दूसरी गोली और सत्ता के सामने खड़े होने का साहस

राहुल गांधी, गांधी की विरासत और उस शासन का सामना करने के लिए जरूरी नैतिक दृढ़ता पर, जिसने शर्मिंदगी को भी पचा लेना सीख लिया है।

हमारे सामने एक विचित्र राजनीतिक समस्या है। आरोप जमा होते जाते हैं, स्पष्टीकरण सामने नहीं आते, संस्थाएं मौन में चली जाती हैं और शासन ऐसे आगे बढ़ता रहता है, मानो कुछ हुआ ही न हो। उसने हर चीज को पचा लेने की असाधारण क्षमता हासिल कर ली है।

नोटबंदी, राफेल, जज लोया का मामला और अब वोट चोरी के आरोप—हर विवाद ने जनमानस में अपनी जगह बनाई। हर मामले में ऐसे सवाल उठे, जिनके जवाब दिए जाने चाहिए थे। इसके बावजूद व्यापक राजनीतिक व्यवस्था अपने आत्मविश्वास के साथ कायम रही।

कई मामलों में न्यायिक कार्यवाहियां भी वह सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं कर सकीं, जिसकी आलोचक अपेक्षा कर रहे थे। सीलबंद लिफाफे ऐसी राजनीति का रूपक बन गए हैं, जिसमें पारदर्शिता की मांग का जवाब पारदर्शिता के वास्तविक तत्व के बिना भी दिया जा सकता है।

इससे मिलने वाला सबक यह नहीं है कि किसी बात का कोई असर नहीं होता। सबक यह है कि केवल आरोपों का जमा होते जाना अब जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं रह गया है। जिस शासन को शर्मिंदगी का भय नहीं है, उसे केवल यह दिखा देने से पराजित नहीं किया जा सकता कि उसे शर्मिंदा होना चाहिए।

यही वह समस्या है, जिसका सामना अब राहुल गांधी को करना है। केवल विपक्ष के नेता के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में भी, जो तेजी से प्रतिरोध की सार्वजनिक आवाज बनकर उभरे हैं।

उन्होंने दृढ़ता की बात की है। उन्होंने संविधान, संस्थाओं पर कब्जे और चुनावी हेरफेर की बात की है। उन्होंने वोट चोरी के सवाल को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में लाने में भूमिका निभाई है। लेकिन एक समय ऐसा आता है, जब किसी आरोप को सामने रखने का काम एक संगठित टकराव में बदलना पड़ता है।

उन्हें यह समझना होगा कि वह पहले ही एक आंदोलन के नेतृत्व में हैं, भले ही उन्होंने औपचारिक रूप से स्वयं को उसका नेता घोषित न किया हो। अब सवाल यह नहीं है कि उन्हें नेतृत्व करने की अनुमति, जनादेश या संस्थागत समर्थन प्राप्त है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह नेतृत्व की मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।

I. वह शासन जो शर्मिंदा नहीं होता

दूसरी गोली का हमारा पुराना दृष्टांत राजनीतिक सत्ता की असाधारण दंडमुक्ति को समझने का एक तरीका प्रस्तुत करता है।

पहली गोली मूल अपराध है। दूसरी गोली वह कृत्य है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति स्वयं को उस अपराध में स्थायी रूप से सहभागी बना लेता है।

पहली गोली दबाव, लाभ या वैचारिक विश्वास के कारण चलाई जा सकती है। दूसरी गोली अलग होती है। यह उस नैतिक जीवन में लौटने की संभावना को जानबूझकर नष्ट कर देना है, जिसमें व्यक्ति अपने अपराध के बोझ से मुक्त हो सकता था।

जो व्यक्ति दूसरी गोली चला चुका है, वह यह स्वीकार करने का जोखिम नहीं उठा सकता कि वास्तव में क्या हुआ था। स्वीकारोक्ति केवल किसी अपराध को ही उजागर नहीं करेगी, बल्कि उस पहचान को भी बेनकाब कर देगी, जिसे उसने उस अपराध के इर्द-गिर्द गढ़ा है।

उसे इनकार करना होगा, ध्यान भटकाना होगा, उपहास करना होगा या मौन रहना होगा। जो बेशर्मी दिखाई देती है, वह राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने की शर्त बन चुकी हो सकती है।

