नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन ने जो कहा है वो बेहद महत्वपूर्ण हैं। राजकोट के राजकुमार कॉलेज में ‘ संविधान और आम आदमी ‘ विषय पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा केि ‘आप सभी ने देखा है कि पश्चिम बंगाल चुनावों में 90 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया था; यह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है। 90 लाख मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने से सर्वोच्च न्यायालय पर इतना प्रभाव नहीं पड़ा कि इस पर रोक लगा दी जाए। मताधिकार से वंचित लोगों में से लगभग 22 लाख मतदाताओं ने अपील दायर की। बाकी वे लोग होंगे जिनके पास न्याय पाने के साधन या पहुँच नहीं है। और इन 22 लाख मतदाताओं में से लगभग 1 लाख मतदाताओं की अपीलें 93% मतदाताओं के पक्ष में तय की गईं।
जास्टिस नरीमन ने कहा केि आप कल्पना कर सकते हैं कि यह पूरी तरह से अवैध था, आम आदमी, भारत के नागरिक को मताधिकार से वंचित करना ताकि सरकार अपना लाभ प्राप्त कर सके। यह जो चाहता है, वही करता है। और पश्चिम बंगाल में हमने देखा कि इसने तत्कालीन सरकार को हटाकर केंद्र सरकार को सत्ता में लाया। आज हमारे देश में जो कुछ हो रहा है, वह बहुत ही चिंताजनक है।
नरीमन ने इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों पर आपत्ति जताई थी । उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दोनों सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के निर्णय पर आपत्ति जताई, तो उन्होंने 2023 अधिनियम की धारा 18 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग क्यों नहीं किया, जो चुनाव आयोग के भीतर 2/3 बहुमत के निर्णय को मान्य होने की अनुमति देती है।
“उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि वे भी वर्तमान सरकार द्वारा नियुक्त किए गए थे। तो आज स्थिति क्या है? अखबार में बताया गया है कि इन तीनों सज्जनों के बीच कुछ सुलह हो गई है, जो राष्ट्र के लिए बहुत हानिकारक है। उन्होंने एक साझा बयान जारी किया है जिसमें कहा गया है, हां, आप लोगों द्वारा उठाई गई कुछ आपत्तियां सही प्रतीत होती हैं। हम पुराने प्रारूप 6 पर वापस लौटेंगे, इत्यादि…। इसलिए, आज हमारे संविधान के तहत आम आदमी, और अगर मैं कहूं तो संविधान का मूल और लोकतंत्र का मूल, यानी मतदान का अधिकार, गंभीर खतरे में है।”
न्यायमूर्ति नरीमन ने अपने निष्कर्ष में कहा कि उन्हें आशा और विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय इस स्थिति से निपटने के लिए तत्पर है। उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय और वह संस्था जिससे मैं कभी जुड़ा रहा, तुरंत हस्तक्षेप करेगी और इन कमियों को दूर करेगी। ऐसा चुनाव आयोग नहीं चल सकता जो इस तरह से कार्य करे या कुप्रबंधित हो। इसलिए संविधान और आम जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया है। संविधान पीठ जितनी जल्दी यह निर्णय ले ले कि प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित व्यक्ति जैसे किसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिए, जो सर्वश्रेष्ठ नामों का चयन करे, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वोटों का परिणाम उनके अपेक्षित परिणामों में परिवर्तित हो।”
इसके अलावा जस्टिस उज्जल भुइयां ने हैदराबाद की NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके तहत व्यापक पैमाने पर भारतीय नागरिकों को उनके वोट करने के अधिकार से दूर कर दिया जाए और वे वोट देने के हक के बिना रह जाएं तो वो प्रक्रिया मनमानी है। यह संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का सीधा उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट आज मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने और चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने वाला है।











