वर्ष 2026 में असम में आई विनाशकारी बाढ़ (Flood) से लगभग 10 लाख लोग प्रभावित हुए। बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए देश के कई बड़े उद्योगपति, संस्थान, कलाकार और राजनीतिक प्रतिनिधि आगे आए और उन्होंने आर्थिक सहायता दी।
रिलायंस फाउंडेशन ने मुख्यमंत्री राहत कोष में 21 करोड़ रुपये, अडानी ग्रुप ने 11 करोड़ रुपये, बिहार के अनिल अग्रवाल ने 7 करोड़ रुपये, ऑयल इंडिया लिमिटेड ने 5 करोड़ रुपये और जेएसडब्ल्यू ग्रुप के सज्जन जिंदल ने 5 करोड़ रुपये का योगदान दिया। वहीं, अभिनेता कार्तिक आर्यन ने 1 करोड़ रुपये और बदरुद्दीन अजमल ने 2 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए। इनके अलावा भी कई हस्तियों ने असम के बाढ़ पीड़ितों की मदद की।
अब बिहार की स्थिति पर नजर डालिए। 8 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में बाढ़ से करीब 50 लाख लोग प्रभावित हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री राहत कोष में सबसे अधिक योगदान देने वालों में पहला नाम भारतीय जनता पार्टी की बिहार इकाई का है, जिसने 51 लाख रुपये दिए हैं। वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपने तीन महीने का वेतन, यानी 6.35 लाख रुपये, मुख्यमंत्री राहत कोष में दान किया है।
इस मुद्दे पर सांसद पप्पू यादव ने सवाल उठाया था कि जब असम में बाढ़ आई, तब सभी ने मदद की। फिर बिहार की मदद क्यों नहीं की गई? यहां सवाल किसी व्यक्ति या संस्था के योगदान पर नहीं, बल्कि उस व्यापक सामाजिक प्रतिक्रिया पर है, जो किसी आपदा के समय दिखाई देती है।

तस्वीर: महेंद्र यादव
जब असम में करीब 10 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए, तो देशभर से उद्योगपति, संस्थान, कलाकार और राजनीतिक प्रतिनिधि मदद के लिए आगे आए। बॉलीवुड की कई हस्तियों ने भी सोशल मीडिया पर मदद की अपील की। इसके उलट, बिहार में करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं, लेकिन यहां के पीड़ितों के लिए बाहरी मदद और राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक चर्चा अपेक्षाकृत कम है। बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद को छोड़कर किसी अन्य अभिनेता की ओर से बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए मदद या सार्वजनिक अपील सामने नहीं आई है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब असम के 10 लाख बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से मदद के हाथ आगे बढ़ते हैं, तो बिहार के करीब 50 लाख बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए वैसी व्यापक चर्चा और मदद क्यों नहीं दिखाई देती?
क्या राजनीति का शिकार बिहार की बाढ़?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2025 को बिहार के गोपालगंज में एक जनसभा के दौरान कहा था कि अगर बिहार में एनडीए की सरकार दोबारा बनती है, तो वे बिहार को हमेशा के लिए बाढ़ से मुक्त करने का काम करेंगे। इसके बावजूद, इसी गोपालगंज जिले में 30 नवंबर को छह प्रखंडों की 22 पंचायतों में बाढ़ का पानी फैलने से 2 लाख 49 हजार 9 लोग प्रभावित हुए।
बाढ़ के पानी में डूबने से गोपालगंज जिले में दो बच्चों की मौत भी हो गई। 2 अक्टूबर को रामनगर गांव में विनोद राम के 10 वर्षीय बेटे की मौत हुई, जबकि 11 अक्टूबर को गम्हारी गांव में मुन्ना मांझी के 15 वर्षीय बेटे की जान चली गई। इत्तेफाक की बात है कि दोनों बच्चों का नाम शिवम था।
ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार को बाढ़ से हमेशा के लिए मुक्त करने का वादा जमीन पर कब उतरेगा? आखिर बाढ़ की इस त्रासदी में कितने और शिवम अपनी जान गंवाएंगे?
