बीजापुर। छत्तीसगढ़ के Bastar के बीजापुर जिले के तिमेनार गांव में रेखो पीड़े रोज दरवाजे की ओर देखती हैं। 21 साल बीत गए लेकिन उनका पति उर्रा पीड़े अब तक घर नहीं लौटा। रेखो की आंखों में आंसू सूख चुके हैं, पर इंतजार आज भी जारी है। रेखो की शादी को महज एक साल हुआ था। दो महीने पहले ही उनके यहां एक बेटा पैदा हुआ था। पति-पत्नी जंगलों, पहाड़ों और झरनों के बीच सादा आदिवासी जीवन जी रहे थे लेकिन साल 2005-06 में एक दिन ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।
क्या हुआ था उस दिन?
परिवार के अनुसार, उर्रा पीड़े अपनी छोटी बहन हिरमे और कुछ ग्रामीणों के साथ बाजार गए थे। उन्होंने अमचूर और बांस का लट्ठा बेचकर घर की जरूरत का सामान खरीदा पत्नी के लिए छाता, साबुन, तेल और कुछ खाने का सामान। बारिश का मौसम था, इसलिए दोनों छाते कंधे पर रखकर वे घर लौट रहे थे।
रेखो बताती हैं, ‘मेरे पति अमचूर बेचकर दो छाते खरीदकर लौट रहे थे। तभी नागा बटालियन के एक जवान ने उन्हें दौड़कर पकड़ लिया। हमने थाने-थाने चक्कर लगाए, बहुत खर्चा भी हुआ, लेकिन आज तक उनका कोई पता नहीं चला।’
हिरमे (उर्रा की बहन) की बात: ‘मैं अपनी आंखों से देख रही थी। एक जवान, जिसके सिर पर बाल नहीं थे, ऊपर बिल्डिंग पर खड़ा था। उसने मेरे भाई उर्रा को पकड़ लिया और थाने के अंदर ले गया। मैं आज भी उस जवान को पहचान सकती हूँ।’ उस दिन से उर्रा लापता हैं। उनका बेटा, जो तब सिर्फ दो महीने का था, आज 21 साल का युवक बन चुका है। उसने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा। रेखो ने अकेले ही बेटे को पाला और बड़ा किया लेकिन आज भी बेटे की सुरक्षा को लेकर डरी रहती हैं।
बस्तर के घाव
रेखो की कहानी अकेली नहीं है। 2005-06 के दौरान नक्सलवाद से निपटने के लिए दक्षिण बस्तर में नागा और मिजो बटालियन की तैनाती की गई थी। उस दौर में कई परिवारों ने अपने सदस्य खोए। आज भी बस्तर के दूर-दराज गांवों में ऐसे अनेक परिवार हैं, जो सालों पुराने दर्द के साथ जी रहे हैं।रेखो कहती हैं कि वे हर आहट पर चौंक जाती हैं। लगता है शायद इस बार उनका उर्रा ही लौट आया हो।
The Lens की यह ग्राउंड वीडियो रिपोर्ट में देखें तिमेनार गांव की रेखो पीड़े की असली कहानी।
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21 साल बाद भी न्याय और जवाब की तलाश जारी है। बस्तर में ऐसे कई परिवारों की कहानियां अभी भी अधूरी पड़ी हैं। The Lens इन आवाजों को आगे भी उठाता रहेगा।









