जस्टिस उज्जल भुयान का ऐतिहासिक भाषण, गंगा में बिरयानी समेत तमाम मामलों में अदालती आदेशों की पुरजोर आलोचना

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान (Justice Ujjal Bhuyan) ने शनिवार को भारत की अदालतों द्वारा असहमति या विरोध प्रदर्शन पर आपराधिक कार्रवाई का सामना कर रहे नागरिकों की याचिकाओं से निपटने के लापरवाह तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई

संवैधानिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में अदालतों की भूमिका पर बोलते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि नागरिकों को अपने विरोध के अधिकार का प्रयोग करने पर आपराधिक कार्रवाई का सामना बढ़ता जा रहा है। अदालतें कई मामलों में राहत दे रही हैं, लेकिन यह अक्सर देर से आती है और प्रतिबंधात्मक जमानत शर्तें वैध असहमति को हतोत्साहित करने का जोखिम पैदा करती हैं।

सामान्य गतिविधियों का बनाया जा रहा आपराधिक

जस्टिस भुयान ने कहा कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत में प्रचलित मत से अतिरिक्त राय व्यक्त करने के लिए सार्वजनिक स्थान सिकुड़ रहा है। अपने विचार व्यक्त करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताएं हैं। बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं। दुर्भाग्य से, सामान्य गतिविधियों को भी आपराधिक बनाया जा रहा है।वे भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में जस्टिस जीपी सिंह चौथे स्मारक व्याख्यान में छात्रों को संबोधित कर रहे थे।

गंगा में चिकन खाने का नहीं बनता अपराध

उन्होंने कहा कि मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध नहीं हो सकता। गंगा नदी पर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। जस्टिस भुयान ने कहा कि अदालतें राहत तो दे रही हैं, लेकिन अक्सर बहुत देर से और सख्त शर्तों के साथ।उन्होंने टिप्पणी करी कि ये मुद्दे गंभीर सवाल उठाते हैं। नागरिक पा रहे हैं कि हालांकि अदालतें उत्तरदायी हैं और जमानत देती हैं, राहत देती हैं, कई बार यह देर से होती है। लेकिन जमानत देते समय लगाई गई प्रतिबंधात्मक शर्तें सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं।

क्या ऐसे प्रतिबंधात्मक आदेशों से अदालतें अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को असहमति व्यक्त न करने के लिए कह रही हैं या हतोत्साहित कर रही हैं? इस संबंध में उन्होंने हाल ही में 14 मुस्लिम पुरुषों की गिरफ्तारी का उल्लेख किया, जिन्हें रमजान के रोजा खोलते समय गंगा नदी में नाव पर चिकन बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

उदाहरण के लिए गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाकर अपना रोजा खोलने वाले युवाओं के समूह का मामला लें। मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध नहीं हो सकता। गंगा नदी पर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। उन्हें उसी वजह से गिरफ्तार किया गया और उन्हें 3 महीने जेल में रहना पड़ा।

सोशल मीडिया पर पोस्ट से रोकना अजीब

उन्होंने उन मामलों का भी जिक्र किया जहां जमानत पाने वालों को सार्वजनिक बैठकों में भाग न लेने, सोशल मीडिया पर पोस्ट न करने या देश न छोड़ने का निर्देश दिया गया।उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें मौलिक स्वतंत्रताओं को कमजोर करती हैं।जस्टिस भुयान ने जुलाई 2025 के बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश को याद किया, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) द्वारा गाजा में कथित नरसंहार के खिलाफ आजाद मैदान पर विरोध प्रदर्शन की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था।हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की थी,“हमारे देश में काफी मुद्दे हैं। हमें ऐसी चीजों की जरूरत नहीं है। मुझे कहने में खेद है, आप सब अदूरदर्शी हैं। आप गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दों को देख रहे हैं। अपने देश को देखें। देशभक्त बनें। यह देशभक्ति नहीं है। लोग कहते हैं कि वे देशभक्त हैं।

जजों को आत्मनिरीक्षण की नसीहत

जस्टिस भुयान ने कहा कि उन्हें यह बहुत अजीब लगा कि एक जज ने सवाल किया कि लोग भारत के बाहर की घटनाओं पर विरोध क्यों करना चाहते हैं।उन्होंने कहा कि न्यायपालिका आलोचना से ऊपर नहीं है और कानूनी समुदाय द्वारा निर्णयों की आलोचनात्मक जांच की जानी चाहिए।“निर्णय दिए जाने के बाद उनकी आलोचनात्मक जांच की जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर आलोचना की जानी चाहिए। किसी निर्णय की आलोचना का मतलब जज की आलोचना नहीं है।”

हाल के सुप्रीम कोर्ट निर्णयों, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण निर्णय शामिल है, का जिक्र करते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि छात्रों को निर्णयों को बिना सवाल किए स्वीकार करने के बजाय उनकी आलोचनात्मक विश्लेषण करनी चाहिए।

उन्होंने पूछा, “अगर हर कोई जाकर जजों से कहे, ‘सर, शानदार बात। सर, आप जो कहते हैं वह बेहतरीन है। सर, आप एक विधिवेत्ता हैं,’ तो व्यवस्था कैसे सुधरेगी?नागरिक पा रहे हैं कि हालांकि अदालतें उत्तरदायी हैं और जमानत देती हैं, राहत देती हैं, कई बार यह देर से होती है। महत्पूर्ण बात यह है कि उन्होंने जजों से आग्रह किया कि यदि वे सार्वजनिक विश्वास बनाए रखना चाहते हैं तो आत्मनिरीक्षण करें।

उन्होंने नोट किया कि जजों और न्यायपालिका को वैध और प्रासंगिक बने रहने के लिए सार्वजनिक धारणा सबसे महत्वपूर्ण है।

हम खुद थपथपा रहे अपनी पीठ

वो बोले मुझे आश्चर्य होता है जब हम खुद अपनी पीठ थपथपाते हैं और कहते हैं कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट कितना शक्तिशाली है, कितना महान है। यह टिप्पणी हमें नहीं करनी चाहिए। यह नागरिकों को आकलन करना चाहिए। गणतंत्र बनने के 75 साल बाद आज न्यायपालिका, विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट, कहां खड़ी है, इसकी नागरिकों की धारणा ही मायने रखती है।”उन्होंने कहा कि संस्थागत सुधार के लिए आत्मनिरीक्षण जरूरी है और न्यायपालिका की आलोचना सहित मजबूत सार्वजनिक बहस लोकतांत्रिक संस्थाओं को ही मजबूत करेगी।

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