रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर सरकार की तैयारी तेज हो गई है, लेकिन इसके साथ ही विरोध भी शुरू हो गया है। कांग्रेस और माकपा दोनों ने UCC की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने इसे आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ बताया है, जबकि माकपा ने भी सरकार से UCC लागू करने की प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है।
दूसरी तरफ सरकार ने UCC का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाई है और 27 अगस्त को रायपुर में करीब 200 लोगों से सुझाव भी लिए गए।
तो आखिर UCC को लेकर इतना विवाद क्यों है? आदिवासियों के पेसा, पांचवीं अनुसूची और जमीन से जुड़े अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा? कमेटी ने क्या सुझाव मांगे और अब सरकार की आगे की योजना क्या है? आइए पूरी कहानी समझते हैं।
उच्च स्तरीय कमेटी में कौन-कौन?
छत्तीसगढ़ सरकार ने यूसीसी के लिए पांच सदस्यों की एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं।
समिति में शत्रुघ्न सिंह, एमके राउत, मोहन पवार और ज्योति रानी सिंह सदस्य हैं।
समिति का काम प्रदेश में UCC की जरूरत, उसके संभावित प्रावधान और अलग-अलग वर्गों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है।
छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति ने 27 अगस्त को रायपुर के न्यू सर्किट हाउस स्थित कन्वेंशन हॉल में राज्य स्तरीय बैठक की।

इस बैठक में करीब 200 लोगों को आमंत्रित किया गया था। इनमें अलग-अलग आयोग, निगम और मंडल के पदाधिकारी, सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि, समाज प्रमुख, प्रबुद्ध नागरिक, जनप्रतिनिधि और कानून विशेषज्ञ शामिल थे।
बैठक में आखिर सुझाव किस बात पर मांगे गए?
समिति ने विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में समान कानूनी व्यवस्था को लेकर राय मांगी।
लेकिन चर्चा सिर्फ कानून के प्रावधानों तक सीमित नहीं थी। इस बात पर भी विचार किया गया कि अगर UCC लागू होता है तो इसका समाज के अलग-अलग वर्गों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और इसे जमीन पर लागू करने में कौन-कौन सी व्यावहारिक दिक्कतें आ सकती हैं।
बैठक में धार्मिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी अपनी राय रखी। इनमें विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष ललित माखीजा, क्रिश्चियन समाज के जान राजेश पॉल, मुस्लिम समाज के अध्यक्ष सलाम रिजवी और गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष इंद्रजीत छाबड़ा जैसे प्रतिनिधि शामिल थे।
इसके अलावा आदिवासी विकास प्राधिकरण, अन्य पिछड़ा वर्ग प्राधिकरण और राज्य नीति आयोग से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी अपने सुझाव दिए।
एक महत्वपूर्ण मुद्दा छत्तीसगढ़ की जनजातीय और रूढ़िगत परंपराओं का संरक्षण भी है। समिति का कहना है कि राज्य की विशिष्ट परंपराओं पर प्रस्तावित बदलावों के प्रभाव का संवेदनशील तरीके से अध्ययन किया जाएगा।
समिति अलग-अलग समूहों के साथ आगे भी बैठकें करेगी। इसके अलावा जिलों में फील्ड स्टडी, जन-संवाद और ऑनलाइन माध्यम से भी सुझाव जुटाने की प्रक्रिया जारी रहेगी।
बैठक का मकसद सीधे कानून घोषित करना नहीं, बल्कि UCC के संभावित प्रावधानों पर लोगों की राय लेना था। समिति ने खास तौर पर तीन चीजों पर चर्चा की है। इसमें UCC के संभावित प्रावधान, उनका सामाजिक प्रभाव और उन्हें लागू करने की व्यावहारिक चुनौतियां।
लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में सबसे महत्वपूर्ण सवाल स्थानीय परंपराओं और विशेष संवैधानिक अधिकारों का है।
आदिवासी समाज की परंपराओं, उनके रीति-रिवाजों और मौजूदा कानूनी संरक्षण को लेकर भी चर्चा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है। इसी संवैधानिक प्रावधान को आधार बनाकर छत्तीसगढ़ सरकार ने यह समिति बनाई है।
सरकार का कहना है कि अलग-अलग वर्गों से मिलने वाले सुझावों के आधार पर एक ऐसा ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा, जिसमें प्रदेश के सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखा जाए।
हालांकि यह इतना आसान नहीं है क्योंकि विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ हैं।
छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के खिलाफ है UCC: दीपक बैज

