फिर घिरे ज्ञानेश, अब बंगाल ट्रिब्यूनल के 19 जजों ने चुनाव आयोग के पोर्टल पर जताई आपत्ति

Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पश्चिम बंगाल में एसआईआर अपीलों जिनमें 27 लाख हटाए गए वोटर भी शामिल हैं पर सुनवाई के लिए एक दर्जन से ज्यादा ट्रिब्यूनल जज नियुक्त किए गए थे। इन जजों ने चुनाव आयोग(election Commission) के आईटी डिविजन की ओर से बनाए गए डिजिटल पोर्टल में मौजूद गंभीर कमियों को उजागर किया है।

आधिकारिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि उन्होंने शिकायत की थी कि पोर्टल उन्हें पक्षों को नोटिस भेजने की अनुमति नहीं देता, जिससे अपीलों के निपटारे में देरी हो रही थी। यह पोर्टल ट्रिब्यूनल को अपील करने वाले वोटरों से अतिरिक्त दस्तावेज अपलोड करने, वर्चुअल सुनवाई करने या हटाए गए वोटर का नाम वापस जोड़ने की सुविधा भी नहीं देता। जजों का कहना है कि यह अपील करने वालों को ट्रिब्यूनल के आदेश डाउनलोड करने की सुविधा भी नहीं देता।

एक दर्जन से ज्यादा न्यायाधीशों ने जताई आपत्ति

समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस को मिली जानकारी के अनुसार, ये चिंताएं 11 अगस्त को ट्रिब्यूनल के एक दर्जन से ज्यादा जजों (कुल 19 न्यायाधीश हैं) की बैठक के कार्यवृत्त में दर्ज हैं और इन्हें भारत के चुनाव आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया गया था।

पिछले महीने इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में खुलासा हुआ था कि दो चुनाव आयुक्तों ने मतदान के अधिकार से संबंधित कई फैसलों पर 10 महीनों में 14 आपत्तियां दर्ज कराई थीं। उनकी प्रमुख चिंताओं में से एक यह थी कि नागरिकों और अधिकारियों के लिए चुनाव आयोग का मुख्य डिजिटल सिस्टम ईसीआईएनईटी (ECINET), मतदाता सूची को अंतिम रूप देने के लिए जिम्मेदार जमीनी स्तर के अधिकारियों की पहुंच को सीमित करती है। इसके बाद, चुनाव आयोग ने घोषणा की कि वह ईसीआईएनईटी की समीक्षा करने और कानून के अनुपालन की दोबारा जांच करने के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ के साथ एक समिति का गठन करेगा।

ट्रिब्यूनल के जजों ने जिन दिक्कतों की ओर इशारा किया है, वे असल में हटाए गए वोटरों के मामले में सही प्रक्रिया का पालन करने में बाधा बन रही हैं। 1 अक्टूबर को इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को ईमेल भेजकर न्यायाधीशों की चिंताओं पर उनकी प्रतिक्रिया और क्या इन चिंताओं का समाधान किया गया है, इस बारे में पूछा। कोई जवाब नहीं मिला।


जजों की ओर से दर्ज की गई प्रमुख चुनौतियां
11 अगस्त की कार्यवाही में न्यायाधीशों के सामने आने वाली चुनौतियों का रिकॉर्ड दर्ज है।

