सुलग उठी है इंडिया गठबंधन की बुझी हुई राख

नई दिल्ली। इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद मंगलवार शाम को जब तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी कोलकाता पहुंचे तो उनके ख़िलाफ़ एयरपोर्ट पर चोर चोर के नारे लगाए जाने लगे लेकिन कल्याण खामोश नहीं रहे। उन्होंने जवाब में एयरपोर्ट पर ही शुभेंदु चोर शुभेंदु चोर , शुभेंदु का बाप चोर का नारा लगाना शुरू कर दिया। इसके पहले सोमवार को जब अपराहन में इंडिया गठबंधन की बैठक चल रही थी ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित आवास पर सीआईडी के छापे पड़ रहे थे। अब तक तृणमूल के दो राज्यसभा सांसद इस्तीफा दे चुके हैं वहीं 20 लोकसभा सांसद पार्टी से अलग गुट के रूप में मान्यता लेकर एनडीए को समर्थन देने का फैसला कर चुके हैं। डीएमके और आम आदमी पार्टी जो कभी इंडिया गठबंधन में शामिल थे बैठक में शामिल नहीं हुए। अखिलेश यादव शामिल जरूर हुए लेकिन उनके शामिल होने से ज़्यादा चर्चा उनके इस बयान की रही कि कांग्रेस के कुछ लोग हमारी पार्टी के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं।

हार पर हार से उपजे फ्रस्ट्रेशन , पार्टियों में टूट फूट का ग़ुस्सा, गिरफ़्तारियाँ धमकी से आजिज आ चुका इंडिया गठबंधन क्या उस धार को खो चुका है जो उस वक्त दिखाई दे रही थी जब गठबंधन अस्तित्व में आया था? इसका जवाब यकीनन हाँ होगा लेकिन यह भी सच है कि पराजय की इस बड़ी सीरिज और कई राज्यों को खोने के बावजूद इंडिया गठबंधन ने अपने घुटने नहीं टेके हैं वहीं बीजेपी छल प्रपंच, ख़रीद फरोख्त और मीडिया के प्रोपोगंडे का इस्तेमाल करके गठबंधन को कमजोर करने में लगी है।

विपक्षी दलों के साथ आने में लगेगा वक्त

दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद शिवसेना यूबीटी के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के सांसद टूटने की खबरों पर उन्होंने कहा कि टीएमसी और शिवसेना की टूट में फर्क है। जब शिवसेना में फूट हो गई तो हम डरे नहीं थे, निर्भय होकर लड़ रहे थे, हमने हथियार नहीं डाले थे, जो भी हम लोग बचे थे वो सब लोग लड़ते रहे हमारी पार्टी लोकसभा में जीत गई। सिंबल और पार्टी हमारे हाथ से चली गई।

हम जो टूट रहे उनके पीछ नहीं भागते। हमने कहा कि जिसको जाना है जाइए, जिसको रहना है रहेंगे, उनके साथ हम पार्टी चलाएंगे। संजय राउत का संदेश ममता बनर्जी को था लेकिन यह भी सच है कि शिव सेना उद्धव गट को प्रियंका चतुर्वेदी जैसी नेता को भी ढोना पड़ रहा है जो मोदी और बीजेपी की नीतियों के प्रति सकरात्मक रूख रखती हैं यहाँ तक कि संघ के बड़े नेताओं के साथ विदेशों में मंच भी साझा कर रही है।

टीएमसी का बदला रूख

जहाँ तक टीएमसी का सवाल है उसने अपनी हार, बुरी हार को अंततः स्वीकार कर लिया है। ममता बनर्जी से गले मिल रहीं है, उनसे घर पर जाकर मुलाक़ात कर रही हैं। रोज़ ही लगभग राहुल गांधी से बात कर रही हैं और जो सबसे बड़ी बात काबिलेगौर है वो अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं से मिल रही हैं जो इंडिया गठबंधन से अलग हो चुके हैं और कांग्रेस से नाराज हैं। स्पष्ट है कि केजरीवाल को पार्टी में खींचने पर भविष्य में ममता बैनर्जी का साथ लिया जा सकता है। यह जब कभी भी होगा पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद होगा। टीएमसी का बदला रूख अच्छे संकेत दे रहा है।

भाजपा के साथ नहीं जाएगी डीएमके

इस पूरी कवायद में एक महत्वपूर्ण भूमिका डीएमके की है जिसने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी कीमत पर भाजपा के साथ नहीं जाएगी। यहाँ तक कि वो भाजपा के विरुद्ध अलग गठबंधन पर भी विचार कर रही है।डीएमके के प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने कहा है कि हमारे तीन सहयोगी दल कांग्रेस, आईयूएमएल, वीसीके अब तमिलगा टीवीके सरकार का हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि अब हम इंडिया ब्लॉक में नहीं हैं।