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने UCC को लेकर सरकार पर बड़ा हमला बोला है। दीपक बैज का कहना है कि छत्तीसगढ़ की करीब 32 प्रतिशत आबादी आदिवासी है और राज्य के आदिवासियों को संविधान के तहत विशेष संरक्षण मिला हुआ है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर UCC लागू होता है तो इन विशेष अधिकारों का क्या होगा?
बैज ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पेसा कानून लागू है, पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र हैं और आदिवासियों के लिए भू-राजस्व संहिता में भी विशेष प्रावधान हैं। उनका सवाल है कि UCC लागू होने के बाद क्या ये सभी अधिकार पहले की तरह सुरक्षित रहेंगे?
कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि सरकार को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए और यह घोषणा करनी चाहिए कि आदिवासी समाज को UCC से बाहर रखा जाएगा। दीपक बैज ने UCC को सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी जमीन और संसाधनों से जोड़ते हुए भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
उनका आरोप है कि बस्तर में नक्सलवाद खत्म होने की घोषणा के बाद भाजपा समर्थित उद्योगपतियों की नजर आदिवासियों की जमीन पर है। दीपक बैज का दावा है कि आदिवासियों की जमीन को मौजूदा कानूनों के तहत आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता, इसलिए दूसरे रास्ते खोजे जा रहे हैं।
माकपा ने UCC की प्रक्रिया पर रोक लगाने की रखी मांग

27 अगस्त को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा की छत्तीसगढ़ राज्य समिति ने भी समान नागरिक संहिता लागू करने की प्रक्रिया का विरोध किया।
समिति को दिए पत्र में माकपा ने कहा कि वह प्रदेश में UCC लागू करने के लिए चल रही पूरी प्रक्रिया का विरोध करती है और सरकार से इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग करती है।
यानी एक तरफ सरकार सभी वर्गों से राय लेकर UCC का ड्राफ्ट तैयार करने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
सरकार को यूसीसी को लेकर पहले से ही यह आशंका थी कि इसका विरोध होगा, इसलिए सरकार की योजना फिलहाल सीधे कानून लागू करने की नहीं, बल्कि पहले व्यापक अध्ययन और सुझाव लेने की है।
समिति अलग-अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन करेगी और विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण और अन्य नागरिक मामलों को लेकर सुझाव तैयार करेगी।
साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि छत्तीसगढ़ की आदिवासी परंपराओं और संविधान से मिले विशेष संरक्षण को अंतिम ड्राफ्ट में किस तरह देखा जाता है।
इन कोशिशों के बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कह चुके हैं कि सरकार विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र में UCC से जुड़ा विधेयक पेश करने की तैयारी कर रही है।
उत्तराखंड, गुजरात और असम में हो चुका है लागू
उत्तराखंड देश का पहला राज्य है, जहां UCC लागू की गई है। गुजरात ने मार्च 2026 और असम ने मई 2026 में UCC विधेयक पारित किया है।
गोवा में आजादी के समय से ही गोवा सिविल कोड लागू है, जिसे पुर्तगाली सिविल कोड-1867 से जोड़ा जाता है। 1961 में भारत में विलय के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही। हालांकि, इसे पूर्ण आधुनिक UCC नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें कुछ समुदायों के लिए विशेष प्रावधान और छूट मौजूद हैं।
अब छत्तीसगढ़ भी UCC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्य विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र में UCC से संबंधित विधेयक पेश किए जाने की तैयारी है।










