काशी का अस्पताल, खाड़ी का कर्ज और बैंक की महंगी रकम

वाराणसी घोषणाओं की राजधानी है। हो भी क्यों नहीं, यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र जो है। यहाँ हर घोषणा में वर्ल्ड क्लास निर्माण की बात होती है, उसमें भारी फॉरेन इन्वेस्टमेंट का दावा और गरीबों के लिए तोहफा जैसे परमानेंट लफ़्ज़ होते हैं। ऐसे ही 2014 में वाराणसी में भव्य अस्पताल (hospital)बनाने का सपना दिखाया गया था।

एनआरआई उद्योगपति बीआर शेट्टी और उनकी कंपनी ‘बीआर लाइफ’ द्वारा कबीर चौरा मठ की पांच एकड़ जमीन पर 400 करोड़ के निवेश से 500 बेड का सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल बनाने का ऐलान हुआ था। 2019 में अस्पताल बन जाना था, इसके लिए एमओयू साइन हुआ और प्रारंभिक काम के नाम पर करीब 24 करोड़ रुपये की सरकारी राशि भी जारी कर दी गई थी। लेकिन तय सीमा बीतने के बाद भी जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी।

मीडिया की खबरों के बाद फरवरी 2020 में शिलान्यास की ईंट रखी गई। कहा गया कि अस्पताल 400 करोड़ में नहीं, 1000 करोड़ रुपये के खर्च से बनेगा। अस्पताल की छत पर हेलीपैड भी। कहा गया कि इस अस्पताल का मकसद पैसा नहीं, काशीवासियों की सेवा है। निर्माण 2022 तक पूरा होना था। कबीर चौरा मठ की शर्त थी कि अस्पताल संत कबीर के नाम पर रहेगा और कुछ बेड मठ के लिए आरक्षित रहेंगे। कहा गया कि अस्पताल का मकसद पैसा नहीं, काशीवासियों की सेवा है।

समय बीता। जमीन पर वह अस्पताल नहीं बना। न टावर उठा, न ओपीडी खुली, न नया बेड आया। वादा रह गया, तस्वीरें रह गईं, मरीज वहीं रह गए जहां पहले थे।

पहले अस्पताल की भूमि की बात साफ कर लेनी चाहिए। कबीर चौरा मठ, कबीरचौरा मंडलीय अस्पताल और शेट्टी वाला प्रस्तावित अस्पताल अलग अलग हैं। शेट्टी वाली योजना समाचारों के अनुसार शिवपुर-कबीरबाग यानी वरुणापार की मठ-भूमि पर थी। कबीरचौरा का श्री शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय अलग सरकारी परिसर है। निजी चमक वाली इमारत नहीं नहीं बन पाई और उसके मालिक ने सरकारी बैंक ऑफ़ बड़ौदा को अरबों का चूना लगा दिया।

घोटालेबाज़ निकला एनआरआई शेट्टी

बी.आर. शेट्टी कर्नाटक के उडुपी क्षेत्र से हैं। सत्तर के दशक में वे मामूली पूंजी लेकर अबू धाबी गये थे । 1975 में न्यू मेडिकल सेंटर की नींव पड़ी, जो बाद में एनएमसी हेल्थ बना। समूह यूएई का बड़ा निजी स्वास्थ्य तंत्र बना। कंपनी लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हुई और एक समय एफटीएसई 100 में जगह पाई। शेट्टी परोपकारी उद्योगपति की छवि रखते थे। स्वास्थ्य और सेवा का यह मेल उन्हें सेलेब्रिटी बनाता है।

भारत में उनका काम बीआर लाइफ ब्रांड के तहत चला। बेंगलुरु, भुवनेश्वर, तिरुवनंतपुरम और उडुपी के अस्पताल इसी शृंखला में थे। दावा था कि देश में करीब पंद्रह सौ बेड पहले से हैं और आगे बड़े निवेश से हजारों बेड जुड़ेंगे। एक साक्षात्कार में शेट्टी ने दिल्ली, वाराणसी, हरिद्वार और बिहार में अस्पताल की बात कही। वाराणसी अकेला सपना नहीं था। वह बड़े विस्तार का एक अंश मात्र था, जिसे खाड़ी के साम्राज्य की चमक से सच जैसा दिखाया जा रहा था।