इसीलिए यह कल्पना करना व्यर्थ है कि एक और खुलासा, चाहे वह कितना ही गंभीर क्यों न हो, शासन को अनिवार्य रूप से आत्मबोध करा देगा। आरोप सही हो सकता है, साक्ष्य प्रभावशाली हो सकते हैं और जनाक्रोश व्यापक हो सकता है। फिर भी जिस व्यक्ति ने अपने नैतिक अस्तित्व को आरोप से इनकार करने पर निर्भर बना लिया है, उसके पास कुछ भी स्वीकार करने का कोई प्रोत्साहन नहीं बचता।

जब संस्थाएं भी इसमें शामिल हो जाती हैं, तो कठिनाई और बढ़ जाती है। यदि चुनाव आयोग चुनावी निष्पक्षता से जुड़े वैध सवालों का जवाब देने में विफल रहता है, तो वह उसी भरोसे को नुकसान पहुंचाने का जोखिम उठाता है, जिस पर उसका अधिकार टिका है।

यदि न्यायपालिका गंभीर संवैधानिक आरोपों की समयबद्ध और स्पष्ट जांच करने से पीछे हटती है, तो यह धारणा बन सकती है कि वह प्रक्रिया को बनाए रखते हुए जिम्मेदारी से बच रही है।

यदि जांच एजेंसियां चुनिंदा मामलों में ही सक्रिय दिखाई देती हैं, तो उनकी कार्रवाई को वैधता प्रदान करने वाली विश्वसनीयता कमजोर पड़ने लगती है।

ये ऐसे निष्कर्ष हैं, जिन्हें अभिलेखों, साक्ष्यों और प्रत्येक संस्था के आचरण के आधार पर परखा जाना चाहिए। कोई आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है। लेकिन संस्थागत मौन भी जवाब का संतोषजनक विकल्प नहीं है।

इसलिए केंद्रीय सवाल यह नहीं है कि शासन को शर्मिंदा कैसे किया जाए। सवाल यह है कि उसे कायम रखने वालों को उसकी कीमत का सामना करने के लिए कैसे विवश किया जाए।

II. वे देवता जिन्होंने दूसरी गोली नहीं चलाई

हर राजनीतिक व्यवस्था का अपना एक भीतरी घेरा होता है—ऐसे लोग, जिनका अस्तित्व उस सत्ता के अस्तित्व से अविभाज्य हो चुका होता है, जिसकी वे सेवा करते हैं।

संभव है कि उन्होंने दूसरी गोली चला दी हो। उनके हित, प्रतिष्ठा और भविष्य उस व्यवस्था में इतने गहरे धंसे होते हैं कि किसी गलत काम को स्वीकार करना उनके अपने जीवन की नींव को खतरे में डाल देगा।

लेकिन कोई भी शासन केवल ऐसे लोगों से नहीं बनता।

इस भीतरी घेरे के चारों ओर कहीं बड़ा समूह मौजूद होता है—अधिकारी, न्यायाधीश, प्रशासक, कॉरपोरेट नेता, गठबंधन सहयोगी, पेशेवर मध्यस्थ और संस्थागत पदाधिकारी।

जरूरी नहीं कि उन्होंने इस व्यवस्था को बनाया हो। यह भी जरूरी नहीं कि उन्होंने मूल गलत काम किया हो। संभव है कि वे जो कुछ देख रहे हों, उससे निजी तौर पर असहमत भी हों।

फिर भी वे अपना काम जारी रखते हैं।

वे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हैं, फैसलों को लागू करते हैं, प्रक्रियाओं का बचाव करते हैं, संस्था को अपनी प्रतिष्ठा का सहारा देते हैं और स्वयं को यह समझाते रहते हैं कि उनकी व्यक्तिगत भागीदारी इतनी छोटी है कि पूरी व्यवस्था के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

वे सत्ता के निकट रहने के लाभ उठाते हुए अपनी पेशेवर प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण बनाए रखते हैं।

ये उस जुलूस के देवता हैं।

इनकी प्रमुख विशेषता जरूरी नहीं कि दुर्भावना हो। इनकी विशेषता है नैतिक विकल्प खुले रखने की क्षमता—किसी व्यवस्था में भाग लेते हुए भी यह अधिकार सुरक्षित रखना कि व्यवस्था ढहने पर वे स्वयं को निर्दोष बता सकें।

इसलिए विपक्ष की रणनीति में उन लोगों के बीच अंतर करना आवश्यक है, जिन्होंने स्वयं को गलत काम से अविभाज्य बना लिया है, और उन लोगों के बीच, जिनके पास अब भी अपनी मिलीभगत से इनकार करने की स्वतंत्रता है।