  • नोटिस भेजने में असमर्थ: “अब तक ऐसा कोई सिस्टम नहीं बना है। कई बार अनुरोध और रिमाइंडर भेजने के बावजूद, पोर्टल पर पार्टियों को सीधे या सही चैनल के जरिये नोटिस भेजने के लिए कोई सामान्य और सही सिस्टम नहीं बनाया गया है। मई 2026 में हममें से कुछ लोगों ने पार्टियों को भेजे जाने वाले नोटिस का एक फॉर्मैट भी मंजूर किया था, लेकिन उस पर आज तक कोई काम नहीं हुआ है।”
  • दस्तावेजों को संग्रहित नहीं किया जा सकता: “जब ट्रिब्यूनल को अपलोड किए गए दस्तावेज एन्यूमरेशन फॉर्म के अनुरूप नहीं मिलते हैं या जब भी ट्रिब्यूनल को अतिरिक्त दस्तावेजों की जरूरत होती है, तो उन्हें हासिल करने का कोई तंत्र नहीं है। पोर्टल पर ऐसे तंत्र के अभाव में, प्रत्येक ट्रिब्यूनल ई-मेल के माध्यम से, यानी संबंधित डीएम/डीईओ के माध्यम से नोटिस भेजने का प्रयास कर रहा है, लेकिन प्रतिक्रिया बहुत ही निराशाजनक है।”
  • वर्चुअल सुनवाई संभव नहीं: “यदि ट्रिब्यूनल पक्षों की सुनवाई करना चाहता है तो वर्चुअल सुनवाई आयोजित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। एक बार मतदाता को हटाने या शामिल करने के माध्यम से अपील का निपटारा हो जाने के बाद, न्यायिक आदेश के निर्देश या किसी अन्य कारण से यदि बहाली की जरूरत हो तो इसे पोर्टल पर बहाल नहीं किया जा सकता है।”
  • अपीलकर्ता को आदेश की प्रति नहीं दी जा सकती: पक्षकारों के लिए यह जानने की कोई प्रक्रिया नहीं है कि उनका नाम क्यों हटाया गया या क्यों शामिल किया गया। उन्हें ट्रिब्यूनल के आदेश की प्रमाणित प्रति हासिल करने या तय पोर्टल से डाउनलोड करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह बात इसलिए अहम है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल के अपने आदेश में ट्रिब्यूनल से कहा था कि वे अपील पर फैसला लेने से पहले कारण बताएं और रिकॉर्ड की दोबारा जांच करें।
  • फिजिकल रिकॉर्ड को डिजिटल नहीं कर सकते: न्यायाधीशों ने जिला मजिस्ट्रेट/जिला निर्वाचन अधिकारियों के पास भौतिक रूप से दायर की गई अपीलों को लेकर अनिश्चितता का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, “इन अपीलों के रिकॉर्ड को बनाए रखने का कोई सही तरीका नहीं है क्योंकि इन्हें डिजिटल नहीं किया गया है। अगर इन अपीलों को उचित माध्यम से नहीं पहुंचाया गया तो ऐसे नागरिकों के साथ अन्याय होगा।”

    संयोगवश, 6 अप्रैल को ही सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मतदाता मोस्तारी बानू की याचिका की सुनवाई के दौरान उठाए गए इसी मुद्दे को स्वीकार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 6 अप्रैल के आदेश में कहा था, “ईसीआई ने 20.03.2026 को अधिसूचित किया था कि अपीलें या तो ईसीआई नेट प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन या डीएम/एसडीएम/एसडीओ के कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से दाखिल की जा सकती हैं, जो अपील के डिजिटलीकरण और ईसीआई नेट प्लेटफॉर्म पर जल्द से जल्द अपलोड करने को सुनिश्चित करेंगे।”

एक अन्य न्यायाधीश ने मई में शिकायत दर्ज की

इससे पहले भी एक चेतावनी जारी की गई थी। 22 मई को ट्रिब्यूनल के एक न्यायाधीश ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस बात पर प्रकाश डाला कि नोटिस भेजने की व्यवस्था स्थापित करने का मुद्दा उठाया गया था, लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया। न्यायाधीश ने लिखा, “अपील के पक्षों को सूचित करने की ऐसी व्यवस्था का अभाव अपीलों के निपटारे की गति को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।”

न्यायाधीश ने चुनाव आयोग की ओर से साझा किए जा रहे अपीलों के निपटारे से संबंधित सटीक आंकड़ों की कमी पर भी प्रकाश डाला। पत्र में कहा गया, “दुर्भाग्यवश, ‘चुनाव आयोग के सूत्रों’ के माध्यम से निपटारे की संख्या के संबंध में प्रेस को गलत आंकड़े दिए जा रहे हैं, जिससे यह तथ्य छिपाया जा रहा है कि चुनाव आयोग अपील की सुनवाई के लिए पक्षों को नोटिस जारी करने की उचित व्यवस्था स्थापित करने में सक्षम नहीं है।”

