रायपुर। Adani जी को लगता है कि छत्तीसगढ़ की महिलाएं कल तक चारदीवारी में बंद थीं और उनके यानि अडानी जी के आने के बाद ही चारदीवारी टूटी है !
छत्तीसगढ़ के प्रमुख अखबारों में छपे इस विज्ञापन को देखिए जो हसदेव इलाके की एक महिला के हवाले से कहता है – ‘कल तक चारदीवारी में बंद थीं,आज खुल गईं हैं नई दिशाएँ’
विज्ञापन यह भी कहता है–
‘तरक्की की ओर बढ़ रही है,
हसदेव की हवा बदल रही है!’
ऐसा लगता है कि अडानी जी नारी मुक्ति की कोई नई हवा बहा रहे हैं जो हसदेव से शुरू हुई है और धीरे धीरे पूरे छत्तीसगढ़ में बहने लगेगी,वैसी ही जैसे देश भर में बह रही है! असल में अडानी जी को छत्तीसगढ़ की महिलाओं की ताकत,आदिवासी महिला की ताकत,समाज में उसकी प्रधानता,जीवन संघर्ष के उसके हौसले का बोध ही नहीं है।
ज़रा इस आंकड़े पर गौर कीजिए –
अडानी जी को यह जानना चाहिए कि सांख्यिकी मंत्रालय के हाल में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में श्रम बल में ग्रामीण महिलाएं देश में तीसरे नंबर पर हैं।मंत्रालय द्वारा जारी देश की labour force participation rate –LFPR कहती है कि छत्तीसगढ़ में ग्रामीण महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 51.4 प्रतिशत है।अडानी जी के गुजरात से भी ज्यादा, महाराष्ट्र से भी ज्यादा!राष्ट्रीय औसत 42 प्रतिशत से भी ज्यादा। देश में तीसरे नंबर पर!
IWWAGE यानि इंस्टीट्यूट ऑफ वॉट वर्क्स टू एडवांस जेंडर इक्वालिटी के मुताबिक जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था तब छत्तीसगढ़ की महिलाओं की श्रम भागीदारी यानि फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन की दर 55.8 प्रतिशत से बढ़ कर 66 प्रतिशत हो गई थी।
समझा जा सकता है कि जब देश थमा हुआ था तब इस प्रदेश की अर्थव्यवस्था को सम्भाले रखने में ग्रामीण महिला श्रम की भागीदारी बढ़ गई थी। ये महिलाएं तब भी चारदीवारी में बंद नहीं थीं।इनमें हसदेव के भी गांव शामिल थे।वहां की भी महिलाएं उस महामारी में चारदीवारी में कैद नहीं थीं। अडानी जी छत्तीसगढ़ में घर के कामकाज का श्रम, महिलाओं के मजबूत कंधों पर ही होता है। दुर्भाग्य से इस श्रम को तो ना कोई सरकार ,ना आपके जैसे कोई कॉरपोरेट, महिलाओं के श्रम के घंटों में गिनते ही नहीं। अडानी जी छत्तीसगढ़ की महिलाएं मेहनतकश हैं।
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिलाएं,आदिवासी इलाकों की महिलाएं,हसदेव की महिलाएं किसी चारदीवारी में बंद नहीं हैं। दुर्भाग्य से सच यह है कि उन्हें उनके श्रम की सही और न्यायपूर्ण मजदूरी नहीं मिलती। दुर्भाग्य से उत्पादन में भरपूर हिस्सेदारी होने के बावजूद वे उस अन्याय का शिकार हैं जिसके जिम्मेदार उद्योग,व्यापार, कॉरपोरेट भी हैं।
अगर हवा बदलनी हो तो अपने प्रभाव वाली सरकारों के जरिए इतना ही सुनिश्चित करवा दीजिए कि इन महिलाओं को उनके श्रम की उचित मजदूरी मिल जाए और श्रम कानूनों का पालन हो जाए। अडानी जी हसदेव की महिलाओं का पसीना आपकी पूरी दौलत से ज्यादा कीमती है…आज से नहीं सदियों से। आपको पता नहीं होगा लेकिन हसदेव अरण्य को यह पता है।
