सुप्रीम कोर्ट ने शेरवानी के मामले में यूपी पुलिस को फटकार लगाई, हेट क्राइम के आरोप न जोड़ने पर नाराजगी

Sherwani Case

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शेरवानी मामले (Sherwani case) में उत्तर प्रदेश पुलिस की अनुपालन पर नाराजगी जताई और हेट क्राइम FIR में महत्वपूर्ण IPC धाराओं को बार-बार छोड़ने पर सवाल उठाया। कोर्ट ने सुधार के लिए दो सप्ताह का समय दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश पुलिस पर तीखी टिप्पणी की है। मुस्लिम मौलवी काजिम अहमद शेरवानी द्वारा दायर याचिका में पुलिस पर धार्मिक आधार पर हेट क्राइम की उचित जांच न करने का आरोप लगाया गया है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राज्य के द्वारा मामले से निपटने के तरीके पर गहरी नाराजगी व्यक्त की और पूछा कि स्पष्ट निर्देशों के बावजूद महत्वपूर्ण दंडात्मक धाराएं क्यों नहीं जोड़ी जा रही हैं?

शेरवानी ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया। उनके दाढ़ी खींची गई, टोपी जबरन उतारी गई और सांप्रदायिक रंग की गाली-गलौज की गई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से उचित और सही जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की उचित धाराएं नहीं जोड़ीं।

इससे पहले राज्य ने कोर्ट के समक्ष स्वीकार किया था कि धार्मिक नफरत भरे भाषण से संबंधित प्रासंगिक धाराएं FIR में शामिल नहीं की गईं। तब कोर्ट ने धारा 153B और धारा 295A IPC जोड़ने का निर्देश दिया था।आज की सुनवाई में राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने बताया कि मामले में आगे की जांच की अनुमति मांगी गई है।हालांकि, शेरवानी के वकील ने बेंच को बताया कि कोर्ट के पिछले निर्देशों के बावजूद धारा 153B को एक बार फिर हटा दिया गया है। इस पर बेंच ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

बेंच ने कहा, ‘ये साफ टिप्पणियां थीं, श्री नटराज। आपका जांच अधिकारी कोर्ट के साथ hide and seek क्यों खेल रहा है? क्या आप धारा 153B से पीछे हट सकते हैं?’ जवाब में नटराज ने कहा कि चार्जशीट दाखिल करने के समय यह धारा जोड़ी जा सकती है। याचिकाकर्ता के वकील ने आगे आरोप लगाया कि शेरवानी के बयान के महत्वपूर्ण हिस्सों को जानबूझकर हटा दिया गया, जिसमें टोपी उतारने से आगे की घटनाएं भी शामिल हैं।

सबमिशन पर गौर करते हुए कोर्ट ने जांच के तरीके पर नाराजगी जताई और संबंधित अधिकारियों से जवाबदेही मांगी। बेंच ने कहा, ‘जिस ACP ने यह रिपोर्ट दी है, उसे बुलाओ आकर बताए कि वो ऐसा क्यों कर रहा है।’ अपने आदेश में कोर्ट ने दर्ज किया कि 16 फरवरी 2026 के अपने पिछले आदेश के जवाब में राज्य द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे से वह ‘संतुष्ट नहीं’ है।

बेंच ने शुरू में जांच अधिकारी को बुलाने की इच्छा जताई, लेकिन राज्य की अनुरोध पर फिलहाल ऐसा नहीं किया।अंतिम मौका देते हुए कोर्ट ने जवाबदेहों को दो सप्ताह का समय दिया कि वे अपने पिछले निर्देशों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करें। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी।समाप्ति से पहले बेंच ने राज्य के वकील को चेतावनी दी कि संबंधित अधिकारियों को उचित सलाह दें।

कोर्ट ने कहा, ‘हमें उन्हें बुलाने में कोई खुशी नहीं है। लेकिन अगर वे अनावश्यक रूप से उसे आमंत्रित करते हैं…’

इससे पहले फरवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से संबंधित कई याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा था, लेकिन इस मामले को लंबित रखा क्योंकि इसमें अलग मुद्दे थे।

पिछली सुनवाई में केंद्र की ओर से ASG के.एम. नटराज ने कहा था कि अब मामले का महत्व नहीं रह गया है क्योंकि ट्रायल पहले से चल रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि अब ट्रायल चल रहा है, इस मामले में कुछ बाकी नहीं रह सकता।

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