अपील प्रक्रिया पर संकट के बादल


ट्रिब्यूनल के जजों की इन चिंताओं से सुप्रीम कोर्ट के आदेश वाली उस खास अपील प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है, जिसका मकसद लिस्ट से हटाए गए 27 लाख वोटरों को अपना पक्ष रखने का मौका देना था। पश्चिम बंगाल में विवादित एसआईआर प्रक्रिया का एक अनूठा पहलू ट्रिब्यूनल हैं। एसआईआर के दौरान मतदाताओं की ओर से पेश दस्तावेजों के आधार पर तार्किक विसंगतियों और अपरिभाषित मतदाताओं की पहचान चुनाव आयोग ने एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने की थी।

पश्चिम बंगाल में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए 20 फरवरी को राज्य में मतदाताओं की पात्रता पर निर्णय लेने के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का आदेश दिया था। आयोग ने अपने सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हुए उनके दस्तावेजों में पाई गई तार्किक विसंगतियों के आधार पर 60.06 लाख मतदाताओं की एक सूची तैयार की थी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त बंगाल, ओडिशा और झारखंड के सैकड़ों न्यायिक अधिकारियों ने इन मामलों की जांच की और अंततः अप्रैल में राज्य में विधानसभा चुनावों के मतदान से कुछ हफ्ते पहले 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए।

प्रभावित लोगों को अपील का मौका देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च को रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों वाले अपील ट्रिब्यूनल बनाने का आदेश दिया था। तब से, दो जजों ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया है। पता चला है कि उनके स्थान पर अन्य पूर्व न्यायाधीशों को नियुक्त किया गया है।

पश्चिम बंगाल में पिछले अप्रैल में हुए दो चरणों के चुनावों में बीजेपी को भारी बहुमत से जीत मिली। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने दावा किया कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण उसे हार का सामना करना पड़ा, लेकिन यह आरोप तथ्यात्मक से अधिक राजनीतिक है। मतदान में शामिल 293 सीटों में से 49 सीटों पर मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण जीत का अंतर कम हो गया। इन सीटों पर लगभग दोनों पक्षों को बराबर वोट मिले, बीजेपी ने 26 और टीएमसी ने 21 सीटें जीतीं।

चुनाव आयोग ने अपील प्रक्रिया का कोई आंकड़ा जारी नहीं किया था, जब तक कि 18 सितंबर को एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट में जानकारी नहीं दी गई। तब बताया गया कि 38.31 लाख अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें से 10 सितंबर तक सिर्फ 1.26 लाख का निपटारा हुआ था। कुल अपीलों में से, 22.21 लाख अपीलें उन वोटरों ने दायर की थीं जिनके नाम हटा दिए गए थे और 16.10 लाख अपीलें नाम शामिल किए जाने के खिलाफ (यानी नाम हटाने की मांग के लिए) दायर की गई थीं।

चुनाव से पहले न्यायिक अधिकारियों की ओर से 60 लाख नामों के निपटारे के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक अन्य पोर्टल में भी समस्याएं थीं, जिनका मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान उठाया गया था।

10 मार्च के आदेश में क्या कहा गया?

10 मार्च के आदेश में कहा गया, “माननीय मुख्य न्यायाधीश के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों ने एक गंभीर चिंता व्यक्त की है, जो भारत निर्वाचन आयोग के स्तर पर हुई किसी गलती के कारण उत्पन्न हुई प्रतीत होती है। चुनाव आयोग के विद्वान वरिष्ठ वकील ने आश्वासन दिया है कि इसे बिना किसी देरी के तुरंत ठीक कर दिया जाएगा। हम दृढ़तापूर्वक अनुशंसा करते हैं कि भारत निर्वाचन आयोग कलकत्ता हाई कोर्ट और सभी न्यायिक अधिकारियों को उन जिम्मेदारियों को पूरा करने में पूर्ण लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करे जो हमने उन्हें दिनांक 24.02.2026 के अपने आदेश के माध्यम से सौंपी हैं।”

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