गोपालगंज जिले के स्थानीय पत्रकार निरंजन पाठक बताते हैं, “पहले कोसी नदी की वजह से बिहार डूबा रहता था। इस बार गंडक नदी ने काफी नुकसान पहुंचाया है। तिब्बत और नेपाल के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से आए पानी और मलबे के सैलाब ने नारायणी नदी यानी गंडक के प्रवाह को प्रभावित किया है। डुमरिया घाट के पास गंडक नदी की धारा मोड़ने के लिए बनाया गया पायलट चैनल इस बार की बाढ़ में गाद और मलबे से भर गया।”

तस्वीर: महेंद्र यादव
युवा हल्ला बोल के संस्थापक और कांग्रेस प्रवक्ता अनुपम कहते हैं, “क्या आपदा की गंभीरता को लेकर पूरे देश में एक जैसी संवेदनशीलता नहीं होनी चाहिए? क्या बिहार की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं किया जाना चाहिए? अगर बिहार में लाखों लोगों की परेशानी भी राष्ट्रीय आपदा नहीं है, तो हम हाथ जोड़कर पूछते हैं कि साहब, हमें बता दीजिए कि आखिर ऐसी कौन-सी घटना होगी, जिसके बाद आप इसे राष्ट्रीय आपदा कहेंगे?”
बिहारी को भी बाढ़ की खबर मजाक लगती है
“आप सोचिए कि बरसात आएगी और बिहार में बाढ़ जरूर आएगी। जिस साल बिहार में बाढ़ नहीं आती, वह ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। मैं खुद बिहार का हूं, लेकिन बिहार में आने वाली बाढ़ मुझे एक राजनीतिक षड्यंत्र के अलावा कुछ नहीं लगती।” पुणे में रह रहे सुपौल जिले के निवासी मिहीर मिश्रा कहते हैं।
बिहार से बाहर रहने वाले 8-10 लोगों से हमारी बातचीत हुई। उनके मुताबिक, बिहार में बाढ़ आने की खबर अब उनके लिए रोजमर्रा की खबर बन चुकी है।
जब बाढ़ हर साल बिहार के लाखों लोगों की जिंदगी और आजीविका को प्रभावित करती है, तो उनकी पीड़ा राष्ट्रीय विमर्श का स्थायी हिस्सा क्यों नहीं बन पाती?
बिहार में बाढ़ एक घोटाला है।
हर साल आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए 1953-54 में कोसी परियोजना शुरू की गई थी। शुरुआत में लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया। तब तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने कोसी क्षेत्र में एक सप्ताह बिताया और लोगों को बांध निर्माण में सहयोग करने के लिए मनाया।
1955 में कोसी परियोजना के शिलान्यास के दौरान सुपौल के बैरिया गांव में सभा को संबोधित करते हुए राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, “मेरी एक आंख कोसी पर रहेगी और दूसरी आंख बाकी हिंदुस्तान पर।”
तटबंध बनाने का उद्देश्य कोसी के पानी को सीमित धारा में रोककर नुकसान कम करना था। लेकिन आज तटबंध के भीतर बसे 380 गांवों के लाखों लोग गरीबी और बदहाली में जीने को मजबूर हैं।
नदी विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्रा के मुताबिक, कोसी परियोजना का उद्देश्य करीब सवा दो लाख हेक्टेयर जमीन को बचाना था, लेकिन इसके लिए करीब 4,00,000 हेक्टेयर जमीन बर्बाद हो गई।
वर्ष 2008 में भारत-नेपाल सीमा के पास कुसहा तटबंध टूटने से भारी तबाही हुई थी। इसके बाद विश्व बैंक ने कोसी क्षेत्र के पुनर्निर्माण के लिए भारत को 14 हजार 808 करोड़ रुपये का कर्ज दिया। इसके लिए कोसी पुनर्निर्माण एवं पुनर्वास नीति को मंजूरी दी गई। कोसी परियोजना पर लगातार बड़ी रकम खर्च हो रही है, लेकिन जिन कामों के लिए पैसा दिया गया, वे आज तक जमीनी स्तर पर पूरे नहीं हो पाए हैं। तटबंध के भीतर बसे 380 गांवों के लोग खुलकर कहते हैं कि, “बिहार में बाढ़ एक घोटाला है।
2026 की बिहार बाढ़ की असली तस्वीर
