वंदे मातरम् पर सुनवाई के दौरान जब सॉलिसिटर जनरल ने बोला नक्सलाइट, तो बुरी तरह से भड़क गए डॉ. मुरलीधर

Supreme Court

नई दिल्ली। ‘यह एक कानून अधिकारी को शोभा नहीं देता। मैंने कभी किसी कानून अधिकारी को यह अभिव्यक्ति इस्तेमाल करते नहीं सुना,’ वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने Supreme Court में सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया तुषार मेहता द्वारा वंदे मातरम् मामले की सुनवाई के दौरान की गई नक्सलवादी कहे जाने पर कड़ी आपत्ति जताई।

मुरलीधर टीएम कृष्णा की ओर से पेश हो रहे थे, जिन्होंने राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम में हालिया संशोधन को चुनौती दी है। इस संशोधन में ‘राष्ट्रगीत’ को ‘राष्ट्रगान’ के समान संरक्षण दिया गया है। साथ ही केंद्र के उन परिपत्रों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के छह छंदों को गाने का निर्देश दिया गया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष मुरलीधर ने तर्क दिया कि संशोधन जल्दबाजी में पारित किया गया, बिना कोई राष्ट्रीय सहमति बनाए और पर्याप्त विचार किए बिना। संशोधन में यह भी परिभाषित नहीं किया गया कि राष्ट्रगीत क्या है।

उन्होंने कहा, ‘आदर्श रूप से ये चीजें जनमत बनने के साथ विकसित होनी चाहिए।’ उन्होंने जोड़ा कि ऊपर से नीचे वाले दृष्टिकोण से कानून बनाना उचित नहीं है।

इसी बिंदु पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बीच में कहा, ‘कानून संविधान के अनुसार बनता है। कानून नक्सलाइट के विचार के अनुसार नहीं बन सकता।’

इस टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए मुरलीधर ने कहा, ‘सॉलिसिटर को अभी इस्तेमाल की गई अभिव्यक्ति वापस लेनी चाहिए। यह लाइव जा रहा है। मैं नहीं चाहता कि सॉलिसिटर की कोई अभिव्यक्ति लाइव जाए। मैं कड़ी आपत्ति करता हूं। सॉलिसिटर याचिकाकर्ता के लिए इस्तेमाल की गई अभिव्यक्ति दोहराएं।’

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘मैं नहीं चाहता कि कोई सवाल करे… वे निर्णय लेने की प्रक्रिया पर आपत्ति जता रहे हैं। यह संविधान के अनुसार है।’ मुरलीधर ने कहा, ‘वे बात टाल रहे हैं। मिस्टर सॉलिसिटर, कृपया अपनी अभिव्यक्ति वापस लें।’

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह ‘अनावश्यक तनाव और भावना’ है।

मुरलीधर ने जवाब दिया, ‘उन्होंने शुरू किया। सॉलिसिटर इस तरह की अभिव्यक्ति क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं? यह एक कानून अधिकारी को शोभा नहीं देता। मैंने कभी किसी कानून अधिकारी को यह अभिव्यक्ति इस्तेमाल करते नहीं सुना।’

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘आप संविधान को चुनौती नहीं दे सकते।’ इस पर मुख्य न्यायाधीश ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘हम केवल संवैधानिक व्याख्या के कानूनी मुद्दे की जांच कर रहे हैं। हम उसी तक सीमित रहें।’

मुरलीधर ने कहा, ‘लेकिन कानून अधिकारियों से शिष्टाचार की अपेक्षा की जाती है।’

पीठ ने इस बिंदु पर केंद्र से याचिका पर जवाबी शपथपत्र मांगने का आदेश दिया। आदेश दिए जाने के बाद मुरलीधर ने फिर से मामला उठाया और सॉलिसिटर से वापसी की मांग की।

उन्होंने कहा कि विद्वान सॉलिसिटर ने ऐसी अभिव्यक्ति इस्तेमाल की जो एक कानून अधिकारी को शोभा नहीं देती। मुझे अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज करानी है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि हमने टिप्पणियों पर ध्यान नहीं दिया है। हम खुद को संवैधानिक मुद्दे तक सीमित रखते हैं।”सॉलिसिटर जनरल ने माफी नहीं मांगी।

उन्होंने कहा कि मैं जो कहा वह दोहरा सकता हूं। उन्होंने कहा कि वे निर्णय लेने के तरीके पर आपत्ति जता रहे हैं। निर्णय संसद द्वारा लिया गया। मैंने कहा कि वह संवैधानिक तरीका है, न कि वह जो नक्सलाइट चाहते हैं। मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है।

मुरलीधर ने कहा कि वे गैलरी के लिए खेल रहे हैं। वे अनावश्यक रूप से दोहरा रहे हैं। मैं अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कर रहा हूं। माननीय न्यायालय किसी कानून अधिकारी से इसे प्रोत्साहित नहीं करेंगे।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि अपने तर्क अगली तारीख के लिए रखें। इसके बाद एक अन्य मामले में मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े खड़े हुए और कहा, ‘अपना दिमाग रखना नक्सलाइट होना नहीं है।’

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘भले ही आप किसी को नक्सलाइट का लेबल लगा दें, वह संवैधानिक अधिकार नहीं खोता।’

सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि वे किसी को लेबल नहीं लगा रहे थे, बल्कि विचारधारा पर टिप्पणी कर रहे थे।हेगड़े ने कहा, ‘सोचना नक्सलाइट होना नहीं है।’

मुरलीधर के जाने और अगला मामला लिए जाने के बाद न्यायमूर्ति बागची ने सॉलिसिटर से कहा, ‘मैं आपको बताता हूं, कम से कम मेरे व्यक्तिगत अनुभव से, हमने बार और बेंच दोनों के सदस्य के रूप में अतिरिक्त-संवैधानिक ताकतों के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ी है। संविधान के साथ हमारा अस्तित्व और औचित्य इन्हीं ताकतों को हराना है। लोग अदालतों में क्यों आएंगे और कंगारू कोर्ट में क्यों नहीं? कंगारू कोर्ट हैं। संवैधानिक अदालतों को सम्मान और विश्वसनीयता क्यों है? क्योंकि हम महसूस करते हैं कि आरोपित आतंकवादियों को भी समान अधिकार होने चाहिए। हमने आतंकवादियों का कानून के अनुसार मुकदमा चलाया है। यहां तक कि जिन्होंने सार्वजनिक रूप से लोगों को गोली मारी, उन्हें भी निष्पक्ष सुनवाई दी गई।’

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘यही मेरी बात थी। कुछ व्यक्ति संवैधानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में विश्वास नहीं रखते।’

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘मिस्टर सॉलिसिटर, हमने टिप्पणियों पर ध्यान नहीं दिया है।’ सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया, ‘मुझे नहीं पता कि उन्होंने इसे व्यक्तिगत रूप से क्यों लिया।’

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