कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने SC/ST समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी जातीय पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज या सबूत पेश नहीं कर पाता है, तो सिर्फ इसी आधार पर उसे आरक्षण और संविधान के तहत मिलने वाले दूसरे लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य को उसके जाति संबंधी दावे के खिलाफ ठोस और स्वतंत्र सबूत पेश करना होगा। जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की डिवीजन बेंच ने कहा कि SC/ST समुदायों से अपनी पहचान साबित करने के लिए सामान्य नागरिकों जैसी कठोर प्रक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती।
1980 में ST आरक्षण से मिली नौकरी, बाद में उठे जाति पर सवाल
मामला एक रिटायर्ड पोस्टल असिस्टेंट का है, जिन्हें 1980 में पोस्टमैन और 1989 में पोस्टल असिस्टेंट के पद पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ मिला था। यह लाभ तहसीलदार की ओर से जारी उस प्रमाणपत्र के आधार पर मिला था, जिसमें उन्हें मलई पंडारम समुदाय का सदस्य बताया गया था। बाद में सतर्कता जांच में दावा किया गया कि वह मलई पंडारम नहीं, बल्कि पंडारम समुदाय से आते हैं, जिसे OBC में रखा गया है। इसके बाद स्क्रूटिनी कमेटी ने उनका जाति प्रमाणपत्र रद्द करने की कार्रवाई की और सरकार ने सेवा समाप्त करने तथा कथित गलत जाति दावा करने पर मुकदमा चलाने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा- पहले पक्ष सुनना जरूरी था
अपीलकर्ता ने अदालत को बताया कि उसके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों में कई विसंगतियां थीं। उन्होंने यह भी कहा कि जांच में उनके मामा के कथित बयान पर भरोसा किया गया, जबकि मामा खुद OBC समुदाय से संबंधित बताए गए। परिवार के दूसरे सदस्यों को भी ST पहचान के आधार पर लाभ मिलने की बात सामने रखी गई। हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता की आपत्तियों और उनके जवाब पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उसे अपने पक्ष में इस्तेमाल किए गए रिकॉर्ड देखने और जवाब देने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
‘सबूत की कमी’ को अकेला आधार नहीं बनाया जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि SC/ST समुदायों के लोगों को अपनी जातीय पहचान से जुड़े दस्तावेज हासिल करने में कई तरह की सामाजिक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अधिकारियों को जाति दावों की जांच करते समय पूरी परिस्थिति को देखकर फैसला करना चाहिए। परिवार के दूसरे सदस्यों को मिले जाति प्रमाणपत्र और आरक्षण जैसे लाभ भी जांच का हिस्सा हो सकते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि केवल इसलिए संवैधानिक लाभ नहीं छीना जा सकता कि व्यक्ति पर्याप्त सबूत नहीं दे पाया। राज्य को इसके विपरीत सकारात्मक और ठोस सबूत पेश करने होंगे।
स्क्रूटिनी कमेटी का फैसला रद्द, छह महीने में होगी नई जांच
हाईकोर्ट ने स्क्रूटिनी कमेटी की कार्रवाई और उसके आधार पर सरकार की ओर से जारी आदेश को रद्द कर दिया। अब कमेटी को मामले की नए सिरे से जांच करनी होगी। इसमें अपीलकर्ता की पुरानी आपत्ति, नए दस्तावेज और उसके खिलाफ इस्तेमाल किए गए मूल रिकॉर्ड देखने का मौका देना होगा। नई प्रक्रिया हाईकोर्ट के फैसले की प्रति मिलने के छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। तब तक अपीलकर्ता को अस्थायी पेंशन जारी रखने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने साफ किया कि SC/ST के संवैधानिक लाभ छीनना एक गंभीर कदम है और ऐसा तभी होना चाहिए, जब धोखाधड़ी या गलत दावे का स्पष्ट और स्वतंत्र सबूत मौजूद हो।








