नई दिल्ली। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका (NSA) के इस्तेमाल को लेकर अदालतें लगातार यह स्पष्ट करती रही हैं कि इस असाधारण कानून का इस्तेमाल सामान्य कानून-व्यवस्था के मामलों में नहीं किया जा सकता।
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर नोएडा मजदूर आंदोलन के मामले में लगाए गए NSA को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रद्द किया जाना इसी न्यायिक सख्ती का ताजा उदाहरण है। कोर्ट ने कार्रवाई को मनमाना बताते हुए आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
सिर्फ एनएसए रद्द करना इस फैसले का अहम पहलू नहीं है। इस फैसले का अहम पहलू यह है कि कोर्ट ने इस कार्रवाई को राज्य की गढ़ी हुई कहानी बताया है। इससे सरकार की बड़ी किरकिरी हो रही है। कोर्ट ने पीड़िता को पांच लाख मुआवजा देने का ऐलान किया है जो कि नोएडा डीएम की सैलरी से दिया जाएगा।
यहां यह बताना बेहद दिलचस्प है कि नोएडा डीएम भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम हैं।
आकृति चौधरी के मामले में हाईकोर्ट ने NSA के तहत की गई पूरी कार्रवाई को रद्द कर दिया। अदालत के फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि क्या किसी प्रदर्शन, आंदोलन या आपराधिक मामले के आधार पर सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया जा सकता है?
अदालतों के पुराने फैसले बताते हैं कि NSA लगाने के लिए केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को यह दिखाना होता है कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधि वास्तव में ‘पब्लिक ऑर्डर’ यानी सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है।
कफील खान केस में भी हाईकोर्ट ने रद्द किया था NSA
इससे पहले 2020 में डॉ. कफील खान का मामला भी इसी तरह चर्चा में आया था। CAA विरोधी प्रदर्शन के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण के आधार पर उन्हें NSA के तहत हिरासत में लिया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत को रद्द करते हुए कहा था कि भाषण में प्रथम दृष्टया नफरत या हिंसा को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं दिखता। कोर्ट ने उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया था।
इस फैसले को उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
AMU के प्रदर्शनकारियों के केस भी अदालतें कर चुकी हैं खारिज
इसके अलावा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 2019-2020 में छात्रों ने प्रदर्शन किया था। बाद में उत्तरप्रदेश पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर एनएसए लगाया था।
बाद में NSA के आदेशों को अदालतों ने यह कहते हुए खारिज किया कि सामान्य कानून और व्यवस्था की समस्या को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट भी बता चुका है ‘कानून-व्यवस्था’ और ‘पब्लिक ऑर्डर’ का फर्क
NSA के मामलों में सुप्रीम कोर्ट लगातार कानून व्यवस्था और पब्लिक ऑर्डर के बीच अंतर को महत्वपूर्ण मानता रहा है। जनवरी 2026 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा साबित नहीं करता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत को सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प बनाकर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इसी तरह, 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक NSA मामले में राज्य सरकार की ओर से बंदी की ओर से दी गई दलील पर देर से विचार किए जाने को आधार बनाकर हिरासत आदेश रद्द कर दिया। अदालतों ने हिरासत में व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों और तय प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया है।
फरवरी 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में NSA की कार्रवाई को बरकरार रखा, जहां एक घटना में तीन लोगों की मौत हुई, कई मकानों को नुकसान पहुंचा और इलाके में व्यापक भय तथा सामान्य जनजीवन में व्यवधान पैदा हुआ था।
अभी नहीं होगी आकृति की जेल से रिहाई
आकृति के खिलाफ लगाया गया एनएसए हटा दिया गया है, लेकिन आकृति अभी जेल से बाहर नहीं आ पाएंगी। उनके खिलाफ नोएडा के पांच थानों में कुल 11 एफआईआर दर्ज हैं।
इनमें दंगा, हत्या का प्रयास, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और हिंसा भड़काने जैसे आरोप हैं। अब तक उन्हें कुछ मामलों में जमानत मिल चुकी है, बाकी मामलों में जमानत बाकी है।
यह फैसला मजदूर आंदोलन और कार्यकर्ताओं पर एनएसए के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में राज्य की ओर से पेश किए गए आधार पर्याप्त और सही नहीं थे।








