के लिए लीज पर देने का निर्णय लिया गया।
5000 करोड़ के नुकसान का दावा
21 सितंबर को सीपीआई(एमएल) ने एक रिपोर्ट पेश कर दावा किया कि इस प्लांट से बिहार सरकार को सालाना करीब 5000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा और इलाके में जलसंकट भी पैदा हो सकता है।
वहीं राज्य सरकार का कहना है कि यह जमीन बेची नहीं गई है बल्कि केवल लीज पर दी गई है। जमीन राज्य की ही रहेगी और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की गई है।
जनवरी 2026 में प्रस्तावित अडानी पावर प्लांट की पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए जनसुनवाई आयोजित की गई। इस सुनवाई में उपस्थित लोगों ने प्लांट स्थापना पर सहमति जताई, हालांकि स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने की मांग भी रखी गई।
स्थानीय लोगों में उत्साह कम क्यों?
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकुर कहते हैं, ‘बिहार जैसे उद्योगविहीन राज्य में अडानी द्वारा वारिसलीगंज में सीमेंट फैक्ट्री और पीरपैंती में पावर प्लांट लगाने के बावजूद स्थानीय लोगों में अपेक्षित उत्साह नहीं दिखता। दोनों जगहों पर स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। वारिसलीगंज में तो विरोध की अगुआई भाजपा और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोग भी कर रहे हैं। दोनों जगहों पर विरोध की एक बड़ी वजह पर्यावरणीय चिंताएं हैं।’
दिल्ली भाजपा के प्रदेश संयोजक डॉ. सुधांशु का कहना है, ‘वारिसलीगंज में सीमेंट फैक्ट्री के खिलाफ हम लोग मिलकर विरोध कर रहे हैं। यह एक तरह से ‘मौत की फैक्ट्री’ साबित हो सकती है। इसके शुरू होने से दिल और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां बढ़ेंगी, किसानों की फसलें नष्ट होंगी, उपजाऊ भूमि बंजर हो जाएगी और पीने के पानी का संकट भी पैदा होगा।’
लेखक और पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश का कहना है, ‘कहलगांव सुपर थर्मल पावर स्टेशन पहले ही इलाके की तबाही और बर्बादी की कहानी कह रहा है। अब पीरपैंती में भी उसी तरह की तबाही का सिलसिला शुरू होने का खतरा है।’
तारापुर के निवासी और राजनीतिक विश्लेषक राकेश कुमार लिखते हैं, ‘महाराष्ट्र में चुनाव से पहले पावर प्लांट प्रोजेक्ट और धारावी पुनर्विकास का काम भी गौतम अडानी को सौंपा गया था। इसी तरह झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी चुनाव से पहले अडानी समूह को बड़े प्रोजेक्ट दिए गए। बिहार चुनाव से पहले पीरपैंती का प्रोजेक्ट भी उसी पैटर्न का हिस्सा लगता है।’
वहीं पुणे में कॉरपोरेट सेक्टर में काम कर रहे बिहार के मिहिर मिश्रा का अलग मत है। वे कहते हैं, ‘कोई भी उद्योग लगेगा तो पर्यावरण पर कुछ न कुछ असर होगा। लेकिन यह भी देखना होगा कि बिहार को इससे फायदा है या नहीं। मुझे लगता है कि फायदा होगा। अडानी जैसे बड़े उद्योग समूह निवेश करेंगे तो राज्य में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।’
इन तमाम विरोध और समर्थन के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है – क्या इन परियोजनाओं से वास्तव में बिहार को फायदा होगा, या फिर इसका लाभ मुख्य रूप से अडानी समूह को ही मिलेगा?





