बाज़ारों में बहार है, पर ग्राहक लाचार है!

बाजार (Market) में चमक-दमक है, मगर आम आदमी के चेहरे पर धमक नहीं, धकधक है! बाजार में उत्सव है, मगर जेब में मातम है !दुकानदार मालामाल होने की उम्मीद में है, खरीदार कंगाल होने के डर में है! बाजार में दीवाली है, मगर आम आदमी की जेब में दिवाला है! त्योहारों का मौसम है। बाजार जगमगा रहे हैं। महँगी कारों के शोरूम में रौनक है, आलीशान मकानों के विज्ञापन लोगों को सपनों का पता बता रहे हैं और सोने-हीरे की दुकानों पर खरीदारी की खबरें आ रही हैं। कंपनियाँ बिक्री के आँकड़े गिना रही हैं। कारोबारियों के चेहरे खिले हुए हैं। लगता है कि देश में पैसा ही पैसा है और हर भारतीय की जेब में लक्ष्मीजी ने परमानेंट रूम बना लिया है। क्या सचमुच ऐसा ही है?बाजार की चमक से बाहर निकलकर देखिये। कोई करोड़ों का फ्लैट खरीद रहा है, तो कोई अपने घर के डाउन पेमेंट के लिए जोड़-घटाव कर रहा है। कोई सोने के नये कंगन बनवा रहा है, तो कोई पुरानी पायजेब-बिछिया बदलकर काम चलाने की सोच रहा है। किसी के घर नई एसयूवी आ रही है, तो कोई पुरानी मोटरसाइकिल की मरम्मत करवाकर दीवाली मनाने की तैयारी में है।

एक तरफ महँगे उत्पादों की माँग और बिक्री के मूल्य में उछाल दिखाई देता है, दूसरी तरफ रोजमर्रा की वस्तुएँ बनाने वाली कंपनियों को बिक्री की मात्रा बढ़ाने में मशक्कत करनी पड़ रही है। आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या बढ़ी है, लेकिन बड़ी संख्या में रिटर्न पर कर देयता शून्य है। अर्थव्यवस्था में भी चमकते आँकड़े पूरी कहानी नहीं बताते। बिक्री के लिए रखे गये सामान का मूल्य बढ़ना और बिकने वाले सामान की मात्रा बढ़ना दो अलग बातें हैं। कंपनियों का मुनाफा बढ़ना और करोड़ों परिवारों की क्रयशक्ति बढ़ना भी एक ही बात नहीं है। दुकान पर ज़्यादा ग्राहक आने का मतलब ज्यादा माल बिकना नहीं होता।

नीलसनआईक्यू की मार्च 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर-दिसंबर 2025 में भारत के एफएमसीजी क्षेत्र की बिक्री का मूल्य सालाना आधार पर 7.8 प्रतिशत बढ़ा। इसी अवधि में बिक्री की मात्रा में वृद्धि ग्रामीण बाजारों में 2.9 प्रतिशत और शहरी बाजारों में 2.3 प्रतिशत रही। घरेलू उपयोग और व्यक्तिगत देखभाल की वस्तुओं में मात्रा की वृद्धि केवल 1.9 प्रतिशत थी। मतलब यह नहीं कि बाजार ठप हो गया। ग्रामीण बाजारों ने शहरी बाजारों से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन बिक्री के मूल्य में वृद्धि और वास्तविक खपत की गति के बीच अंतर जरूर दिखाई देता है।

दुकान में सजावट, जेब में अमावस !

मान लीजिए, साबुन की एक टिकिया महँगी हो गई। पहले ग्राहक महीने की दस टिकिया खरीदता था, अब आठ खरीद रहा है। कीमत बढ़ने के कारण कंपनी की कमाई में बड़ी गिरावट नहीं आई, लेकिन ग्राहक के घर में साबुन की टिकिया कम पहुँच रही हैं। कंपनी का हिसाब ठीक दिख सकता है, मगर ग्राहक का हिसाब गड़बड़ा सकता है। कभी पैकेट छोटा हो जाता है, कभी कीमत बढ़ जाती है और कभी ग्राहक महँगे ब्रांड से सस्ते ब्रांड की तरफ चला जाता है। बाजार की भाषा में बिक्री का मूल्य बढ़ सकता है, लेकिन घर की भाषा में ग्राहक कहता है – भैया, पैसा तो पूरा लगा, सामान पहले से कम आया। इसीलिए अर्थव्यवस्था का आकलन केवल बिक्री के रुपये गिनकर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि कितनी वस्तुएँ बिकीं, कीमतों में कितना बदलाव आया और परिवारों की वास्तविक आय में कितनी वृद्धि हुई।दुकान की सजावट और बिल देखकर ही ग्राहक की संतुष्टि तय नहीं होती।