यह अंतर बेहद जरूरी है। यदि सभी को समान रूप से दोषी मान लिया जाएगा, तो पाला बदलने या अपना रुख बदलने का कोई प्रोत्साहन नहीं बचेगा।

यदि देर से असहमति जताने वाले हर व्यक्ति को पाखंडी कहकर खारिज कर दिया जाएगा, तो असहमति का रास्ता बंद हो जाएगा। और यदि संस्थाओं से केवल असंतोष जताने की मांग की जाएगी, तो विपक्ष को जिम्मेदारीपूर्ण कार्रवाई की जगह चिंता जताने वाले बयान ही मिलेंगे।

काम यह है कि इन दोनों समूहों के बीच का अंतर स्पष्ट किया जाए।

जो नौकरशाह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचता है कि वह केवल नीति लागू कर रहा है, उससे पूछा जाना चाहिए कि क्या वह नीति कानूनसम्मत है।

जो कॉरपोरेट नेता तटस्थता का दावा करता है, उससे पूछा जाना चाहिए कि क्या निजी लाभ सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक शक्ति के इस्तेमाल के साथ तटस्थता संभव है।

जो न्यायाधीश संस्थागत संयम की दुहाई देता है, उससे पूछा जाना चाहिए कि क्या यह संयम सभी मामलों में समान रूप से लागू होता है और क्या देरी स्वयं संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करती है।

जो गठबंधन सहयोगी अपनी स्वतंत्रता का दावा करता है, उससे पूछा जाना चाहिए कि आखिर उसकी स्वतंत्रता उसे किस बात को अस्वीकार करने की अनुमति देती है।

ये सवाल व्यक्तियों से उनकी आधिकारिक भूमिकाओं में, उनके दर्ज आचरण के आधार पर और कानूनसम्मत सार्वजनिक जांच के जरिए पूछे जाने चाहिए। उद्देश्य परिवारों को अपमानित करना या निजी संबंधों को दंडित करना नहीं है। उद्देश्य उस सुरक्षा-कवच को हटाना है, जिसके पीछे सार्वजनिक जिम्मेदारी गायब हो जाती है।

यहां वाल्मीकि की कसौटी प्रासंगिक है। प्राचीन कथा में डाकू को पता चलता है कि उसके अपराधों के लाभ में हिस्सेदार लोग जरूरी नहीं कि उनका नैतिक बोझ भी साझा करें।

यह कथा नैतिक जिम्मेदारी दूसरों पर डालने के भ्रम को उजागर करती है—कि कोई व्यक्ति किसी व्यवस्था के लाभ तो उठा सकता है, लेकिन उसके परिणामों की जिम्मेदारी किसी और पर डाल सकता है।

इस कसौटी को सार्वजनिक जीवन पर लागू किया जाना चाहिए।

फैसला किसने लिया? उसे लागू किसने किया? किसने आपत्ति उठाई? किसने आपत्ति दबाई? किसे लाभ हुआ? किसके पास हस्तक्षेप करने का अधिकार था और उसने उस अधिकार का क्या किया?

इन सवालों के जवाब हमेशा दोष सिद्ध नहीं करेंगे। लेकिन वे जिम्मेदारी से बच निकलना कठिन बना देंगे।

III. गांधी की विरासत

यहीं राहुल गांधी को तय करना होगा कि गांधी का नाम लेने का उनके लिए क्या अर्थ है।

यह विरासत केवल स्मरण तक सीमित नहीं रह सकती। गांधी की प्रासंगिकता इस तथ्य में नहीं है कि उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया था, और न ही उस नैतिक प्रतिष्ठा में, जो बाद में उनके नाम से जुड़ गई।

उनकी प्रासंगिकता उस तरीके में है, जिसके जरिए उन्होंने राजनीतिक टकराव का स्वरूप बदल दिया।

उन्होंने सविनय अवज्ञा को सत्ता द्वारा स्वीकृत विरोध के तरीकों में जगह मिलने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने सत्ता के अन्यायपूर्ण इस्तेमाल को सार्वजनिक टकराव का विषय बनाया।

वे लोगों को उस बिंदु तक ले गए, जहां राज्य की दमनकारी शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई देने लगती थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विरोध करने वालों का जवाबी हिंसा से इनकार करना भी उस टकराव का हिस्सा है।

अहिंसा का अर्थ संघर्ष का अभाव नहीं था। वह संघर्ष करने का ऐसा तरीका था, जिसमें विरोधी की हिंसा को दोहराने से इनकार किया जाता है।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अहिंसा को अक्सर एक राजनीतिक स्वभाव तक सीमित कर दिया गया है—शांतिपूर्ण भाषण, तयशुदा सभाएं, नारे, ज्ञापन और अंत में ऐसा बिखराव, जिसके बाद सत्ता की मशीनरी पहले की तरह चलती रहती है।