कबीर मठ वालों को भी ठगा

सितंबर 2019 में स्थानीय अखबारों ने लिखा कि शेट्टी ने संत कबीर मठ से बात कर ली है। आचार्य विवेक दास ने कहा कि शर्तों पर चर्चा हो चुकी है, अस्पताल कबीर के नाम पर रहेगा और प्रबंधन में मठ की भागीदारी होगी। वादा था – बड़े विभाग, टेली मेडिसिन, एयर एंबुलेंस, कर्मचारी कॉलोनी और सौर ऊर्जा। उसी समय एनएमसी की दुनिया हिल रही थी। काशी में शिलान्यास हो रहा था, बाहर सवाल उठ रहे थे। दोनों तस्वीरें एक ही आदमी से जुड़ी थीं।

दिसंबर 2019 में अमेरिकी शॉर्ट-सेलर मड्डी वॉटर्स की रिपोर्ट ने एनएमसी के खातों पर उंगली रखी। शेयर गिरे, जांच शुरू हुई। कंपनी ने बाजार को करीब 2.1 अरब डॉलर का कर्ज बताया था। बाद के खुलासों में कुल बोझ करीब 6.6 अरब डॉलर तक पहुंचा। भारतीय रुपये में यह अंतर तीस से पैंतालीस हजार करोड़ के दायरे में बैठता है। आरोप रहे कि शेट्टी फ्रॉड कर रहे हैं। दो तरह के अकाउंट्स बनाते हैं – काला और सफ़ेद! भारी उधारी है जो छुपाते हैं। फर्जी खाताबही भी रखते हैं और ब्रिटेन में तो एक अदालत ने उनकी कंपनियों को प्रशासन के दिया है। शेट्टी का बचाव एक ही रहा। उन्होंने कहा कि वे ठगे गए, पूर्व अधिकारियों ने गड़बड़ी की और हस्ताक्षर जाली हुए। कुछ मामलों में अदालतें इस कहानी से सहमत नहीं हुईं। 2025 में दुबई की अदालत ने उन्हें वहां की भारतीय स्टेट बैंक को करीब छियालीस मिलियन डॉलर चुकाने कहा। उनकी गवाही को कठोर शब्दों में खारिज कर दिया।

200 करोड़ डॉलर की कंपनी केवल एक करोड़ में

घाटा यहीं नहीं रुका। शेट्टी के वित्तीय समूह फिनाब्लर में भी बड़े अघोषित कर्ज की खबर आई। कभी करीब 200 करोड़ डॉलर मूल्य वाली कंपनी बाद में मात्र एक डॉलर में बिकने जैसी सुर्खियों तक पहुंची। भारत में बीआर लाइफ की चमक भी फीकी पड़ी। भुवनेश्वर का कलिंगा अस्पताल बाद में दूसरे समूह के पास चला गया। वाराणसी की फाइल सबसे खाली रही। न भवन बना, न बेड आए।

सबसे महंगा भारतीय अध्याय बैंक ऑफ बड़ौदा का है। एनएमसी के प्रशासकों ने आरोप लगाया कि बैंक की अबू धाबी शाखा ने ऐसे लेन-देन किये जिनसे असल कर्ज छिपाने में मदद मिली। बैंक ने इनकार किया। जुलाई 2026 में विवाद अदालत के बाहर खत्म हुआ। बैंक ने छह सौ मिलियन डॉलर यानी करीब सत्तावन सौ करोड़ रुपये चुकाये । शर्त थी कि कोई दोष स्वीकार नहीं। राशि एक तिमाही की कमाई के लगभग बराबर और पुराने रिपोर्टेड बकाये से काफी बड़ी बताई गई. सवाल है कि अगर बैंक निर्दोष था, तो इतनी राशि क्यों दी? अगर जोखिम इतना भारी था, तो उसे पहले कितनी साफ कहा गया? सार्वजनिक बैंक का मतलब जनता की पूंजी है। किसके दबाव में यह भुगतान किया गया?

