रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र को लेकर जारी शिक्षा विभाग के हालिया आदेश पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेताओं ने सरकार के फैसले को प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता और संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि मां सरस्वती और गायत्री मंत्र के प्रति सम्मान अपनी जगह है, लेकिन किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक परंपरा को प्रशासनिक आदेश के माध्यम से लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि आस्था का संबंध स्वैच्छिक स्वीकार्यता से होता है, न कि सरकारी निर्देशों से।
छत्तीसगढ़ की विविध पहचान का दिया हवाला
विरोध जताने वालों ने कहा कि छत्तीसगढ़ केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक धारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि यह विभिन्न जनजातीय, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का साझा घर है। गोंड, उरांव, कँवर, बैगा और हलबा समाज की सांस्कृतिक मान्यताओं से लेकर सतनाम पंथ, कबीरपंथ, सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई समुदायों तक, प्रदेश की पहचान विविधता में एकता की रही है। उनका कहना है कि यदि विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना है तो उन्हें समावेशी बनाया जाना चाहिए, जहां सभी समुदायों की परंपराओं और मान्यताओं को समान सम्मान मिले।
शिक्षा के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप
आलोचकों ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि प्रदेश में स्कूलों के युक्तियुक्तकरण, शिक्षकों की कमी, जर्जर भवनों, मिड-डे मील की गुणवत्ता और बढ़ती बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दे मौजूद हैं। ऐसे समय में प्रार्थना संबंधी आदेश को प्राथमिकता देना शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों से दूरी दर्शाता है। उनका मानना है कि स्कूलों में बच्चों को बेहतर सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए।
समावेशी शिक्षा और संवाद की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि सहिष्णुता, संवाद और परस्पर सम्मान जैसे मूल्यों का विकास करना भी है। इसी संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि सच्चा चरित्र निर्माण विभिन्न विचारों और परंपराओं के सम्मान से होता है। बहस के बीच यह सवाल प्रमुखता से उभर रहा है कि क्या विद्यालयों में धार्मिक अभिव्यक्तियों को निर्देशित करने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए जो सभी समुदायों के बच्चों को समान रूप से स्वीकार्य हो। फिलहाल यह मुद्दा शिक्षा, संस्कृति और राजनीति के संगम पर खड़ा दिखाई दे रहा है और आने वाले दिनों में इस पर बहस और तेज होने की संभावना है।










