लेंस ब्यूरो। देश में पेट्रोल पंप से Diesel की बिक्री के लिए नई गाइडलाइन जारी की गई है। यह गाइडलाइन रिटेल और कमर्शियल उपभोक्ताओं के लिए है। नई गाइडलाइन के तहत किसी भी रिटेल आउटलेट (पेट्रोल पंप) से एक ग्राहक को 200 लीटर से अधिक डीजल नहीं दिया जाएगा।
साथ ही, कॉमर्शियल उद्देश्य से डीजल खरीदने वाले उद्योगों और व्यवसायों को अब रिटेल पंपों से ईंधन खरीदने की अनुमति नहीं होगी। उन्हें तेल कंपनियों के निर्धारित बल्क डिपो से ही डीजल लेना होगा, जो बाजार दर (रिटेल) से करीब 40 रुपए प्रति लीटर महंगा है।
कॉमर्शियल और इंडस्ट्रियल उपयोगकर्ता, जिन्हें नियमानुसार सीधे डिपो (बल्क डीजल सप्लाई पॉइंट) से ईंधन खरीदना चाहिए, वे उससे बचकर आम रिटेल पेट्रोल पंपों पर जाकर डीजल भर रहे थे। इससे उन्हें 40 रुपए की बचत प्रति लीटर हो रही थी।
अब इस पर रोक लगाने के लिए सरकार और तेल कंपनियों ने सख्त कदम उठाया है।
डिपो की बजाय पेट्रोल पंपों से खरीद रहे थे Diesel
भारत में डीजल दो अलग-अलग मूल्य संरचनाओं पर बिकता है। एक तरफ रिटेल पेट्रोल पंप हैं जहां आम नागरिक, निजी वाहन चालक और छोटे कारोबारी तय सरकारी दर पर ईंधन खरीदते हैं। दूसरी तरफ बल्क डिपो हैं, जहाँ कारखाने, जनरेटर सेट चलाने वाले उद्योग, माइनिंग कंपनियाँ, कंस्ट्रक्शन फर्म और बड़े कमर्शियल प्रतिष्ठान उच्च दर पर डीजल खरीदते हैं।
फैक्ट्रियां, ट्रांसपोर्ट कंपनियां, माइनिंग ऑपरेटर, हॉस्पिटल जनरेटर – ये देश के तमाम कॉमर्शियल यूजर्स हैं। ये बल्क दरों पर डीजल लेने के लिए बाध्य हैं, वे अपने टैंकरों और वाहनों को सीधे रिटेल पंपों पर भेज रहे थे। कभी-कभी एक ही वाहन कई बार चक्कर लगाता था।
इस तरह ये यूजर्स प्रति लीटर करीब 40 रुपए प्रति लीटर की बचत कर रहे थे। ये बचत दरअसल सरकारी तेल कंपनियों का नुकसान और आम ग्राहकों की सुविधा की कीमत पर हो रहा था।
रिटेल ग्राहकों को डीजल मिलने में हो रही थी परेशानी
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी मार आम उपभोक्ताओं पर पड़ रही थी। जब कॉमर्शियल वाहन और एजेंट बड़े टैंकों में डीजल भरवाने पेट्रोल पंप पर आते थे, तो पंपों पर स्टॉक तेजी से खत्म होने लगता था।
पंपों पर डीजल जल्दी खत्म होने से आम ग्राहकों को लंबी कतारें, घंटों इंतजार करना पड़ता है। कमर्शियल यूजर्स को अवैध लाभ होता है और सरकारी तेल कंपनियों को करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान होता है।
रिटेल दर पर बल्क खरीद से राज्य सरकारों को VAT व टैक्स का नुकसान, छोटे ट्रांसपोर्टरों को फायदा नहीं लेकिन बड़ी कंपनियां फायदे में होती हैं। इससे रिटेल पंप डीलरों पर दबाव बनता है और अब 200L लिमिट से राहत मिलेगी।
एक रिटेल पेट्रोल पंप ऑपरेटर ने बताया, ‘हमारे पास रोज कुछ टैंकर और बड़े वाहन आते थे जो सैकड़ों लीटर डीजल भरवाते थे। इसके बाद दोपहर तक हमारा स्टॉक खत्म हो जाता था और शाम को आम गाड़ी वाले बिना डीजल के वापस चले जाते थे।‘
पेट्रोलियम जानकारों का कहना है, ‘रिटेल पंप से डीजल खरीदकर कॉमर्शियल यूजर्स सरकारी कंपनियों को हर साल हजारों करोड़ रुपये का चूना लगा रहे थे। यह एक व्यवस्थित तरीके से हो रहा था।‘
तेल कंपनियों का नुकसान होगा कम
इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदूस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां कॉमर्शियल यूजर्स को बल्क डिपो से उच्च (बाजार मूल्य) दर पर डीजल देती हैं। जब ये यूजर्स रिटेल पंप से डीजल खरीदते थे, तो कंपनियों को प्रति लीटर करीब 40 रुपए कम मिलते थे।
उद्योग जगत के अनुमान के मुताबिक देश में रोजाना लाखों लीटर डीजल इसी तरह की ‘रिटेल मिस-यूज’ के जरिए खर्च होता था। बड़े पैमाने पर देखें तो यह नुकसान हजारों करोड़ रुपये सालाना तक पहुँचता है।
रिटेल पेट्रोल पंप से एक ट्रांजैक्शन में अधिकतम 200 लीटर डीजल मिलेगा। कॉमर्शियल / इंडस्ट्रियल उपभोक्ता रिटेल पंप से ईंधन नहीं खरीद सकते। इन यूजर्स को सीधे बल्क डिपो से डीजल लेना होगा जो रिटेल दर से 40 रुपए महंगा है। इससे रिटेल पंपों पर आम ग्राहकों के लिए डीजल की उपलब्धता बेहतर होगी।
आम उपभोक्ताओं को फायदा
सबसे अहम बात यह है कि इस नीति से रिटेल पंपों पर डीजल की उपलब्धता बेहतर होगी। अब कॉमर्शियल वाहन और टैंकर बड़ी मात्रा में रिटेल स्टॉक नहीं उड़ा पाएँगे। इससे निजी वाहन चालकों, किसानों के पंप सेट और छोटे व्यापारियों को कतारों से राहत मिलेगी।
साथ ही, तेल कंपनियों की आमदनी बढ़ने से पेट्रोल-डीजल के दाम भविष्य में स्थिर रखने में भी मदद मिल सकती है।
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