Kerela| केरल के वायनाड में निर्माणाधीन अनक्कमपोयिल-कल्लाडी-मेप्पाडी टनल परियोजना के पास हुए भूस्खलन ने एक बार फिर विकास कार्यों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारी बारिश के दौरान पहाड़ी से बड़ी मात्रा में मिट्टी और पत्थर नीचे आ गिरे, जिससे निर्माण स्थल पर काम कर रहे मजदूर इसकी चपेट में आ गए। इस हादसे में अब तक कम से कम तीन लोगों की मौत हो चुकी है, कई घायल हैं और कुछ मजदूरों के मलबे में फंसे होने की आशंका है। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है।
केवल बारिश नहीं, लापरवाही के भी आरोप
राज्य सरकार के शुरुआती बयानों और जांच में संकेत मिले हैं कि यह हादसा केवल भारी बारिश का नतीजा नहीं हो सकता। आरोप है कि सुरंग निर्माण के दौरान निकाली गई मिट्टी और पत्थरों को वैज्ञानिक तरीके से हटाने के बजाय निर्माण स्थल के पास ही जमा कर दिया गया था। बताया जा रहा है कि जिला प्रशासन ने पहले भी सुरक्षा को लेकर चेतावनी दी थी। यदि सुरक्षा नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया, तो यह मामला निर्माण संबंधी लापरवाही का भी माना जा सकता है।
बदलते मौसम ने बढ़ाया खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश के कई हिस्सों में मौसम तेजी से बदल रहा है। पश्चिमी घाट, हिमालय और पूर्वोत्तर जैसे पहाड़ी इलाकों में कम समय में बहुत अधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। लगातार हो रही तेज बारिश से पहाड़ों की मिट्टी कमजोर हो जाती है, जिससे भूस्खलन, अचानक बाढ़ और बादल फटने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे हालात में निर्माण परियोजनाओं में अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है।
भारत में क्यों बढ़ रहे हैं भूस्खलन?
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल बारिश ही भूस्खलन की वजह नहीं है। पहाड़ों की कटाई, जंगलों का कम होना, बिना पर्याप्त भू-वैज्ञानिक अध्ययन के सड़क और सुरंग निर्माण, तथा खुदाई से निकले मलबे का सही तरीके से निस्तारण न होना भी बड़े कारण हैं। वायनाड जैसे संवेदनशील क्षेत्र, जहां पहले भी विनाशकारी भूस्खलन हो चुके हैं, वहां निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करना बेहद जरूरी माना जाता है।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी
प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन उनसे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। इसके लिए जोखिम वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान, निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी, सुरक्षा नियमों का पालन, समय पर चेतावनी प्रणाली और तेज राहत-बचाव व्यवस्था जरूरी है। साथ ही, निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
वायनाड का यह हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन उनकी कीमत लोगों की जान नहीं होनी चाहिए। सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से किया गया विकास ही लंबे समय में समाज और देश दोनों के लिए लाभदायक साबित होगा।