भारत में सोना केवल धातु नहीं है। यह परंपरा है, प्रतिष्ठा है, शादी-ब्याह की तैयारी है और मुश्किल समय की बचत भी है, लेकिन सोने के बाजार के आँकड़े बताते हैं कि अधिक खर्च होने का अर्थ हमेशा अधिक सोना खरीदना नहीं होता। वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल की जुलाई 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 में भारत में सोने की कुल माँग 131 टन रही, जो पिछले साल की समान तिमाही से 6 प्रतिशत कम थी। इसके बावजूद सोने पर कुल खर्च लगभग 1.979 लाख करोड़ रुपये रहा, जो सालाना आधार पर 50 प्रतिशत अधिक था। आभूषणों की माँग मात्रा में 15 प्रतिशत घटी, लेकिन उन पर खर्च का मूल्य 34 प्रतिशत बढ़ा। विरोधाभास ये है कि सोना कम खरीदा गया, लेकिन उस पर खर्च ज्यादा हुआ। इसकी प्रमुख वजह ऊँची कीमतें थीं। यानी जेब से पैसा ज्यादा निकला, लेकिन हाथ में सोना कम आया। इसे समृद्धि का सीधा प्रमाण मान लेना वैसा ही होगा, जैसे महँगी दवा खरीदने वाले को स्वस्थ घोषित कर देना।

जिन परिवारों की आय मजबूत है, वे ऊँची कीमतों के बावजूद सोना खरीद सकते हैं। लेकिन सीमित बजट वाले परिवार खरीदारी घटा सकते हैं, उसे टाल सकते हैं या पुराने गहने बदलकर काम चला सकते हैं। यही अंतर महँगे मकानों और लग्जरी कारों के बाजार में भी समझना चाहिए। करोड़ों रुपये के फ्लैट बिकना अर्थव्यवस्था के एक हिस्से की मजबूती का संकेत है, पूरे देश की आर्थिक स्थिति का प्रमाणपत्र नहीं।

प्रीमियम बाज़ार और मुफस्सिल ग्राहकी !

लग्जरी कारों की माँग बढ़े, महँगे मकान बिकें और प्रीमियम उत्पादों का कारोबार बढ़े, तो इसमें बुराई क्या है? इन क्षेत्रों से कंपनियों को मुनाफा मिलता है, निवेश को प्रोत्साहन मिलता है और निर्माण, परिवहन तथा सहायक उद्योगों को काम मिलता है, लेकिन एक सवाल फिर भी बचता है : क्या किफायती मकानों की उपलब्धता भी बढ़ रही है? क्या सामान्य वेतनभोगी परिवार घर खरीदने की स्थिति में हैं? क्या रोजगार से मिलने वाली आय मकान की किस्त, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्च के बाद कुछ बचत करने देती है? शहरों में करोड़ों रुपये के फ्लैट बिक रहे हों और उसी शहर में परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा किराये पर खर्च कर रहे हों, तो दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं। यह विरोधाभास नहीं, अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों की अलग स्थिति है। प्रीमियम बाजार को कोसना समाधान नहीं है। सवाल यह है कि वहाँ पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधि का लाभ व्यापक समाज तक कैसे पहुँचे।

बड़े उद्योगों का निवेश छोटे कारोबारों को काम दे, निर्माण से रोजगार निकले, रोजगार से आय बढ़े और आय से रोजमर्रा की खपत मजबूत हो। तभी विकास की गाड़ी के सभी डिब्बे आगे बढ़ेंगे। अगर बाजार की कमाई कुछ ही जेबों में सिमटती जाए तो महँगे शोरूमों में रौनक के बावजूद छोटे दुकानदारों की दुकान फीकी रह सकती है। बाजार में पैसा घूमना चाहिए, सिर्फ गिने-चुने लोगों की तिजोरी में सोना नहीं बढ़ना चाहिए।

आधी कमाई का खर्चा पेट भरने में !