वर्ष 2026 में बिहार में कम से कम 15 तटबंधों के 24 स्थानों पर टूटने की सूचना सामने आई। इन तटबंधों की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी जल संसाधन विभाग की है। इसके लिए आमतौर पर पिछले वर्ष अक्टूबर से ही सर्वेक्षण शुरू हो जाता है। इसके बाद तटबंधों की मरम्मत और कटाव रोकने से जुड़े कार्यों के प्रस्ताव तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) के सामने रखे जाते हैं। दिसंबर तक मंजूरी मिलने के बाद बचाव कार्य शुरू किए जाते हैं।

तस्वीर: महेंद्र यादव
इस साल जिन 15 तटबंधों के 24 स्थानों पर टूटने की घटनाएं हुईं, उनमें कम से कम नौ स्थान ऐसे थे, जहां संभावित खतरे की जानकारी विभाग को पहले से थी। इनमें से चार स्थानों पर सुरक्षा कार्यों को मंजूरी दी गई थी, जबकि बाकी पांच स्थानों को ‘वेट एंड वॉच’ यानी लगातार निगरानी की श्रेणी में रखा गया था।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि खतरे की पूर्व जानकारी होने के बावजूद इन स्थानों पर कटाव और तटबंध टूटने की घटनाओं को नहीं रोका जा सका। चार स्थानों पर सुरक्षा कार्यों को मंजूरी मिलने के बाद भी अपेक्षित नतीजे नहीं मिले। वहीं, बाकी पांच स्थानों पर खतरे की जानकारी होने के बावजूद ठोस सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए जा सके।
बारिश 30 प्रतिशत कम, फिर भी बिहार में बाढ़ क्यों?
बिहार में इस साल सामान्य से लगभग 30 प्रतिशत कम बारिश होने के बावजूद राज्य बाढ़ की समस्या से जूझ रहा है। कोसी परियोजना में काम कर चुके इंजीनियर अमोद कुमार झा बताते हैं, “गाद या सिल्ट की सफाई से भी बाढ़ को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। गाद या सिल्ट की समस्या हिमालय और नेपाल से आने वाली नदियों में है। पहले सिल्ट का इस्तेमाल घर बनाने में किया जाता था। इसके अलावा, सरकार भी नदियों की सफाई नहीं कराती है।”
वह आगे कहते हैं, “भारत और नेपाल के बीच अच्छे संबंध नहीं होना भी इसकी एक वजह हो सकती है। अनियोजित और अनियंत्रित विकास के कारण हमने पानी की निकासी के अधिकांश रास्ते बंद कर दिए हैं। ऐसे में बारिश कम हो या ज्यादा, पानी आखिर जाएगा कहां? सरकार की ओर से नदियों को जोड़ने की बात कही गई थी और दावा किया गया था कि इससे बाढ़ के प्रभाव को रोकने में मदद मिलेगी। लेकिन अभी तक एक भी नदी को नहीं जोड़ा गया है।” हालांकि, नदी विशेषज्ञों के एक वर्ग ने नदी जोड़ने की परियोजना को प्रकृति से खिलवाड़ भी बताया है।
बिहार के प्रसिद्ध ब्लॉगर और लेखक रंजन ऋतुराज बताते हैं, “हम बचपन से बिहार और बाढ़ के बारे में देखते और सुनते आ रहे हैं। वर्ष 2008 में बिहार की बाढ़ ने पूरे देश में हलचल मचा दी थी। बाढ़ की स्थिति इतनी दर्दनाक थी कि नोएडा में रहने वाले गैर-बिहारी लोग भी आर्थिक मदद के लिए आगे आए थे। चुनाव आते हैं, नेता भाषण देकर लोगों को प्रभावित करते हैं और वोट ले लेते हैं। इसके बाद हर साल वही कहानी दोहराई जाती है। जनता भी दो-तीन महीने तक बाढ़ की परेशानी झेलने के बाद इसे प्रकृति का प्रकोप समझकर धीरे-धीरे भूल जाती है।”
वह आगे कहते हैं, “बिहार के 38 में से 15 जिले अभी बाढ़ से प्रभावित हैं। कोई शिकायत करता है, तो सत्तापक्ष के नेता इसे अपने अहंकार से जोड़ लेते हैं। वहीं, विपक्ष के नेता इस मौके पर अपनी छवि चमकाने में लगे हैं। जिन लोगों की पूरी जमा-पूंजी ही उनके माल-मवेशी हैं, वे अपनी जान बचाएं या अपने गाय-बैलों की चिंता करें? आखिर यह कैसा जीवन है? और अगर यही जीवन है, तो ऐसा जीवन क्यों है?”