हसदेव अरण्य यानि मध्य भारत का फेफड़ा जानता है कि उसके आँचल में महिलाएं कैद नहीं आज़ाद थीं।अपने परिश्रम से इस अरण्य की शान थीं। ये उसी हसदेव अरण्य की बात है जहां आपकी आरी और कुदाली मध्य भारत के इस फेफड़े को चीर रहीं हैं ! इसका मतलब तो जानते ही होंगे! अडानी जी आपको बताया नहीं गया होगा कि छत्तीसगढ़ की महिलाएं फौलादी हैं।
छत्तीसगढ़ के खेत अगर लहलहाते हैं तो वो छत्तीसगढ़ की महिलाओं की बदौलत,जो कंधे से कंधा मिला कर पुरुषों के साथ खेतों में डटी होती हैं। फैक्ट्रियों से लेकर हर तरह के शिल्प और तेंदूपत्ता के संग्रहण तक अगर महिलाएं ना होतीं तो इस राज्य का अर्थशास्त्र भी अलग होता। दरअसल हसदेव की इन महिलाओं का मुकाबला शोषण और विनाश की उस कुल्हाड़ी से है जिस पर दुर्भाग्य से आज नियंत्रण आपका है! अडानी जी आपने छत्तीसगढ़ के केवल उन पन्नों को पलटा है जहां संसाधन और मुनाफे की ही चर्चा है। कुछ पन्ने और पलटते तो आपको छत्तीसगढ़ के उस अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की भी जानकारी होती जहां ताकत के साथ लिखा है– महिला !
आप कुछ स्कूल,थोड़े चिकित्सा केंद्र और थोड़ा रोजगार दे कर तरक्की और हवा बदलने की बात कर रहे हैं।बताइए कितना जंगल आपने साफ कर दिया,कितना जंगल आगे काटने जा रहे हैं,कितनी खदाने आपके पास हैं और इन सब से छत्तीसगढ़ की हवा को कितना दूषित आप करने जा रहे हैं ?
बताइए कि हसदेव में जैव विविधता किस तरह नष्ट होने जा रही है? दुनिया को बताइए कि आपकी खनन गतिविधियों से, जंगलों की कटाई से इस इलाके में जल स्रोत सूख रहे हैं ,हाथी मानव संघर्ष बढ़ रहा है। बताइए कि जल वायु परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ रहा है?बताइए कि अब हसदेव में तापमान बढ़ने लगा है। बताइए कि हसदेव में आदिवासियों का विस्थापन होगा या नहीं और उसमें आपके विज्ञापन में अंकित साधना सिंह सांडिल्य जी जैसी कितनी महिलाएं अपनी जिंदगी से उजड़ जाएंगी? उनके परिवार उजड़ जायेंगे!
बताइए कि No Go एरिया में खनन हो रहा है या नहीं और यह भी बताइए कि इस काम के लिए सरकारें किस ताकत के साथ आपके साथ हैं और किस तादाद में पुलिस का इस्तेमाल हो रहा है ? अडानी जी मुनाफ़े की आपकी चाह इन्हीं महिलाओं के बच्चों के लिए विनाश के कर आ रही है और आप कहते हैं कि नई दिशाएं खुल गईं हैं,हसदेव की हवा बदल रही है ! अडानी जी हवा बदल नहीं रही है,जहरीली हो रही है।मध्यभारत के जिस फेफड़े को चीरा जा रहा है वो हसदेव की महिलाओं की,उनके बच्चों की,उनके परिवारों भी साँसे छीनेगा। अडानी जी छत्तीसगढ़ की महिलाएं शोषित हैं,अन्याय का शिकार हैं पर चारदीवारी में कैद नहीं हैं। अपने जंगलों को बचाने की लड़ाई में वो भी शामिल हैं लेकिन आपके विज्ञापनों से अटे अखबारों में उनके इस संघर्ष की कहानियां नहीं नजर आएंगी।