इन गतिविधियों की अपनी जगह है। लेकिन सविनय प्रतिरोध की संभावनाएं केवल इन्हीं तक सीमित नहीं हैं।

बैरिकेड केवल एक भौतिक अवरोध नहीं होता। वह इस बात की घोषणा होता है कि नागरिक कहां खड़ा हो सकता है और सत्ता कहां सवाल पूछे जाने से इनकार करती है।

कोई विरोध प्रदर्शन तब राजनीतिक रूप से निष्प्रभावी हो सकता है, जब वह बिना चुनौती दिए उन सभी सीमाओं को स्वीकार कर लेता है, जिन्हें वही सत्ता तय करती है, जिसके खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है।

लेकिन उस सीमा को तोड़ने का अर्थ उसे लागू करने वाले लोगों पर हमला करना नहीं है। न ही गांधी का उदाहरण टकराव को रोमांचक बनाकर पेश करने, चोट पहुंचाने की कोशिश करने या यह मान लेने की अनुमति देता है कि राज्य की हिंसक प्रतिक्रिया अपने आप प्रदर्शनकारी को नैतिक अधिकार प्रदान कर देगी।

गांधीवादी चुनौती समर्पण और जवाबी हमले, दोनों से अधिक कठिन थी। इसमें प्रदर्शनकारी से अपेक्षा थी कि वह दमन की आशंका वाले बिंदु तक पहुंचे, परिणामों की परवाह किए बिना वहां डटा रहे, जवाबी हमला करने से इनकार करे और सामूहिक उद्देश्य की मांग होने पर पीछे हटने के लिए पर्याप्त अनुशासन बनाए रखे।

साहस इस बात में था कि व्यक्ति परिणामों को सहने के लिए तैयार रहे, लेकिन उन परिणामों को अपने नैतिक आचरण पर हावी न होने दे।

राहुल गांधी को इसी परंपरा का दावा करना चाहिए—ऐसे वंशज के रूप में नहीं, जिसे विरासत में उसकी प्रतिष्ठा पाने का अधिकार हो, बल्कि ऐसे राजनीतिक नेता के रूप में, जो उसके अनुशासन को स्वयं पर लागू करने के लिए तैयार हो।

IV. बैरिकेड से दहलीज तक

यदि विपक्ष का मानना है कि चुनावों की निष्पक्षता खतरे में है, तो उसे उन संस्थाओं की पहचान करनी होगी, जो इस आरोप का जवाब देने के लिए जिम्मेदार हैं।

उसे अपनी मांगें स्पष्ट रूप से रखनी होंगी, साक्ष्य सार्वजनिक करने होंगे, उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने होंगे और इस बात का सार्वजनिक अभिलेख तैयार करना होगा कि क्या पूछा गया और किसका जवाब देने से इनकार किया गया।

लेकिन उसे यह भी विचार करना होगा कि क्या विरोध प्रदर्शन के पारंपरिक ठिकाने असहमति को सीमित करने का माध्यम बन गए हैं।

किसी निर्धारित स्थल पर जुटी भीड़ बड़ी हो सकती है, उसके भाषण प्रभावशाली हो सकते हैं और उसका कार्यक्रम पूरी तरह अनुमानित हो सकता है।

अधिकारियों को पता होता है कि प्रदर्शनकारी कहां जुटेंगे, कहां समाप्त होंगे और उनके तितर-बितर होने से पहले उन्हें कितनी असुविधा सहनी पड़ेगी। विरोध एक ऐसा आयोजन बन जाता है, जिसका प्रबंधन राज्य करता है, न कि ऐसी मांग, जिसका उसे जवाब देना पड़े।

एक अलग तरह का सविनय प्रतिरोध संबंधित अधिकारियों को विरोध का प्रत्यक्ष और तात्कालिक संबोधित पक्ष बनाएगा। वह उन संस्थाओं के निकट, कानूनसम्मत और सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली जगह पर पहुंचने का प्रयास करेगा, जिनके आचरण पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इसका उद्देश्य किसी इमारत पर धावा बोलना, किसी अधिकारी को धमकाना या आपातकालीन सेवाओं में बाधा डालना नहीं होगा। उद्देश्य यह आग्रह करना होगा कि सार्वजनिक सत्ता का इस्तेमाल करने वाले लोग अनिश्चितकाल तक उन लोगों की नजर और जांच से बाहर नहीं रह सकते, जिनके नाम पर वे काम करते हैं।

