नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme court)ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एकपक्षीय निलंबित करने से मना किया और चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि अदालत को कुछ अंतरिम आदेश पारित करने होंगे, नहीं तो देश जल उठेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली एकपक्षीय अंतरिम याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पहले चुनाव आयोग और अन्य पक्षों से जवाब मांगा जाना चाहिए, क्योंकि आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े कई फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले लिए। कोर्ट के साफ किया कि फार्म 6 में बदलाव के लिए उनसे कोई इजाजत नहीं ली गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं को लेकर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने भारत संघ, भारतीय चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू, डॉ. विवेक जोशी, उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग (आईएएस) और डीजी (आईटी) सीमा खन्ना को याचिका पर नोटिस जारी किया।यह याचिका द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े 14 महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग के नाम पर लिए, जबकि दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका बड़ी बेंच के समक्ष लंबित है, लेकिन कुछ अंतरिम कदम जरूरी हैं, क्योंकि अब हर नागरिक अपने मतदान अधिकार को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहा है।
उन्होंने सीईसी अधिनियम की धारा 18 का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि भारतीय चुनाव आयोग के फैसले यथासंभव सर्वसम्मति से होने चाहिए, और यदि सर्वसम्मति न हो तो बहुमत से होने चाहिए।
उन्होंने धारा 16 का भी जिक्र किया, जो मुख्य चुनाव आयुक्त को आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए कानूनी छूट देती है, और कहा कि ऐसी सुरक्षा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को भी उपलब्ध नहीं है।
सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम एक गंभीर स्थिति से जूझ रहे हैं, जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर सकती है। पहले चुनाव आयोग के प्रति कुछ सम्मान के साथ चुनाव होते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ऐसे तरीके से काम कर रहे हैं, जो वैधानिक ढांचे के पूरी तरह विपरीत है।”
जब पीठ ने कहा कि पहले यह तय करना होगा कि कोई उल्लंघन हुआ है या नहीं, तो सिंह ने कहा, “अदालत को कुछ अंतरिम आदेश पारित करने होंगे, नहीं तो देश जल उठेगा।”
पीठ ने कहा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित कर दिया गया, तो चुनाव आयोग का काम रुक जाएगा। पीठ ने पूछा, “चुनाव कौन कराएगा?” सिंह ने सुझाव दिया कि बाकी दो चुनाव आयुक्त काम संभाल सकते हैं।
पीठ ने कहा कि कोई आदेश पारित करने से पहले संबंधित व्यक्तियों के जवाब लेने होंगे। सिंह ने कहा कि तब अदालत यह आदेश दे कि चुनाव आयोग फैसले केवल सर्वसम्मति या बहुमत से ले। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “कानून अनिवार्य है और हम उनसे इसके पालन की अपेक्षा करते हैं। यदि कोई उल्लंघन हुआ, तो हम उसे निरस्त कर देंगे।”सिंह ने पूछा, “आप क्या-क्या निरस्त कर सकते हैं? आप चुनाव को निरस्त नहीं कर सकते, न ही चुनी हुई सरकार को।”
सिंह ने कहा कि एकतरफा फैसलों के कारण मतदाता सूची ही दूषित हो गई है। न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या अदालत बिना पक्षों को सुने ऐसा एकपक्षीय आदेश दे सकती है। उन्होंने कहा, “यदि रिकॉर्ड दिखाते हैं कि कोई फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ, तो हम उन फैसलों पर रोक लगाकर उन्हें अधिकार-क्षेत्र से बाहर बता देंगे। क्या हम एकपक्षीय रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सभी फैसले एकतरफा थे? हम उनसे स्पष्ट और पारदर्शी जवाब की अपेक्षा करते हैं।”जब सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति स्वयं समाचार रिपोर्टों को स्वीकार करने जैसी है, तो मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा कि अदालत केवल अखबार की रिपोर्टों पर निर्भर होकर आदेश नहीं दे सकती।
अंत में पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी किया। पीठ ने अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी की संबंधित याचिका पर भी नोटिस जारी किया, जिसमें समान राहत मांगी गई है। संबंधित मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं।याचिकाएं उन रिपोर्टों के संदर्भ में दायर की गई थीं, जिनमें कहा गया था कि लगभग 14 फैसले ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग के नाम पर लिए, जबकि अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने आपत्ति दर्ज कराई थी। याचिकाओं के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच विशेष गहन पुनरीक्षण के विभिन्न चरणों को लेकर कम से कम 14 आपत्तियां दर्ज कीं।
एक याचिका राकेश कुमार सिंह ने दायर की है, जिसमें अन्य बातों के साथ यह घोषणा मांगी गई है कि बहु-सदस्यीय निकाय होने के नाते चुनाव आयोग के फैसले एकतरफा नहीं लिए जा सकते। याचिकाकर्ता ने आयोग के मूल रिकॉर्ड की जांच की भी मांग की है, ताकि यह देखा जा सके कि विवादित कार्रवाई संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के अनुसार हुई या नहीं। अंतरिम राहत के रूप में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त पद से निलंबित करने की भी मांग की गई है।
दूसरी याचिका अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने दायर की है, जिसमें कथित रूप से एकतरफा लिए गए 14 फैसलों को रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग/विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग की है, जिसमें साइबर सुरक्षा और आईटी विशेषज्ञ शामिल हों।
प्रस्तावित जांच में ECINET और ERONET डेटाबेस का फॉरेंसिक ऑडिट तथा उन परिस्थितियों की जांच मांगी गई है, जिनमें याचिका के अनुसार विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों से 13 करोड़ नाम हटाए ग।
याचिकाकर्ता ने सक्षम प्राधिकारी को ज्ञानेश कुमार, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, निदेशक जनरल (आईटी) सीमा खन्ना और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज कर अभियोजन शुरू करने का निर्देश देने की भी मांग की है। धारा 32 मतदाता सूचियों की तैयारी, पुनरीक्षण या सुधार से जुड़े आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान करती है।
याचिका में आरोप है कि शिकायत की गई कार्रवाइयों में फॉर्म 6 में कथित अनधिकृत बदलाव, मतदाता सूची डेटाबेस का केंद्रीकरण, ईसीआईनेट प्रणाली के जरिए पात्र मतदाताओं को बहाल न करना, और पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के शामिल होने को चुनौती देते हुए चुनाव आयोग के नाम पर 16.10 लाख अपील दायर करना शामिल है।









