नई दिल्ली।सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता Amol Palekar ने आंदोलनकारी विद्यार्थियों को एक चिट्ठी लिखी है। द लेंस वह चिट्ठी ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहा है।
“प्यारे बहादुर विद्यार्थियों,
मैं आपको सिर्फ एकजुटता जताने के लिए नहीं, बल्कि आपके प्रति आभार के साथ लिख रहा हूं. हर पीढ़ी को लोकतंत्र का अधूरा काम विरासत में मिलता ही है. आपकी पीढ़ी ने इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी को स्वीकार किया है और आपके लिए यह फख्र की बात है.
अल्बर्ट कामू का नाटक ‘कैलिगुला’ ऐसे सम्राट की कहानी है जो यह मानने लगता है कि उसके पास बेइंतहा ताकत है. इसलिए वह किसी भी नैतिक तकाजे के प्रति जवाबदेह नहीं है. वह मानता है कि ताकत ही तय करती है कि इंसाफ क्या है. वह खुद को अपने ही जुल्म के दायरे में कैद कर लेता है. वह शासन पर लगी हर रोक-टोक को व्यवस्थित रूप से खत्म कर देता है क्योंकि वह मानता है कि सत्ता उसे ऐसा करने का अख्तियार देती है. उस शाश्वत सत्य की याद हमें आई जब मैं और मेरी पत्नी संध्या दिल्ली में हो रही उन घटनाओं को देख रहे थे जो बेहद परेशान करने वाली थी.
पुलिस दमन के बावजूद नौजवानों का आंदोलन हंसते गाते बिना किसी डर भय के फैलता जा रहा है. इतिहास ने बार-बार यह सबक सिखाया है. जार के राज वाले रूस से लेकर 1968 में पेरिस में विद्यार्थियों के विद्रोह तक, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ नौजवानों के संघर्ष, तियानमेन स्क्वायर और गुजरात में 1974 के नवनिर्माण आंदोलन तक नौजवानों की आवाज को दबाने की कोशिशों ने कभी भी आजादी की चाहत को खत्म नहीं किया है. सत्ता कुछ समय के लिए तो अपने फरमान मनवा सकती है, लेकिन वह हमेशा के लिए किसी पीढ़ी की अंतरात्मा पर कब्जा नहीं कर सकती.
आप पर ढाई गई बर्बरता की तस्वीरों ने हमें दुख और आक्रोश से भर दिया है. अपने विश्वविद्यालयों में ही कोई समाज खुद से सवाल करना सीखता है. अपने भविष्य पर अख्तियार रखने वालों से सवाल पूछना कोई ऐसा विशेषाधिकार तो है नहीं जिसकी मांग आप कर रहे हैं. यह एक लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है जिसे आप निभा रहे हैं. जब सवालों का जवाब तर्क के बजाय लाठियों से दिया जाता है, तो इससे विद्यार्थियों का मान कम नहीं होता. राज्य का इकबाल कम होता है.
साइबेरिया की जेल में बिताए सालों को याद करते हुए फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की ने कहा था कि कोई समाज कितना सभ्य है इसका पता इस बात से चलता है कि वह कैदियों के साथ कैसा बर्ताव करता है. आज इस सोच को आगे बढ़ा कर कहा जा सकता है कि किसी लोकतंत्र की सेहत का पता भी इसी बात से चलता है कि वह अपने विद्यार्थियों और नागरिकों के साथ कैसा सुलूक करता है. इस मामले में हमारा लोकतंत्र नाकाम रहा है. बातचीत के बजाय ताकत का इस्तेमाल करके, सत्ता में बैठे लोगों ने अपनी ताकत नहीं दिखाई है. उन्होंने यही दिखाया है कि वे कितना डरते हैं.
अगर मैं खुद आपके साथ वहां मौजूद नहीं था, तो इसकी दो वजह थी. पहली वजह का तो मुझे बहुत अफसोस है: उम्र ने मेरे शरीर पर कुछ सीमाएं थोप दी हैं जिन्हें मानने को मेरा मन तैयार नहीं है. अगर मैं आपके साथ मार्च नहीं कर सका, तो ऐसा इसलिए बिल्कुल नहीं था कि मेरा जमीर हिचकिचा रहा था. दूसरी वजह थी सोच-समझ कर लिया गया मेरा फैसला. मैं नहीं चाहता था कि लोगों का ध्यान उस जगह से हटे जहां उसे असल में होना चाहिए. यह आपका आंदोलन है. आपकी आवाज है. यह आपके नैतिक साहस का पल है. आपको किसी सेलिब्रिटी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है. लोकतांत्रिक आंदोलनों को अपनी वैधता उनके केंद्र में मौजूद लोगों की हिम्मत से मिलती है, न कि उनके बगल में खड़े लोगों की लोकप्रियता से.
लेकिन आपसे दूर रहने का मतलब कभी भी यह नहीं रहा है कि हम आपके साथ नहीं हैं. यह बात आप जरूर ध्यान में रखिएगा. संध्या और मैं हर उपलब्ध तरीके से आपके साथ खड़े रहेंगे. अगर इस संघर्ष में कानूनी मदद, मेडिकल देखभाल या हमारी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता की जरूरत पड़े, तो बेझिझक हमसे संपर्क करें.
आप सिर्फ बदलाव के बीज नहीं हैं. आप उसकी पहली हरी कोंपलें हैं. आज आपको शायद विद्यार्थी कहा जाए, लेकिन कल आप उस पीढ़ी के तौर पर जाने जाएंगे जिसने खामोशी के बजाय हिम्मत को चुना. भविष्य उन्हीं का है जो अपनी इंसानियत को नहीं छोड़ते. आज के नारे और आज के शासक समय के साथ मिट जाएंगे. लेकिन आपकी हिम्मत को इतिहास हमेशा याद रखेगा.
एक-दूसरे का खयाल रखें. अपनी करुणा और उम्मीद को बचा कर रखें. गुस्से को नफरत में न बदलने दें. मजबूती से डटे रहें. अपने दिल में न कोई कड़वाहट आने दें, न कोई डर. बेझिझक आगे बढ़ते रहें.
सस्नेह,
अमोल पालेकर
23 जुलाई, 2026