ऐसे आंदोलन के लिए तैयारी, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य जरूरी होंगे।

राहुल गांधी को स्वयं इसका नेतृत्व करना होगा। वह केवल शुरुआत में भीड़ को संबोधित करके, तस्वीरों के लिए उपस्थित होकर और परिणामों का सामना युवा प्रदर्शनकारियों पर छोड़कर नहीं चल सकते।

टकराव कठिन होने पर, अधिकारी संवाद से इनकार कर दें तो, भीड़ थकने लगे तो और जवाबी कार्रवाई करने का प्रलोभन सबसे प्रबल हो जाए तो भी उन्हें वहां मौजूद रहना होगा।

उन्हें अपनी मांगें बिल्कुल स्पष्ट करनी होंगी।

कौन-सी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए? चुनाव आयोग को किन सवालों के जवाब देने चाहिए? किस तरह की स्वतंत्र जांच की मांग की जा रही है? कौन-सा न्यायिक उपाय मांगा गया है? उसका क्या जवाब मिला है? किसे प्रगति माना जाएगा और मांग ठुकरा दिए जाने पर आगे क्या होगा?

जो आंदोलन इन सवालों का जवाब नहीं दे सकता, वह अपने उद्देश्य की स्पष्टता की जगह अपने आक्रोश की तीव्रता को खड़ा करने का जोखिम उठाता है।

नेता को टकराव के अंत की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से लेनी होगी, जितनी उसकी शुरुआत की।

उद्देश्य पूरा हो जाने पर, तत्काल कार्रवाई के आगे उसे बढ़ाने में असमर्थ हो जाने पर या प्रतिभागियों के लिए जोखिम असंगत रूप से बढ़ जाने पर उसे पीछे हटने का आह्वान करने के लिए तैयार रहना होगा।

अनुशासित ढंग से पीछे हटना समर्पण नहीं है। यह दिखा सकता है कि आंदोलन भीड़ की भावनात्मक गति से नहीं, बल्कि एक राजनीतिक उद्देश्य से संचालित होता है।

मकसद यह साबित करना नहीं है कि प्रदर्शनकारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। मकसद यह दिखाना है कि वे अनुमति के बिना सत्ता के निकट पहुंच सकते हैं, उसके इनकार को बिना जवाबी हिंसा के सह सकते हैं और अपनी मांग की वैधता छोड़े बिना वहां से लौट सकते हैं।

V. दूसरी गोली का उलटा

शासन की शर्मिंदगी से बेपरवाही एक और सवाल खड़ा करती है। यदि केंद्र में बैठे लोगों ने अपनी गलतियों को स्वीकार करने की क्षमता नष्ट कर दी है, तो सार्वजनिक खुलासों का क्या महत्व रह जाता है?

इसलिए कि शासन पूरा समाज नहीं है और उसका भीतरी घेरा पूरा राज्य नहीं है।

ऐसे न्यायाधीश हैं, जिनकी पेशेवर पहचान किसी खास सरकार के कार्यकाल से आगे न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है।

ऐसे सिविल सेवक हैं, जिनका करियर उन राजनीतिक परिस्थितियों के बदल जाने के बाद भी जारी रहेगा, जिनमें वे अभी काम कर रहे हैं। ऐसे जांचकर्ता हैं, जिन्हें तय करना है कि पेशेवर कर्तव्य का अर्थ साक्ष्यों का पीछा वहां तक करना है, जहां तक वे ले जाएं।

ऐसे कॉरपोरेट नेता हैं, जिनकी प्रतिष्ठा इस अंतर पर निर्भर करती है कि व्यावसायिक सफलता और राजनीतिक संरक्षण में फर्क किया जाए। ऐसे गठबंधन सहयोगी हैं, जिन्हें अपने उन मतदाताओं के सामने अपने फैसलों का स्पष्टीकरण देना पड़ता है, जिनके अपने हित हैं।

इनमें से हर कोई नैतिक तर्कों से प्रभावित नहीं होगा। कुछ लोग कानूनी दायित्व से, कुछ पेशेवर जिम्मेदारी से, कुछ सार्वजनिक जांच से और कुछ इस संभावना से प्रभावित होंगे कि उनका वर्तमान आचरण उनके स्थायी रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाएगा।