2026 में सामने आए दस्तावेजों पर आधारित रिपोर्टिंग बताती है कि बैंक के अपने एंटी-मनी-लॉन्ड्रिंग तंत्र ने 2016 में ही एनएमसी से जुड़े कुछ लेनदेन में ‘राउंड-ट्रिपिंग’ की आशंका जताई थी, बैंक की एएमएल टीम ने 8 सितंबर 2016 को अबूधाबी शाखा को ईमेल भेजकर एनएमसी से जुड़े खातों में ऐसे लेनदेन की जांच करने को कहा था जिनमें एक एनएमसी समूह खाते से दूसरे समूह खाते में पैसा जाने की आशंका दिखाई दे रही थी। इसके बाद दो रिमाइंडर भी भेजे गए। इसके बावजूद, बैंक ने सितंबर 2017 से जून 2019 के बीच एनएमसी समूह को नए ऋण और बैंक गारंटी मंजूर किए। सवाल यह है कि अगर किसी बैंक की अपनी एएमएल प्रणाली किसी खाते में संदिग्ध लेनदेन का संकेत देती है, तो उसके बाद निगरानी की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही? सवाल किसी व्यक्ति की राजनीतिक निष्ठा का नहीं है। यह बैंकिंग गवर्नेंस का सवाल है।

लीपापोती की कोशिश, शिलान्यास उपलब्धि नहीं होता

निजी अस्पताल नहीं बनने के बाद सरकार ने कबीरचौरा मंडलीय अस्पताल को ही सुपर-स्पेशियलिटी बनाने का फैसला कर लिया। बजट करीब तीन सौ पंद्रह करोड़ रुपये है। लक्ष्य पांच सौ बेड है। केंद्र और राज्य मिलकर खर्च उठाएंगे। 2026 में प्रधानमंत्री ने शिलान्यास किया। पूर्वांचल का मरीज दूर क्यों भागे, यह सवाल पुराना है। पुराने भवन जर्जर हैं, रोज हजारों मरीज आते हैं, और गंभीर मामलों में लोग अब भी बड़े शहरों की राह देखते हैं। इसलिए नया सरकारी अस्पताल जरूरी है। जरूरी यह भी है कि वह कागज पर न रह जाए। पहले करीब दो सौ पंद्रह करोड़ के प्रस्ताव की खबर आई, काम अटका, डिजाइन बदली। शिलान्यास के बाद भी निर्माण की सुस्ती की चर्चा रही। एक अधूरे निजी वादे के बाद दूसरा वादा कागजों में न उलझे, यही परीक्षा है। शिलान्यास उपलब्धि नहीं होता। उपलब्धि तब होती है जब मरीज को डॉक्टर, जांच और बिस्तर एक छत के नीचे मिलें।

तीन बातें साफ हैं। (1) चमकदार एनआरआई निवेश को मंच से पहले जांच की जरूरत है। बाजार मूल्य और सेवा का भाषण पर्याप्त नहीं होते। (2) धार्मिक भूमि जब अस्पताल के लिए दी जाए, तो समझौता, समय-सीमा और निरस्त होने की शर्त सार्वजनिक होनी चाहिए। (3) सार्वजनिक बैंक की विदेशी शाखा की चूक सस्ता सबक नहीं होती। सत्तावन सौ करोड़ कोई निजी रकम नहीं। बैंक ऑफ़ बड़ौदा का नुकसान भारत के नागरिक का नुकसान है।

कबीर चौरा का अस्पताल अगर समय पर और सेवाएं बंद किए बिना बना, तो पुराना वादा सबक बन जाएगा। अगर यह भी बैठकों में बीत गया, तो वाराणसी में शिलान्यास से शिलान्यास तक तक का खेल ही चलता रहेगा। मरीज को इससे क्या मतलब कि निवेशक एनआरआई था या बजट सरकारी है। मरीज़ का इलाज होना चाहिए।

विकास का सबसे सस्ता काम घोषणा होता है और सबसे महंगा काम पूरा करना। वाराणसी में घोषणा हो चुकी। हिसाब बाकी है। मठ की फाइल खुलनी चाहिए, बैंक की जांच थमनी नहीं चाहिए, निर्माण की प्रगति छिपनी नहीं चाहिए। जब ये तीन काम होंगे, तब पता चलेगा कि यह केवल अधूरा वादा था या उससे बड़ा घाव। तब तक सबसे साफ पंक्ति यही है – वादा बड़ा था, अस्पताल नहीं बना, और कीमत किसी न किसी रूप में जनता चुका रही है।

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