The Lens Ground Report : बालाघाट में 32 बच्चों की मौत
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियाँ आज भी उतनी ही सच लगती हैं—
“विकास वहीं तक पहुँचा है जहाँ तक सड़क पहुँची है…
जहाँ सड़क खत्म होती है, वहाँ से दूसरा भारत शुरू होता है।”
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बॉर्डर के रास्ते द लेंस निकला सतपुड़ा के घने जंगल की ओर जो मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक की तरफ जाता है, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 160 km दूर और बालघाट जिला मुख्यालय से करीब 80 km दूर बिरसा ब्लॉक के इसी जंगल के अंदर बोंदारी, सोनगुड्डा, कुंडेकसा, कोरका,मातला, मच्छुरदा, गटिया जैसे गांव हैं जहां पिछले 4 महीनों में 32 से अधिक बैगा आदिवासी बच्चों की मौत की खबर सामने आई है, ये आंकड़े सरकारी है.. हो सकता है कि असल में ये आंकड़े उससे भी ज्यादा हो.. आखिर क्या वजहें हैं इन बैगा समुदाय के बच्चों के मौतों की ?
आप पूरी रिपोर्ट इस वीडियो में देख सकतें हैं –
सरकार का कहना है की इस इलाके में मलेरिया, खसरा और कुपोषण की समस्या है जो इन बैगा बच्चों के मौत का कारण बना, लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि आज़ादी के 79 साल बाद भी इन जंगलों में रहने वाले बैगाओं तक हम पीने का स्वच्छ पानी तक नहीं पहुंचा पा रहे। ये वही बैगा समुदाय है जिसे सरकार खुद PVTG Particularly Vulnerable Tribal Group कहती है यानी सबसे ज्यादा पिछड़ा सबसे ज़्यादा कमज़ोर आदिवासी समूह।
ये कहानी सिर्फ 32 बच्चों की मौत की नहीं है ये कहानी उस वादे की है जो 2023 में PM जनमन योजना के नाम पर किया गया था, 24 हजार करोड़ का बजट, 22 हजार गांवों तक विकास पहुंचाने का दावा, आज हम उसी विकास की हकीकत दिखाने इन जंगलों में पहुंचे हैं।
मच्छुरदा: बेबसी की पहली तस्वीर
साल्हेवाड़ा के बाद सबसे पहले मच्छुरदा गांव में मुलाकात हुई आदिवासी महिलाओं से। नंगे पैर, कमर में कपड़े की पोटली में बच्चे बांधे महिलाएं घरों की ओर पैदल जा रही थीं। एक महिला ने बताया – आसपास कोई अस्पताल नहीं है। इलाज के लिए बिरसा या दमोह जाना पड़ता है, जो कई किलोमीटर दूर है।


कुछ किलोमीटर आगे एक आदिवासी युवक अपने दो बच्चों के साथ जा रहा था। दोनों बच्चों के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था। उनके परिवार ने बताया कि अस्पताल 50 किलोमीटर दूर लांझी, बिरसा या कचनारी में है। बुखार होने पर कभी बाइक से, कभी पैदल नदी-नाले पार करके जाना पड़ता है। कई बार तो मौसम खराब होने पर बच्चे घर पर ही तड़प-तड़प कर मर जाते हैं।
यहां सबसे बड़ी मांग वन अधिकार पट्टा की है। बैगा समुदाय को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है, लेकिन रहने के लिए जमीन का पट्टा तक नहीं मिला है – न वन विभाग से, न ग्राम पंचायत से।

जब सरकार जागी… मौतों के बाद
जब बच्चों की लगातार मौतें मीडिया में छाईं, तभी सरकार हरकत में आई। 12 अगस्त को केंद्र की NJORT और ICMR की टीम बालाघाट भेजी गई। 13 सितंबर को डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने समीक्षा बैठक की। 67 नए मेडिकल ऑफिसर, 2 करोड़ रुपये, दो नए पीएचसी और एक सब-हेल्थ सेंटर की घोषणा हुई। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि पानी के स्रोतों की सफाई की गई, 4000 से ज्यादा घरों में दवा का छिड़काव हुआ और 14,600 बच्चों को खसरे का अतिरिक्त टीका लगाया गया।
लेकिन गांव वाले नम आंखों से पूछते हैं ‘ये सब पहले क्यों नहीं हुआ?’

उर्सेकल : स्कूल और अधूरे सपने
उर्सेकल गांव में एक स्कूल जरूर नजर आया, लेकिन शिक्षा की तस्वीर वही पुरानी थी। एक ही कमरे में कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई। बच्चों के पास न यूनिफॉर्म, न किताबें। उसी गांव में एक परिवार मिला जिसके दो सदस्य 50 किलोमीटर दूर अस्पताल में भर्ती थे। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिला मकान अधूरा छोड़ दिया गया। ठेकेदार ने पैसे खा लिए।
बोंदारी : मौतों की शुरुआत
बोंदारी वह गांव है जहां सरकार ने बीमारी से पहली मौत दर्ज की। यहां एक ग्रामीण ने बताया कि अकेले इस गांव में 8 बच्चों की मौत हो चुकी है। महिलाओं से बात करने पर कई सहमी नजर आईं। एक घर में 3 साल की प्रियंका धुर्वे की मौत हुई थी। नानी और चाचा ने बताया कि बुखार के बाद कुंडेकसा, फिर बालाघाट ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई।