विपक्ष यह मानकर नहीं चल सकता कि खुलासे से लोग पाला बदल लेंगे। उसे ऐसी परिस्थितियां बनानी होंगी, जिनमें स्वतंत्र आचरण संभव हो और लगातार मिलीभगत को उचित ठहराना कठिन होता जाए।

यही दूसरी गोली का उलटा है।

पहली गोली गलत काम को संभव बनाती है। दूसरी गोली अपराधी की पहचान को उसी गलत काम पर निर्भर बना देती है। लेकिन जिन्होंने दूसरी गोली नहीं चलाई, उनके पास अब भी विकल्प होता है।

वे किसी गैरकानूनी निर्देश को मानने से इनकार कर सकते हैं, उचित माध्यमों से दर्ज अनियमितता उजागर कर सकते हैं, किसी संस्थागत फैसले के लिए तर्कपूर्ण स्पष्टीकरण की मांग कर सकते हैं, किसी निराधार दावे को अपनी प्रतिष्ठा का सहारा देने से इनकार कर सकते हैं या अपनी स्वतंत्र संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर सकते हैं।

लगातार सार्वजनिक निगरानी का उद्देश्य इसी विकल्प को जीवित रखना है।

यही कारण है कि विपक्ष की रणनीति केवल निंदा पर आधारित नहीं हो सकती।

यदि कोई नौकरशाह गैरकानूनी आदेश मानने से इनकार करता है, तो विपक्ष को दलीय निष्ठा की मांग करने के बजाय कानूनसम्मत प्रशासन के सिद्धांत की रक्षा करनी चाहिए।

यदि कोई चुनाव अधिकारी वास्तविक आपत्ति उठाता है, तो उस आपत्ति को उसके साक्ष्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वह अधिकारी राजनीतिक रूप से कितना उपयोगी है।

यदि कोई न्यायाधीश ऐसा फैसला सुनाता है जो विपक्ष को स्वीकार्य नहीं है, तो विपक्ष को फैसले से असहमति और न्यायाधीश की वैधता पर हमला करने के बीच अंतर करना चाहिए।

अन्यथा आंदोलन केवल आज्ञापालन की एक मांग को दूसरी मांग से बदल देगा।

नैतिक दृढ़ता का अर्थ है जवाबदेही और प्रतिशोध के बीच अंतर को बनाए रखने से इनकार न करना, खासकर तब, जब ऐसा करने का प्रलोभन सबसे अधिक हो।

VI. सहयोगी, एजेंसियां और तटस्थता की कीमत

यही तर्क राज्य की स्थायी संस्थाओं से आगे भी लागू होता है।

जदयू और टीडीपी जैसे गठबंधन सहयोगियों के पास अपनी राजनीतिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता है। सरकार में उनकी भागीदारी महज एक प्रशासनिक तथ्य नहीं है। यह एक सतत राजनीतिक विकल्प है, जो कुछ प्रतिबद्धताओं, लाभों और अपेक्षाओं के बदले लिया जाता है।

उनसे पूछा जाना चाहिए कि वे किन शर्तों को उस सरकार की वैधता के लिए आवश्यक मानते हैं, जिसका वे समर्थन करते हैं।

मांग यह नहीं होनी चाहिए कि वे विपक्ष में शामिल हो जाएं। मांग यह होनी चाहिए कि वे अपनी घोषित स्वतंत्रता को साबित करें—वे गंभीर चुनावी आरोपों पर पारदर्शी जवाब मांगें, संस्थाओं की संवैधानिक स्वायत्तता की रक्षा करें और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को गठबंधन प्रबंधन के लिए मोलभाव का विषय मानने से इनकार करें।

यही सिद्धांत नौकरशाही और जांच एजेंसियों पर भी लागू होता है। उनकी तटस्थता का अर्थ कानूनी और गैरकानूनी आचरण के बीच उदासीन बने रहना नहीं हो सकता।

इसका अर्थ होना चाहिए दलीय निर्देशों से स्वतंत्रता, कानून के समान और निरंतर अनुप्रयोग तथा इस बात की तत्परता कि साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जाए, चाहे उससे किसी के भी हित प्रभावित हों।

कॉरपोरेट भारत को केवल इसलिए जांच से बाहर नहीं रखा जा सकता कि उसका प्रभाव सार्वजनिक पद के बजाय चंदे, ठेकों, पहुंच या निजी बातचीत के माध्यम से इस्तेमाल होता है।

लेकिन जांच सत्यापित किए जा सकने वाले तथ्यों पर आधारित रहनी चाहिए। व्यावसायिक सफलता राजनीतिक पक्षपात का प्रमाण नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे राजनीतिक निकटता भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है।

