फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे नियुक्ति! 25 साल बाद प्रकाशन विशेषज्ञ छत्तीसगढ़ संवाद से बाहर

रायपुर। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) संवाद में करीब 25 साल तक प्रकाशन विशेषज्ञ के पद पर कार्यरत रहे सव्यसाची कर की सेवाएं विभागीय जांच के बाद समाप्त कर दी गई हैं। नियुक्ति के दौरान प्रस्तुत फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे पात्रता हासिल करने के मामले में हुई जांच में उनकी अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता और पांच वर्ष का अनुभव प्रमाणित नहीं हुआ।

छत्तीसगढ़ संवाद के अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 5 अक्टूबर 2026 को आदेश जारी कर उनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दीं।

मामला वर्ष 2001 में हुई संविदा नियुक्ति का है। उस समय प्रकाशन विशेषज्ञ पद के लिए किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में प्रथम श्रेणी की डिग्री अथवा डिप्लोमा और संबंधित प्रबंधकीय कार्य में कम से कम पांच वर्ष का अनुभव अनिवार्य था।

जांच में पाया गया कि सव्यसाची कर ने नेशनल डिप्लोमा इन डिजाइन (ग्राफिक डिजाइन) प्रस्तुत किया था। विभाग ने इसे विज्ञापन में निर्धारित प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की योग्यता के समकक्ष नहीं माना।

पांच साल के अनुभव का प्रमाणपत्र भी सवालों में

सव्यसाची कर ने पांच वर्ष के अनुभव के समर्थन में ‘मे. युगबोध डिजिटल प्रिंटर्स’ का 4 नवंबर 2001 का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था। जांच में उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक संबंधित व्यवसाय का पंजीकरण वर्ष 1998 में हुआ था। विभागीय जांच में इस प्रमाणपत्र के आधार पर पांच वर्ष का अनुभव प्रमाणित नहीं हुआ।

मामला इसलिए भी गंभीर है कि सव्यसाची कर की नियुक्ति 4 अक्टूबर 2001 को हुई थी, जबकि अनुभव प्रमाणपत्र 4 नवंबर 2001 को जारी किया गया। सव्यसाची कर ने अपने जवाब में संबंधित व्यवसाय के पहले दूसरे नामों से संचालित होने की बात कही, लेकिन जांच में इसके समर्थन में संतोषजनक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए।

25 साल की सेवा भी नहीं बचा सकी नियुक्ति

आदेश में वर्ष 2013 में हुई जांच का भी उल्लेख है। सव्यसाची कर से संबंधित हाईकोर्ट की याचिकाओं WPS 6338/2011 और WPS 5378/2020 का भी इसमें संदर्भ दिया गया है। 2021 के आदेश के हवाले से विभाग ने कहा कि सव्यसाची कर को प्रकाशन विशेषज्ञ के पद पर पुष्ट कर्मचारी नहीं माना गया था।

विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि करीब 25 साल तक सेवा करने से नियुक्ति के समय निर्धारित अनिवार्य योग्यता की कमी पूरी नहीं हो जाती।

नोटिस और सुनवाई के बाद फैसला

सव्यसाची कर को 13 अगस्त 2026 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। उन्होंने लिखित जवाब दिया और 29 सितंबर 2026 को व्यक्तिगत सुनवाई में अपना पक्ष रखा। उनके द्वारा प्रस्तुत अतिरिक्त दस्तावेजों को भी जांच में शामिल किया गया। इसके बाद विभाग ने सेवाएं समाप्त करने का फैसला लिया।

सेवाएं समाप्त, किसी पद पर भी नहीं रह सकेंगे

5 अक्टूबर के अंतिम आदेश में कहा गया है कि–

सव्यसाची कर की प्रकाशन विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त की जाती हैं।

उन्हें छत्तीसगढ़ संवाद में वर्तमान अथवा किसी अन्य पद पर पदधारी नहीं माना जाएगा।

नियमानुसार देय राशि, यदि कोई हो, का अलग से निराकरण किया जाएगा।
आदेश तत्काल प्रभाव से लागू होगा।

अब सवाल नियुक्ति प्रक्रिया पर

इस कार्रवाई के बाद सवाल केवल सव्यसाची कर तक सीमित नहीं है। यदि नियुक्ति के समय अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता और पांच वर्ष के अनुभव की शर्तें पूरी नहीं थीं और फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर पात्रता साबित की गई, तो 2001 में नियुक्ति के दौरान इन प्रमाणपत्रों की जांच किस स्तर पर हुई?

और जब 2013 में भी मामले की जांच हो चुकी थी, तो उसके बाद भी सव्यसाची कर करीब 13 वर्ष तक सेवा में कैसे बने रहे?

सबसे अहम सवाल यह है कि यदि अब विभाग ने नियुक्ति के मूल आधार को ही खारिज कर दिया है, तो उस समय नियुक्ति को मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी या नहीं?

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