ग्रामीण भारत की कहानी भी एक रंग की नहीं है। वहाँ उपभोग बढ़ा है, लेकिन उसकी गति और संरचना को समझना जरूरी है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, ग्रामीण भारत में औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय 4,122 रुपये था, जबकि शहरी भारत में यह 6,996 रुपये था। ग्रामीण परिवारों के कुल उपभोग व्यय का 47.04 प्रतिशत भोजन पर खर्च होता था। शहरी परिवारों के लिए यह हिस्सा 39.68 प्रतिशत था। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर ग्रामीण परिवार गरीब हो रहा है या उसका खर्च घट रहा है। सर्वेक्षण में उपभोग व्यय में वृद्धि दर्ज हुई थी। मगर यह अंतर बताता है कि ग्रामीण परिवारों के बजट में भोजन की हिस्सेदारी अधिक है और दूसरी जरूरतों के लिए उपलब्ध गुंजाइश सीमित हो सकती है।

किसान की फसल अच्छी हुई, तो भी जरूरी नहीं कि उसकी जेब में नोटों की गड्डी बची हो। खाद, बीज, डीजल, सिंचाई और मजदूरी का खर्च निकालने के बाद जो बचता है, वही उसकी वास्तविक कमाई है। मजदूर की मजदूरी बढ़े, लेकिन साथ में राशन, दवा और बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी बढ़ जाए, तो अतिरिक्त आमदनी का बड़ा हिस्सा वहीं खप जाता है। आमदनी बढ़ने का फायदा तभी है, जब खर्च निकालने के बाद कुछ बचे भी। यदि आमदनी का आम महँगाई खा जाए और बचत की गुठली भी हाथ न आए, तो उपभोग कैसे बढ़ेगा? ग्रामीण बाजारों की हालत समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि कितने मोबाइल बिके या कितनी मोटरसाइकिलें खरीदी गईं। यह भी देखना होगा कि परिवार भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा का खर्च पूरा करने के बाद दूसरी वस्तुओं पर कितना खर्च कर सकता है। गाँव का बाजार तभी सचमुच फलेगा-फूलेगा, जब खेती के साथ ग्रामीण उद्योग, छोटे कारोबार और नियमित रोजगार भी आय के स्रोत बनेंगे।

इनकम टैक्स रिटर्न जमा, पर रूपये नहीं!

वित्त वर्ष 2024-25 में 31 दिसंबर 2024 तक 8.39 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल किए गए थे। इनमें 5करोड़ 57 लाख रिटर्न शून्य कर देयता वाले थे। वित्त मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में ऐसे रिटर्न की संख्या लगभग साढ़े पांच करोड़ करोड़ थी। यह आँकड़ा चौंकाता है। रिटर्न की संख्या बड़ी है, लेकिन उनमें से बहुत सारे रिटर्न पर कर देयता शून्य है। शून्य कर देयता का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति की कोई आय नहीं थी। उसकी आय कर-मुक्त सीमा में हो सकती है या लागू नियमों के अनुसार छूट और रिबेट के बाद उसे कर नहीं देना पड़ सकता है। रिटर्न की संख्या और अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या में भी अंतर हो सकता है, क्योंकि संशोधित रिटर्न दाखिल किए जा सकते हैं। इसलिए असली सवाल यह है कि रिटर्न दाखिल करने वालों में कितने लोग वास्तव में आयकर चुका रहे हैं? अलग-अलग आय-वर्गों में आय और कर भुगतान की स्थिति कैसी है? क्या करदाताओं की संख्या बढ़ने के साथ स्थिर और अच्छी आय वाले रोजगार भी बढ़ रहे हैं? रिटर्न भरना और कर चुकाना दो अलग बातें हैं; जैसे दुकान में घुसना और सामान खरीदना अलग-अलग बातें हैं। आयकर रिटर्न की संख्या बढ़ना प्रशासनिक उपलब्धि हो सकती है। मगर व्यापक खुशहाली का सवाल इससे आगे जाता है। कितने लोगों को बेहतर रोजगार मिला? कितने लोगों की वास्तविक आय बढ़ी? कितने परिवार अपनी जरूरतें पूरी करने के बाद बचत कर पा रहे हैं?

अर्थव्यवस्था का पहिया चलाने के लिए जेब में पैसा भी चाहिए !