जहां अनुचित प्रभाव के साक्ष्य मौजूद हों, उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए और विश्वसनीय प्रक्रियाओं के जरिए उनकी जांच होनी चाहिए।

यह लगातार राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है, लेकिन एक उद्देश्य के साथ—हर भागीदार के लिए इस दावे के पीछे छिपना लगातार कठिन बनाना कि जिम्मेदारी किसी और की है।

विपक्ष की राजनीति को इसी संतुलन की कोशिश करनी होगी। हर सहयोगी साथ नहीं छोड़ेगा। हर अधिकारी असहमति नहीं जताएगा। हर संस्था एक साथ अपनी स्वतंत्रता वापस हासिल नहीं कर लेगी।

उद्देश्य उन बिंदुओं की पहचान करना है, जहां व्यवस्था में अब भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो कोई दूसरा विकल्प चुन सकते हैं, और उस विकल्प को स्पष्ट, परिणामकारी तथा बचाव योग्य बनाना है।

ऐसा जुलूस, जिसमें शामिल सभी लोगों के हित केंद्रीय व्यक्ति पर निर्भर हों, अब स्वतंत्र निर्णय के आधार पर चलने वाली सरकार नहीं रह जाता। वह आपसी निर्भरता की संरचना बन जाता है।

लेकिन ऐसी संरचनाएं तब बदलने लगती हैं, जब उनके किनारों पर खड़े लोगों को एहसास होता है कि उनकी भागीदारी न तो अदृश्य है और न ही अपरिहार्य।

VII. नैतिक जुझारूपन के रूप में दृढ़ता

राहुल गांधी ने दृढ़ता की बात की है। अब इस शब्द को अधिक कठोर अर्थ देना होगा।

दृढ़ता का अर्थ केवल उस आरोप को दोहराते रहने की क्षमता नहीं है, जिसे खारिज कर दिया गया हो। इसका अर्थ एक और भाषण देने, एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस करने या राजनीतिक उपहास के एक और दौर को झेल लेने की सहनशक्ति भर नहीं है।

इसका अर्थ है सत्ता के साथ नैतिक टकराव की स्थिति में बने रहने की इच्छा—जिसे सामान्य नहीं होना चाहिए, उसे सामान्य मानने से इनकार करना, जब मौन अपेक्षित प्रतिक्रिया बन जाए तब भी जवाब मांगते रहना और टकराव को उसके मूल उद्देश्य से भटकने दिए बिना उसे जारी रखना।

नैतिक जुझारूपन का अर्थ व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है। इसके लिए यह मान लेना जरूरी नहीं कि हर विरोधी सुधार से परे है या हर अधिकारी भीतर से मिलीभगत कर रहा है।

इसका अर्थ है किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण को समय बीत जाने को जवाबदेही का विकल्प बनाने की अनुमति न देना।

नेता को इस दृढ़ता की कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। कानूनसम्मत कार्रवाई के तहत गिरफ्तारी स्वीकार करनी होगी, अपने कदमों को चुनौती दिए जाने पर न्यायिक जांच का सामना करना होगा, रणनीति विफल होने पर आलोचना सहनी होगी और इस संभावना को भी स्वीकार करना होगा कि सुव्यवस्थित आंदोलन भी तत्काल परिणाम नहीं देगा।

उसे यह वादा नहीं करना चाहिए कि केवल नैतिक रूप से उचित होने के कारण कोई टकराव सफल हो जाएगा।

सबसे बढ़कर, उसे अपनी पद्धति के परिणामों की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार रहना होगा।

जो नेता युवाओं से सत्ता के सामने खड़े होने को कहता है, लेकिन स्वयं सुरक्षित दूरी बनाए रखता है, उसने गांधी का अनुशासन विरासत में नहीं पाया है।

जो नेता टकराव का आह्वान करता है, लेकिन जवाबी हिंसा को नियंत्रित नहीं कर सकता, उसने साहस और टकराव को बढ़ाने के बीच का अंतर खो दिया है।

जो नेता दृढ़ता की बात करता है, लेकिन वास्तविक कीमत सामने आने पर आंदोलन छोड़ देता है, वह नैतिक दावे को राजनीतिक प्रदर्शन में बदल देता है।

जिम्मेदारी यह है कि नेतृत्व सबसे आगे से किया जाए और उसका अनुसरण करने वालों के प्रति जवाबदेह रहा जाए।

