मध्य्प्रदेश के शिवपुरी के करेरा में 24 से 30 अक्टूबर तक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (Pandit Dhirendra Shastri)की रामकथा चल रही है और उसी दौरान उनका एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में शास्त्री करवा चौथ को “खसम पूजन दिवस” बता रहे हैं। हंसी के ठहाकों के बीच कह रहे हैं कि पत्नियां एक दिन व्रत रखती हैं और 364 दिन ताने मारती हैं। यहां सवाल खड़ा होता है।
क्या करोड़ों महिलाओं की आस्था वाले व्रत को इस तरह के शब्दों में परिभाषित करना शोभा देता है? करवा चौथ पर दिनभर भूखी-प्यासी रहकर पति की लंबी उम्र की कामना करने वाली महिला के व्रत को कसम पूजन कहना क्या उसका सम्मान है या अपमान?
शास्त्री खुद कहते हैं कि शास्त्रों में इसका विधान नहीं मिलता, फिर उसी व्रत पर चुटकुला क्यों? अगर संदेश देना ही था कि रिश्ते में प्यार पूरे साल होना चाहिए, तो उसके लिए महिलाओं के व्रत का मजाक बनाना जरूरी था? मंच से ये कहना कि महिलाएं कहती हैं – नास मिटे कहां से मिल गए, हमारे कर्म फूट गए – ये किस संस्कार की भाषा है?
ये उसी महिला के लिए कहा जा रहा है जो आपके द्वारा कहे जाने वाली कथा सुन रही है। धर्म की कथा ज्ञान देने के लिए होती है, महिलाओं की आस्था पर हंसी बटोरने के लिए नहीं। वायरल होने के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना, क्या एक कथावाचक को शोभा देता है? आपकी क्या राय है कमेंट्स में बताये