भारत की अर्थव्यवस्था में घरेलू उपभोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। करोड़ों परिवार जब अधिक वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदते हैं, तो दुकानदारों, छोटे उद्योगों, परिवहन और सेवा क्षेत्र को काम मिलता है। लेकिन यदि उपभोग की वृद्धि मुख्यतः ऊँची आय वाले परिवारों और महँगे उत्पादों तक सीमित रहे, तो अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से तेजी से आगे बढ़ सकते हैं और कुछ पीछे रह सकते हैं। इसका समाधान अमीरों की खरीदारी रोकना नहीं है। समाधान यह है कि अधिक लोगों की आय बढ़े और उन्हें खर्च करने की क्षमता मिले।

पहली जरूरत है रोजगार की गुणवत्ता सुधारना। नियमित काम, समय पर मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा परिवारों को भविष्य का भरोसा देते हैं। श्रम-प्रधान विनिर्माण, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन और छोटे उद्योग इसमें योगदान दे सकते हैं। दूसरी जरूरत है ग्रामीण आय के स्रोत बढ़ाना। खेती के साथ प्रसंस्करण, भंडारण, सिंचाई, स्थानीय उद्योग और गैर-कृषि रोजगार को प्रोत्साहन देना होगा। तीसरी जरूरत है छोटे कारोबारों को सहारा देना। उन्हें आसान ऋण, समय पर भुगतान, स्थिर नियम और बाजार तक पहुँच चाहिए। छोटे कारोबार चलेंगे, तो स्थानीय रोजगार और माँग भी मजबूत होगी।

चौथी जरूरत है महँगाई और जरूरी खर्च पर ध्यान देना। कीमतों में वृद्धि की रफ्तार घटने का मतलब यह नहीं कि कीमतें पुराने स्तर पर लौट आईं। परिवारों के बजट में भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास का बोझ कितना है, यह देखना जरूरी है। पाँचवीं जरूरत है कर राजस्व को उत्पादक निवेश में लगाना। शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, सार्वजनिक परिवहन और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे पर खर्च लोगों की कमाई की क्षमता बढ़ा सकता है। कर व्यवस्था सरल हो और लोगों को अधिक उत्पादक रोजगार के अवसर मिलें, तो कर आधार भी व्यापक हो सकता है। सरकार को विकास की सफलता मापने के लिए बिक्री के मूल्य के साथ वास्तविक खपत, महँगाई समायोजित आय, रोजगार, मजदूरी और छोटे कारोबारों की स्थिति को भी देखना चाहिए।

दीये बाजार में ही नहीं, घरों में भी जलें !

त्योहारों में बाजार की चमक अच्छी खबर है। महँगे मकान बिकें, कारों की बिक्री बढ़े, सोने की माँग मजबूत हो और कंपनियाँ निवेश करें तो इससे अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों को लाभ मिलता है लेकिन इसी के साथ यह भी देखना होगा कि रोजमर्रा की वस्तुओं की बिक्री मात्रा क्यों धीमी है, ग्रामीण आय कितनी स्थिर है, रोजगार से मिलने वाली कमाई जीवन-यापन की लागत के मुकाबले कितनी बढ़ रही है और आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों में वास्तविक करदाताओं की स्थिति क्या है। एक तरफ रिकॉर्ड खर्च और दूसरी तरफ सीमित खपत के संकेत अपने आप में किसी आर्थिक संकट का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। लेकिन वे एक गंभीर जाँच की जरूरत जरूर बताते हैं।

देश में ऐसे परिवारों की संख्या बढ़नी चाहिए जो सिर्फ त्योहार पर खरीदारी करने का सपना न देखें, बल्कि अपनी आय से उसे पूरा भी कर सकें। किफायती घरों की उपलब्धता बढ़े। छोटे कारोबारों की बिक्री बढ़े। ग्रामीण परिवार भोजन और दवा का खर्च निकालने के बाद भी कुछ बचत कर सकें। युवाओं को ऐसा रोजगार मिले जिसमें भविष्य का भरोसा हो।

अर्थव्यवस्था की असली सफलता यह नहीं कि कुछ लोग कितनी महँगी चीजें खरीद सकते हैं, बल्कि यह है कि कितने लोगों के लिए जरूरी चीजें खरीदना आसान हुआ है। त्योहारों की रोशनी तभी सार्थक होगी, जब वह केवल बड़े शोरूमों के शीशों पर नहीं चमकेगी, बल्कि छोटे दुकानदार की बिक्री, किसान की बचत, मजदूर की मजदूरी और आम परिवार की जेब में भी दिखाई देगी वरना बाजार में तो खूब दीये जलेंगे, मगर घरों में उजाला करने के लिए तेल जुटाने की चिंता बनी रहेगी।

–डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

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