अडानी जी हकीकत यह है कि चारदीवारी तो आप बना रहे हैं, सरकारों और सरकारी डंडों के जोर पर, ताकि इन उन्मुक्त जंगलों को चीर सकें,हसदेव नदी को पी सकें,साधना सिंह सांडिल्य की धरती को खोद सकें,उनके पर्यावरण को नष्ट कर सकें। हकीकत यह है कि मुनाफे की आपकी आकांक्षाएं हवा भी बंद करने जा रही है और सारी दिशाएं ही बंद करने जा रही है। हकीकत यह है कि जिन महिलाओं को चारदीवारी से मुक्त करवाने का आप दावा कर रहे हैं वह सब इसी हसदेव की बदौलत पूरी आत्मनिर्भरता के साथ सदियों से स्वतंत्रत थीं।
हसदेव उनके लिए साफ हवा का स्रोत था,हसदेव ही उनकी जीविका का जरिए था,उनके बच्चों के पालन में हसदेव की क्या भूमिका थी इसे पता करिए अडानी जी,हसदेव था तो उन्हें उज्ज्वला जैसी उन योजनाओं की जरूरत नहीं थी जिसके सिलेंडर उनके लिए बोझ ही बन गए हैं और मिलते भी नहीं,हसदेव से इन महिलाओं को अपने परिवार के लिए जो पौष्टिक साग भाजी मिलती थी,औषधियाँ मिलती थीं उसका महत्व उनसे पूछिए, हसदेव उनके लिए जीने की ताकत है.,ऐसी ताकत जो सारी चारदीवारियों को तोड़ती थी।एक ऐसी ताकत जहां एक स्त्री छत्तीसगढ़ के समाज में अपनी प्रधानता को महसूस कर सकती थी। जिस हसदेव में कल तक अपनी इसी ताकत के साथ वह महिला बेख़ौफ़ गुजरती थी वहां आज पहरा है– आपका पहरा! इस हसदेव को आप उससे छीन कर उसकी आत्मनिर्भरता,उसकी स्वतंत्रता पर भी हमला कर रहे हैं अडानी जी। देखना बस यह है कि हसदेव को बचाने की लड़ाई कोई नई दिशा खोल पाती है या नहीं !
अडानी जी चलते चलते आपको इसी इलाके की एक आदिवासी महिला की ताकत की कहानी बताते हैं। यह कहानी सरगुजा जिले के जंगलपारा गांव की सुखमनिया की है। पचास साल की सुखमनिया ने चलने फिरने में असमर्थ 90 साल की अपनी सास को अपनी पीठ पर बाँधा और चिलचिलाती धूप में चार किलोमीटर चल कर बैंक पहुंची क्योंकि उसे 5 सौ रुपए की मासिक पेंशन के लिए सत्यापन यानि केवाईसी करवाना था।
ये हसदेव की महिला की ताकत है और फिर से सुनिए – इसी आत्मनिर्भरता , इसी ताकत के साथ,हसदेव के साथ, वो सदियों से जी रही है।
और हां! एक जरूरी बात तो रह गई। आपको यह पता है ना कि जिस हसदेव की हवा बदलने और नई दिशाएं खोलने का आप दावा कर रहे हैं उस हसदेव के राज्य छत्तीसगढ़ में छब्बीस में से करीब साढ़े सत्रह बरस किसकी सरकार थी ? क्या छत्तीसगढ़ की ये लोकतांत्रिक सरकारें हसदेव की हवा नहीं बदल सकीं जो एक कॉरपोरेट को आगे आना पड़ रहा है? आप यह सब CSR यानि कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत कर रहे होंगे। करिए! लेकिन छत्तीसगढ़ की महिलाओं को चारदीवारी में कैद बता कर नहीं !
यह अडानी जी से हमारा एकालाप था। इसमें कुछ सवाल हैं कुछ चिंताएं हैं। हम इस सवाल के साथ इस एकालाप को विराम देते हैं कि क्या इस राज्य में ,इस देश में नई हवाएं अब मुनाफे की पीठ पर ही सवार हो कर आने वाली हैं? हमें बताइए कि क्या इस एकलाप में उठाये गए सवाल ,चिंताएं आपको भी झकझोरती हैं ? यदि हां तो अपनी प्रतिक्रिया भी दीजिए इस वीडियो के कमेंट्स बॉक्स में,इसे लाइक कीजिए,शेयर भी कीजिए। उम्मीद है कि आप the Lens को सब्सक्राइब तो पहले ही कर चुके होंगे।











