नई दिल्ली। अब जबकि पांच राज्यों के चुनाव में मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है और नतीजों के कयास लगाए जा रहे हैं। सबकी निगाह उत्तर प्रदेश की ओर है।
जो सवाल यूपी के सियासी गलियारों में सर्वाधिक चर्चा में है वो यह है कि क्या कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ इस महत्त्वपूर्ण विधानसभा चुनाव में जाएगी? या अलग रास्ता चुनेगी? एक दूसरा सवाल यह भी है कि क्या अखिलेश यादव पीडीए के नाम पर मायावती के साथ कोई संभावना तलाश करेंगे ? या फिर कांग्रेस ही मायावती के साथ अलग राह चुन लेगी?
सभी 403 सीटों पर कांग्रेस लगा रही दम खम

कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अध्यक्ष बदलने की सुगबुगाहट के बीच संगठन को और मजबूत करने की कवायद में लगी है और अपनी सभी 403 विधानसभा सीटों को मजबूत करने की कोशिशें तेज कर रही है। 2027 के विधानसभा चुनावों में सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
उत्तर प्रदेश के प्रभारी पार्टी महासचिव अविनाश पांडे और यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का कहना है कि हम सभी सीटों पर तैयारियां कर रहे हैं; लेकिन गठबंधन पर आखिरी फैसला हाईकमान लेगा।
2024 लोकसभा चुनाव के फ्रेम से नहीं देख रहे कांग्रेस
दरअसल कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव को 2024 के लोकसभा चुनाव के फ्रेम से नहीं देख पा रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने कुल 79 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें समाजवादी पार्टी ने 62 में से 37 और कांग्रेस ने 17 में से 6 सीटें जीती थी।
कांग्रेस पार्टी को इस गठबंधन में अंत तक कम सीटें मिलने का मलाल था। कांग्रेस जानती है कि लाख कोशिशों के बावजूद सपा से सम्मानजनक सीटों पर समझौता संभव नहीं है। नहीं भुला जाना चाहिए कि कांग्रेस और सपा विधानसभा चुनाव में अब तक सिर्फ 2017 में ही मिलकर चुनाव लड़ी थी, जिनमें कांग्रेस को केवल 7 सीटें और सपा को 47 सीटें मिली थी, यह बड़ी हार थी।
उस चुनाव में कांग्रेस को 107 सीटें गठबंधन में मिली थीं। अलग-अलग चुनाव लड़ने का फायदा सपा को मिला। पिछले चुनाव में उसे 111 और कांग्रेस को महज 2 सीटें मिली।
कांग्रेस की तैयारियों का अंकगणित
प्रयागराज से कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ता शशिकांत त्रिपाठी कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन का कांग्रेस को निश्चित तौर पर नुकसान होता रहा है। ऐसे के निश्चित रूप से उसे अलग राह चुन लेनी चाहिए।
कांग्रेस ने SIR के दौरान लगभग 1.69 लाख बूथ-लेवल एजेंट नियुक्त किए थे, जो लगभग सभी पोलिंग बूथ पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के तहत वोटर वेरिफिकेशन में लगे रहे। वहीं यूपी में लगभग दो लाख पार्टी कार्यकर्त्ताओं को रजिस्टर और ट्रेनिंग दी गई है। यह कवायद बताती है कि कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर ली है। भले ही आलाकमान अंत में कोई और निर्णय लें।
दलितों और ओबीसी मतदाताओं को साधने की कोशिश
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपने दम पर ओबीसी मतदाताओं को साधना शुरू कर दिया है। यह साफ नजर आ रहा है कि समाजवादी पार्टी से इतर कांग्रेस दलित और पिछड़े मतदाताओं को साधने में लगी है। इस सिलसिले में कांग्रेस के ओबीसी विभाग की तरफ से समाज सुधारक ज्योतिबा फूले की जयंती पर इसी शनिवार को लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।
राज्य स्तरीय इस सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल होंगे। राहुल गांधी ने खुद भी मार्च महीने में इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित संविधान सम्मेलन के दौरान भाषण दिया था। इस दौरान उन्होंने जाति जनगणना और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर चर्चा की थी। उन्होंने कहा था कि नेहरू जी के समय कांशीराम जी होते तो सीएम होते।
सीएम के चेहरे पर नहीं एकमत
सूत्रों की मानें तो दरअसल कांग्रेस यूपी में दलित या फिर किसी सर्वमान्य पिछड़े चेहरे को पीएम बनाने पर सहमत है। अगर समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस गठबंधन करती है तो अखिलेश यादव के अलावा उसके पास और कोई विकल्प नहीं रह जाता।
दूसरी तरफ कांग्रेस इस बात को जानती है कि यूपी के दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण किसी वक्त में उसके कोर वोटर रहे हैं। सपा से परे जाकर ही इन वोटरों को साधा जा सकता है। इसी क्रम में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की आजम खान से कुछ दिनों पहले हुई मुलाकात महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।
विधानसभा में गठबंधन से कांग्रेस का नुकसान
समाजवादी पार्टी प्रवक्ता अनुराग भदौरिया कहते हैं कि सपा का मानना है कि पार्टी जिसका साथ पकड़ती है, दोस्त बनाती है और दोस्त जब मुसीबत में होता है तो साथ नहीं छोड़ती है। हम साथ रहकर ही भाजपा को हरा सकते हैं। मगर कांग्रेस के लिए सवाल सीटों के बंटवारे से जुड़े नफा-नुकसान के साथ-साथ आगामी लोकसभा चुनाव का भी है। जिसको लेकर कांग्रेस बेहद आशावान है। नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक प्रवक्ता कहते हैं कि सपा के साथ गठबंधन का हमें अन्ततः नुकसान ही होना है। उनसे सम्मानित बंटवारे की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
मायावती की माया किसके साथ

जहां तक मायावती का सवाल है अखिलेश जानते हैं कि उनके साथ गठबंधन करके समाजवादी पार्टी को कोई बहुत बड़ा लाभ नहीं होने जा रहा है। फिर भी वे उनसे किसी भी किस्म के गठबंधन की संभावना से इंकार भी नहीं करते हैं।
गुरुवार को जब पत्रकारों ने अखिलेश यादव से पूछा कि मायावती कहती हैं कि अखिलेश यादव को दलितों से प्रेम नहीं है, वे सिर्फ दिखावा करते हैं। इस पर अखिलेश यादव ने कहा, “हमारे और मायावती जी के संबंध 2019 में भी रहे हैं, उनके समाज के लिए हम लोग लड़ रहे हैं और हम ही वह हैं जिन्होंने उनके बाद बाबा साहेब की प्रतिमा लगवाई।
यह मायावती के लिए भी बेहतर अवसर होगा कि 2017 में 19 की तुलना में 2022 में घटकर 1 पर आ गई। उनकी पार्टी किसी न किसी से गठबंधन करके विधानसभा चुनावों के अपनी जोर आजमाइश करे। हालांकि कहने वाले यह भी कहते हैं कि मायावती के विकल्प सर्वाधिक खुले हैं। सपा से संभव न हुआ तो वो भाजपा से हाथ मिला लेंगी।









