नहीं देंगे ज्ञानेश इस्तीफा, केंद्र सरकार की क्लीन चिट


नई दिल्ली। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देंगे ना सरकार ने उनसे इस्तीफे या फिर इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर को लेकर मचे बवाल के संबंध में कुछ भी कहा है या कोई जवाब तलब किया है। ज्ञानेश कुमार के साथ साथ अन्य दो चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी हमेशा की तरह भारत निर्वाचन आयोग के अपने दफ़्तर में रोजमर्रा का काम काज कर रहे हैं।पिछले दो दिनों के भीतर आयुक्तों ने कई बैठकें की हैं। उच्च पदस्थ विश्वस्त सूत्रों ने सूचना दी है कि ज्ञानेश कुमार द्वारा यूपी के दौरे को रद्द करने के पीछे व्यक्तिगत वजहें थी हाँलाकि सियासी हलकों में उसे ख़बर छपने के बाद मचे बवाल का दबाव बताया जा रहा था। गौरतलब है कि ज्ञानेश अपने संक्षिप्त दौरे पर मेरठ और बनारस की यात्रा पर जाने वाले थे।

आयुक्तों की संयुक्त प्रेस वार्ता संभव

विवादों में घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार फिलहाल अपने पद पर बने रहेंगे। बीती देर रात तक सरकार द्वारा उनसे मौजूदा गतिरोध को लेकर किसी किस्म का सवाल जवाब नहीं किया गया। महत्वपूर्ण है कि इंडियन एक्सप्रेस में खबर प्रकाशित होने के बाद जहाँ आयोग की डिप्टी कमिश्नर के हस्ताक्षर से अपना पक्ष जारी करना पड़ा था वहीं सरकार की ओर से संबित पात्रा को सीईसी के बचाव में उतार दिया गया था जिस पर विपक्ष ने यह कहकर हमला बोला कि आरोप जब सीईसी पर लग रहे हैं तो बीजेपी क्यों जवाब दे रही है? जानकारी मिल रही है कि आने वाले दिनों में तीनों ही आयुक्त ज्वाइंट प्रेस कांफ्रेंस कर सकते हैं। नहीं भुला जाना चाहिए कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 2029 में खत्म हो रहा है उसी वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं।

विपक्ष ला चुका है महाभियोग

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का नोटिस 12 मार्च 2026 को संसद के दोनों सदनों में दिया गया था। लोकसभा में 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों यानि कुल 193 के हस्ताक्षर थे।उस वक्त ज्ञानेश पर चुनावी धोखाधड़ी और बिहार एवं पश्चिम बंगाल में SIR के जरिए बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने के आरोप थे।
लेकिन 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 3 के तहत नोटिस को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद प्रस्ताव स्वीकार करने का आधार नहीं बना। दोनों पीठासीन अधिकारियों ने कोई विस्तृत कारण नहीं बताया। यह भारत के इतिहास में किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पहला ऐसा प्रयास था। प्रस्ताव खारिज होने के बाद विपक्ष ने आलोचना की, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। बाद में विपक्ष ने फिर से नए नोटिस लाने की कोशिश की, लेकिन मार्च 2026 वाला मूल प्रस्ताव खारिज हो चुका था।

कोर्ट में विवाद का टिकना मुश्किल

चुनाव आयोग की अंदरूनी राजनीति इस समय मुख्य रूप से CEC और बाकी दो आयुक्तों के बीच SIR प्रक्रिया, वोटर लिस्ट प्रबंधन और डिजिटल सिस्टम पर नियंत्रण को लेकर चल रही है। आयोग आधिकारिक तौर पर सर्वसम्मति का दावा करता है, जबकि लिखित आपत्तियां इसके विपरीत तस्वीर पेश करती हैं।लेकिन यह भी सच है कि अनापत्तियों के बावजूद दोनों चुनाव आयुक्तों ने सुखबीर संधू, विवेक जोशी ने सभी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए हैं बांबे हाइकोर्ट में दायर की गई एक याचिका में कहा गया गया है कि जिन 14 बिंदुओं पर आपत्तियाँ की गई हैं उन्हें निरस्त किया जाए लेकिन नियमों को देखा जाये तो यह संभव नहीं है क्योंकि असहमति के बावजूद तीनों आयुक्तों के सभी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हैं।

सरकार के लिए बड़ी चुनौती

सरकार के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती कोर्ट में SIR को जायज़ ठहराने की होगी क्योंकि विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि समूची SIR प्रक्रिया मनमाने ढंग से चलाई जा रही है. वहीं दिल्ली में हुए SIR में पकड़ी गई भारी अनियमितता को लेकर चुनाव आयोग बचाव की मुद्रा में है। मतदाता सोची को सामान्य और वीआईपी वोटरों में विभाजित करना वो मुद्दा है जिस पर चुनाव आयोग को मुँह की खानी पड़ सकती है। इसके अलावा अन्य प्रदेशों से भी बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम काटे जाने को लेकर आम जनता नाराज है। वैसे में आयोग की असली परीक्षा अदालत में होगी।

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