आम आदमी पार्टी पहले ही अलग हो चुकी है और हम अब उस गठबंधन में नहीं हैं। हांलाकि अंदरखाने जो सूचनाएं मिल रही हैं वो बेहद चौंकाने वाली है कहा यह जा रहा है कि स्टालिन ने राहुल के कहने पर ही अपने सहयोगियों को टीवीके के पक्ष में मतदान करने के लिए राजी किया और तो और एआईएडीएमके की टूट में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है। संभवतः स्टालिन किसी सही मौके की तलाश में है और आने वाले चुनाव में यह जरूरत पड़ने पर वो भाजपा के बजाय इंडिया गठबंधन के साथ जायेगे। जो सर्वाधिक दिलचस्प है वो यह है कि डिलिमिटेशन के मुद्दे पर डीएमके और टीवीके की राय एक ही है तो कम से कम तोड़ फोड़ के साथ 340 सीटों पर पहुंचने वाली बीजेपी अभी भी इस मुद्दे पर वोटिंग का साहस तो कत्तई नहीं करेगी।

रूठों को मनाने का फार्मूला मौजूद

दिल्ली में हुई बैठक के दौरान इंडिया ब्लॉक की बैठक भले पूर्व सदस्य पार्टियों की अनुपस्थिति की वजह से बीजेपी के निशाने पर रही लेकिन यह भी सच है कि भाजपा के ख़िलाफ़ बेहतर समन्वय के साथ लड़ाई लड़ने को भी सभी तैयार दिखे। यह भी स्पष्ट हुआ कि नाराज पक्षों से मौके पर तालमेल स्थापित करने के लिए एक वर्ग तैयार रखा जाये। हालांकि, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और चुनाव प्रचार रणनीतियों पर असहमति सामने आई, जिसमें कुछ नेताओं ने केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कांग्रेस के दृष्टिकोण पर चिंता व्यक्त की। ब्लॉक ने अधिक बार बैठकें करने और राष्ट्रीय मुद्दों पर समन्वय स्थापित करने का संकल्प लिया, अगस्त में तेलंगाना बैठक करने कर सहमति भी हुई यह अच्छे संकेत हैं।

इंडिया गठबंधन के पास अब ज़्यादा रणनीतिकार

आम आदमी पार्टी की नेता प्रियंका कक्कड़ ने इस बैठक के बाद एक इंटरव्यू में कहा कि डीएमके-कांग्रेस के मतभेद का जिक्र करते हुए कहा।“कांग्रेस का किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करने का एकमात्र उद्देश्य खुद को मजबूत करना है, देश को नहीं हम ऐसी पार्टी के साथ हाथ नहीं मिला सकते जो देश के युवाओं के खिलाफ हो।” लेकिन अगर गहराई से देखा जाये तो ऐसा नहीं है। कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के साथ भले वो राजद हों, डीएमके हों या समाजबादी पार्टी हो मिलकर ही चुनाव लड़ रही है लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व पर एकला चलो रे का नारा अंदरखाने गूंज रहा है। अलग अलग रिपोर्टों से पता चलता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं आंतरिक मतभेदों और नेतृत्व विवाद ने इंडिया ब्लॉक के कमजोर होने में योगदान दिया है।

आरोप प्रत्यारोप के बीच आत्ममंथन

कुछ नेताओं ने गठबंधन के पतन का कारण ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल की कार्रवाइयों को बताया, जबकि अन्य ने क्षेत्रीय दलों के बीच अविश्वास के स्रोत के रूप में कांग्रेस के बदलते गठबंधनों की ओर इशारा किया। संजय झा ने अपने इंटरव्यू में ममता और अरविंद को जानता दल यू के अलग होने की वजह बता दिया। यह सच है कि नीतीश के सीएम पद से हटने के बाद जनता दल यू के सांसद भी अप्रासंगिक हुए हैं। डीएमके ने कहा है कि वह अन्य विपक्षी दलों के बीच हो रहे घटनाक्रमों पर नजर रखेगी और यदि कोई आम सहमति बनती है तो भविष्य में भाजपा विरोधी गठबंधन का समर्थन करने पर विचार कर सकती है।2029 दूर हैं रणनीतियां बनेंगी बिगड़ेंगी लेकिन एक बात तय है कि अब इंडिया गठबंधन के हमले तेज होंगे क्योंकि तमाम पार्टियों के पास खोने को और कुछ नहीं है। ममता बनर्जी अब इंडिया गठबंधन पर ज़्यादा समय देंगी यह तय है। खेल अब शुरू हुआ है।

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