VIII. आंदोलन की कसौटी

आज सार्वजनिक जीवन में कदम रखने वाले युवाओं को लोकतंत्र के गुणों पर एक और उपदेश की जरूरत नहीं है। उन्हें यह देखने की जरूरत है कि जब संस्थाएं निराश करती हैं, जब साक्ष्यों पर विवाद होता है, जब अधिकारी जवाब देने से इनकार करते हैं और जब तत्काल प्रतिक्रिया या तो निराशा होती है या आक्रोश—तब लोकतांत्रिक साहस कैसा दिखाई देता है।

उन्हें यह देखना चाहिए कि अहिंसा न तो अनुमति मांगना है और न ही निष्प्रभावी बने रहने का समझौता। यह राज्य के आचरण को अपने नैतिक चरित्र का निर्धारक बनने देने से अनुशासित इनकार है।

उन्हें ऐसा नेता देखना चाहिए, जो आलोचना के घेरे में आई संस्था के निकट जाएगा, अपनी मांगें इस तरह रखेगा कि उनमें कोई भ्रम न रहे, जवाब से इनकार किए जाने पर भी वहीं मौजूद रहेगा, आंदोलन का अनुशासन बनाए रखेगा और यह दिखावा किए बिना पीछे हटेगा कि विवाद का समाधान हो चुका है।

उन्हें यह भी देखना चाहिए कि आंदोलन उन लोगों के बीच अंतर कर सकता है, जिन्होंने स्वयं को गलत काम से अविभाज्य बना लिया है, और उन लोगों के बीच, जिनके पास अब भी उसका विरोध करने की स्वतंत्रता है।

पहला समूह शायद कभी अपनी दोषपूर्ण भूमिका स्वीकार न करे। दूसरे समूह को यह दिखावा करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं है।

कोई एक टकराव इस सवाल का अंतिम निपटारा नहीं करेगा। यह काम लगातार तैयार किए जाने वाले अभिलेखों, सुरक्षित रखी गई आपत्तियों, अपनाए गए कानूनी उपायों, सवालों के घेरे में लाए गए अधिकारियों, परखी गई राजनीतिक साझेदारियों और बार-बार दोहराई गई सार्वजनिक मांगों से आगे बढ़ेगा—जब तक कि जवाब देने से बचना भी एक ऐसा विषय न बन जाए, जिस पर स्पष्टीकरण देना पड़े।

शासन एक और आरोप को पचा सकता है। वह एक और प्रदर्शन से बच निकल सकता है। वह एक और मांग ठुकरा सकता है।

लेकिन आंदोलन को अपने अस्तित्व और परिणामों के अभाव के बीच भ्रमित नहीं होना चाहिए, और न ही अपनी थकान को प्रतिरोध की असंभवता समझना चाहिए।

यदि वर्तमान में गांधी की विरासत का कोई अर्थ है, तो वह यहीं निहित है। न तो पीड़ा को पवित्र मानने में, न लाठीचार्ज को रोमांचक बनाकर पेश करने में और न ही इस विश्वास में कि हिंसा का दृश्य अपने आप नैतिक विजय दिला देता है।

इसका वास्तविक अर्थ ऐसी राजनीतिक शक्ति का निर्माण करना है, जो अपने नैतिक विवेक को छोड़े बिना सत्ता का सामना कर सके।

राहुल गांधी को यह जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए किसी से अनुमति मांगने की जरूरत नहीं है। कोई पद इसके लिए जरूरी नैतिक अधिकार प्रदान नहीं कर सकता और कोई पारिवारिक नाम उस काम का विकल्प नहीं बन सकता।

उन्हें इस परंपरा का दावा उसका अनुशासन स्वीकार करके करना होगा।

काम यह है कि युवाओं को सत्ता की दहलीज तक ले जाया जाए, जवाब मांगा जाए, इनकार को सहा जाए, जवाबी हिंसा के बिना अपनी जगह पर डटे रहा जाए और उन्हें उनके उद्देश्य को अक्षुण्ण रखते हुए वापस लाया जाए।

दूसरी गोली वह कृत्य है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति नैतिक रूप से लौटने की संभावना को नष्ट कर देता है। राजनीतिक कार्य यह सुनिश्चित करना है कि बाकी सभी लोगों को यह विश्वास करने के लिए विवश न कर दिया जाए कि दूसरी गोली चलाना अपरिहार्य है।

आज दृढ़ता का अर्थ यही होना चाहिए—शासन की दंडमुक्ति को निष्क्रिय होकर सहते रहना नहीं, बल्कि उसके साथ समझौता करने से लगातार, संगठित और अहिंसक ढंग से इनकार करना।

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