प्रियंका के घर के ठीक आगे रूपलाल धुर्वे का घर है। 16 जून को 17 वर्षीय रूपलाल की मौत से इस इलाके में मौतों का सिलसिला शुरू हुआ। पेट दर्द और बुखार के बाद झाड़-फूंक कराई गई। जब हालत बिगड़ी तो किराए की गाड़ी से दमोह ले जाया जा रहा था। आधे रास्ते में उसकी मौत हो गई। एंबुलेंस नहीं मिली।
स्वच्छ पानी : इस इलाके में सबसे बड़ा संकट
इस पूरे इलाके की सबसे बड़ी समस्या पानी है। हर घर में नल-जल योजना के तहत नल लगा है, लेकिन पानी नहीं आता। लोग आज भी झरिया, नाले और कुएं का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। ICMR की टीम के अनुसार इसी पानी में एडिनो वायरस मिला है, जिससे खांसी, जुकाम, बुखार और फिर मलेरिया फैल रहा है।

सरकारी आंकड़ों में ही 7711 बच्चे गंभीर कुपोषित हैं। 13 हजार से ज्यादा बच्चों में दस्त पाया गया। आंगनवाड़ी में पोषण आहार नहीं मिलता। कई परिवारों को साल भर से राशन में तेल, शक्कर और नमक नहीं मिला।
आंकड़ों में हेरफेर के आरोप
गंभीर आरोप यह भी हैं कि बालाघाट में मध्य प्रदेश के 57 प्रतिशत मलेरिया केस आते थे, लेकिन 2025-26 में अचानक 29 प्रतिशत दिखा दिए गए। ऑफ कैमरा एक आशा कार्यकर्ता ने बताया कि रैपिड टेस्ट का रिजल्ट छिपाने का दबाव डाला जाता है। 1000 लोगों पर 3 मौत के अनुपात को घटाकर 1 कर दिया गया ताकि जिला कैटेगरी-1 से कैटेगरी-3 में आ जाए। जून में फॉगिंग और मेडिकेटेड मच्छरदानी बांटनी थी, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ।
उसी क्षेत्र में हमें बीजेपी महामंत्री की एक गाडी गुजरती दिखी, उन्हें रोका तो पता चला की उनका नाम जयपाल ब्रम्हे है जो भाजपा से जुड़े हैं और वर्तमान में भारतीय जनता मजदूर ट्रेड यूनियन कॉउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उनसे हमने मलेरिया बीमारी के सरकारी आंकड़ों में हेरफेर को लेकर सवाल किया और स्थानीय आदवासियों के लिए वैक्लपिक रोजगार के अवसर पर बात की, उन्होंने इस दौरान मध्यप्रदेश सरकार की विफलता और स्वास्थ्य विभाग की नाकामी पर खुलकर अपनी बात रखी।

कुंडेकसा: अस्थायी कैंप और सवाल
इसके बाद हम पहुंचे कुण्डेकसा गाँव में, वहां एक परिवार से बात की जिन्होंने अपने बाचे को खोया है, उस इलाके में भी बिजली पानी जैसी मुलभुत सुविधाओं की कमी दिखाई दी। कुण्डेकसा में ही एक अस्थायी स्वास्थ्य कैंप बनाया गया है, जिस दिन द लेंस पहुंचा वहां किसी भी बच्चे का इलाज नहीं चल रहा था न ही वहां कोई पीड़ित दिखाई दिया, स्वास्थ्य कैम्प में कार्य करने वाली कर्मचारी दिखे उनका कहना था कि इलाज मिलने के बाद बच्चों को डिस्चार्ज कर दिया गया है और पीड़ित बच्चो की निगरानी की जा रही है,
ये कहानी सिर्फ 30 बच्चों की मौत की नहीं है, ये कहानी उस वादे की है जो 2023 में PM जनमन योजना के नाम पर किया गया था, 24 हजार करोड़ का बजट, 22 हजार गांवों तक विकास पहुंचाने का दावा लेकिन बालाघाट के इस जंगल में वो विकास आज तक नहीं पहुंचा, सड़क बन गयी लेकिन स्वच्छ पानी नहीं पहुंचा, डॉक्टर नहीं पहुंचा, पहुंची तो सिर्फ मौत।

केंद्र की रिपोर्ट खुद कह रही है कि ये मौतें एक बीमारी से नहीं, कई वजहों से हुई हैं – खसरा, मलेरिया, कुपोषण, एनीमिया, डिहाइड्रेशन और सबसे बड़ी वजह सिस्टम का न पहुंचना,अब हाईकोर्ट ने सरकार को नोटिस दिया है, National Commission for Scheduled Tribes NCST जांच कर रहा है ।
कुण्डेकसा में ही बनाये अस्थायी स्वास्थ्य कैंप में पता चला की यहाँ प्रमुख सचिव गुलशन बावरा इंस्पेक्शन करने आये हैं, उनसे भी हमने इस घटना के बारे में सवाल किया, इस दौरान सभी सरकारी अमला वहां मौजूद था।

बैगा दाइयां और भरोसे का संकट
बीमार पड़ने पर लोग सबसे पहले बैगा (पारंपरिक वैद्य) के पास जाते हैं। मुर्गी, महुआ की शराब और झाड़-फूंक से इलाज होता है। गांव वाले कहते हैं – अस्पताल दूर है, महंगा है, इसलिए मजबूरी है। एक बैगा दाई से मुलाकात हुई जिन्होंने आज ही एक बच्चे की डिलीवरी कराई थी। 50 से ज्यादा डिलीवरी करा चुकी हैं। इनाम में एक बोतल महुआ काफी होता है। ये हकीकत संस्थागत प्रसव के उन सभी सरकारी दावों की पोल खोलती है।

आजादी के 79 साल बाद भी सतपुड़ा के इन जंगलों में बसा बैगा समुदाय इंतजार कर रहा है – अपने हक का, अपने बच्चों के भविष्य का और उस विकास का, जो अभी भी सिर्फ कागजों तक सीमित है।












