नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) करने का अधिकार देते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और उसे स्वच्छ एवं निष्पक्ष मतदाता सूची तैयार करने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया चुनाव आयोग की शक्तियों से बाहर नहीं है और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन भी नहीं करती। कोर्ट के अनुसार, आयोग विशेष परिस्थितियों में फर्जी, दोहरे और मृत मतदाताओं को हटाने तथा योग्य मतदाताओं को जोड़ने के लिए ऐसी कार्रवाई कर सकता है।
बिहार में SIR का असर
याचिकाकर्ताओं ने बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया को चुनौती दी थी। उन्होंने इसे NRC जैसा अभ्यास बताया और कहा कि यह मतदाताओं के अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग की कार्रवाई को पूरी तरह सही ठहराया।
चुनाव आयोग द्वारा बिहार में चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की गहन जांच की गई। इस प्रक्रिया में फर्जी, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए तथा नए योग्य मतदाताओं को जोड़ा गया। 1 अक्टूबर 2025 को जारी फाइनल लिस्ट के अनुसार, बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर 7.42 करोड़ रह गई, जो पहले 7.89 करोड़ थी। यानी करीब 6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
SIR में प्रमुख आंकड़े:
कुल 69.29 लाख नाम सूची से हटाए गए
21.53 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया
22.34 लाख मतदाता मृत पाए गए
6.85 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज थे
36.44 लाख मतदाता अपने मूल स्थान से शिफ्ट हो चुके थे
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा बिहार में चलाया गया स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की जगह नहीं ले रहा है। बल्कि, यह आयोग की संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 324) के तहत दी गई जिम्मेदारी को और मजबूत बनाता है तथा कानून की सीमा के अंदर ही किया गया है।कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह वैध और संवैधानिक है। आयोग ने अपनी शक्तियों का अतिक्रमण नहीं किया है। अदालत ने SIR के दौरान चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई पूरी कार्यप्रणाली को निष्पक्ष और कानूनसम्मत बताते हुए इसे बरकरार रखा।









