अनूपपुर। प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप जायसवाल के निर्वाचन क्षेत्र कोतमा में स्वास्थ्य सेवाओं की कलई एक बार फिर खुल गई है। रविवार सुबह उचित और समय पर प्राथमिक उपचार न मिलने के कारण स्थानीय पत्रकार राजकुमार तिवारी के पिता रामभुवन तिवारी की मौत हो गई। घटना के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने अस्पताल की कार्यप्रणाली और डॉक्टरों की अनुपस्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक घंटे तक नहीं मिला इलाज

मिली जानकारी के अनुसार, रविवार सुबह पत्रकार राजकुमार तिवारी के पिता रामभुवन तिवारी की तबीयत अचानक बिगड़ने पर उन्हें तत्काल कोतमा अस्पताल ले जाया गया। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद काफी देर तक कोई भी ड्यूटी डॉक्टर मौके पर उपलब्ध नहीं था। मरीज की स्थिति गंभीर होने के बावजूद उन्हें तत्काल उच्च केंद्र रेफर करने के बजाय कागजी कार्रवाई में समय गंवाया गया।
वायरल वीडियो में पीड़ित पुत्र यह कहते दिख रहे हैं कि एक घंटे बाद रेफर पर्ची दी गई है, जबकि पिता की सांसें पहले ही थम चुकी थी। इससे ठीक एक दिन पहले शनिवार शाम 6 बजे पीड़ित अपने पिता को लेकर अस्पताल पहुंचा तो उन्हें गैस की शिकायत बताकर घर रवाना कर दिया गया था।
तड़पते रहे पिता, पत्रकार ने फेसबुक लाइव में दिखाई बदहाली
राजुकमार ने फेसबुक लाइव के जरिए कोतमा अस्पताल की बदहाली को उजागर किया। लाइव वीडियो में राजकुमार अस्पताल प्रबंधन से अपने पिता का इलाज करने के लिए गुहार लगाते दिख रहें हैं। लेकिन, मौके पर कोई भी सीनियर डॉक्टर मौजूद नहीं था। उनके परिवार के लोग की आसपास मौजूद थे। कुछ देर में एक जूनियर डॉक्टर मौके पर पहुंचा और कुछ दवाइयां दी, तब तक राजकुमार के पिता दम तोड़ चुके थे।
अस्पताल में असुविधाओं का अंबार
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कोतमा में असुविधाओं का अंबार लगा हुआ है। अपस्ताल में ना तो पर्याप्त संख्या में डॉक्टर पदस्थ है और ना ही पर्याप्त स्टाफ है। ट्रेनी डॉक्टरों के सहारे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित किया जा रहा है।
सामुदायिक अस्पताल कोतमा में स्त्री रोग, हृदय रोग और हड्डी रोग विशेषज्ञों का स्थाई अभाव है साथ ही वेंटिलेटर और आधुनिक मशीनों का न होना भी गंभीर समस्या है। वही गंभीर मरीजों को संभालने के बजाय उन्हें बाहर भेजकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया जाता है। साथ ही अस्पताल में बेड कम होने के चलते कई बार मरीजों को जमीन पर गद्दा बिछाकर उनका इलाज किया जाता है।
वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सुविधाएं
कोतमा अस्पताल में मरीजों को समय से डॉक्टर की उपलब्धता ना होने की वजह से मरीज दम तोड़ देते हैं। कई बार एंबुलेंस देरी से मिलने के कारण मरीजों की दूसरे अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में मौत हो जाती है।
कोतमा अस्पताल में बेड की संख्या 30 है जो कि जनसंख्या के आधार पर बेहद कम है। अनूपपुर जिला बने 23 साल हो गए, लेकिन कोतमा CHC आज भी एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तरह ही व्यवहार कर रहा है, जहाँ हर गंभीर केस को सीधे शहडोल या बिलासपुर रेफर कर दिया जाता है।
दावों और धरातल में अंतर

हाल ही में जारी मीडिया रिपोर्टों में मंत्री दिलीप जायसवाल को प्रदेश के ‘टॉप-10’ प्रभावशाली मंत्रियों में गिना गया है, लेकिन उनके अपने क्षेत्र कोतमा की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं आंकड़ों के विपरीत है। जिला अस्पताल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक डॉक्टरों के स्वीकृत पदों के मुकाबले तैनाती नगण्य है। सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, कई बार अस्पताल केवल नर्सों के भरोसे ही संचालित होते हैं। वहीं जून 2025 में सामने आई तस्वीरों में मरीज फर्श पर लेटकर ड्रिप लगवाने को मजबूर थे, जो बेड की भारी कमी को दर्शाता है।











