नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कहा है कि केंद्र सरकार ने इस सप्ताह संसद का विशेष सत्र विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण के बजाय परिसीमन के मुद्दे पर बुलाया है।
द हिंदू अखबार में एक लेख में गांधी ने कहा कि अनौपचारिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सरकार की परिसीमन योजना अत्यंत खतरनाक है और संविधान पर सीधा हमला है।
यह लेख उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सभी दलों को पत्र लिखकर महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन के लिए समर्थन मांगने के बाद लिखा है। महिला आरक्षण विधेयक, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है, विधायी निकायों में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है। इसे 2023 में संसद में पारित किया गया था। एक प्रस्तावित विधेयक में इसके कार्यान्वयन को 2027 की जनगणना से अलग करने और इसे 2011 की जनगणना पर आधारित करने का प्रस्ताव है ताकि यह 2029 के आम चुनाव से पहले लागू हो सके। सोनिया गांधी के इस लेख की सियासी हलकों में बेहद चर्चा है।
गांधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री विपक्ष से उन विधेयकों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें वे संसद के विशेष सत्र में जबरदस्ती पारित कराना चाहते हैं, जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अपने चरम पर होगा।
उन्होंने लिखा, ‘इस असाधारण जल्दबाजी का केवल एक ही कारण हो सकता है, और वह है राजनीतिक लाभ उठाना और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में डालना। प्रधानमंत्री हमेशा की तरह सच को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं।’
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता ने कहा कि केंद्र सरकार ने ही महिला आरक्षण विधेयक को अगली जनगणना से जोड़ा है।
उन्होंने लिखा, ‘विपक्ष ने यह शर्त नहीं रखी थी। दरअसल, राज्यसभा में विपक्ष के नेता श्री मल्लिकार्जुन खरगे ने पुरजोर मांग की थी कि आरक्षण का प्रावधान 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जाए। सरकार ने अपने कारणों से इस पर सहमति नहीं जताई।’
सोनिया गांधी ने कहा कि अब हमें बताया जा रहा है कि अनुच्छेद 334-ए में संशोधन करके महिलाओं के लिए आरक्षण 2029 से ही लागू किया जाएगा। प्रधानमंत्री को अपना यह फैसला बदलने में 30 महीने क्यों लग गए? और वे विशेष सत्र बुलाने के लिए कुछ हफ्तों का इंतजार क्यों नहीं कर सकते?
विपक्षी नेताओं ने सरकार को एक बार नहीं बल्कि तीन बार पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को अंतिम चरण के चुनाव समाप्त होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, ताकि सरकार के नए प्रस्तावों पर चर्चा की जा सके। लेकिन इस बिल्कुल वाजिब अनुरोध को ठुकरा दिया गया है।
इसके बजाय, प्रधानमंत्री ने संपादकीय लेख लिखने, राजनीतिक दलों से अपील करने और सम्मेलन आयोजित करने का सहारा लिया है। यह एक छलपूर्ण रणनीति है जो प्रधानमंत्री की श्रेष्ठता की भावना और उनके ‘या तो मेरी बात मानो या फिर रास्ता छोड़ दो’ वाले रवैये को दर्शाती है, गांधी ने आगे कहा।
कांग्रेस नेता ने केंद्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण विधेयक को संभालने के तरीके और पूर्व प्रधानमंत्री और उनके पति राजीव गांधी की सरकार द्वारा पंचायतों और नगर पालिकाओं के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण संबंधी कानून लाने के तरीके की तुलना की।
उन्होंने कहा, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 इसी उपलब्धि की नींव पर खड़ा है।’
गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2021 में होने वाली जनगणना को लगातार टाला।
उन्होंने लिखा, ‘इसका एक परिणाम यह हुआ है कि 10 करोड़ से अधिक लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत अपने कानूनी अधिकारों से वंचित रह गए हैं, जो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना का आधार है। जनगणना का काम पांच साल की अस्पष्ट देरी के बाद ही शुरू हो पाया है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘बड़े गर्व से दावा किया जा रहा है कि यह एक डिजिटल जनगणना है। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्वयं सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि इसके डिजिटल स्वरूप के कारण, अधिकांश जनसंख्या गणना के आंकड़े 2027 में ही उपलब्ध हो जाएंगे। इस सत्र को बुलाने और परिसीमन करने की सरकार की जल्दबाजी के बहाने स्पष्ट रूप से खोखले हैं।’
गांधी ने यह भी कहा कि जाति जनगणना के कारण 2027 की जनगणना के प्रकाशन में देरी होने का ‘प्रचार’ ‘बिल्कुल सच नहीं है’।
उन्होंने कहा, ‘वास्तव में, प्रधानमंत्री का असली इरादा अब जाति जनगणना में और देरी करना और उसे पटरी से उतारना है।’
सोनिया गांधी ने लिखा, ‘विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू होने वाला है। फिर भी, अभी तक सांसदों के साथ कोई आधिकारिक प्रस्ताव साझा नहीं किया गया है कि सरकार सत्र में किन मुद्दों पर विचार करना चाहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परिसीमन के लिए किसी फार्मूले का सुझाव दिया जा रहा है। किसी भी परिसीमन से पहले, पहले की तरह, जनगणना होनी चाहिए। और यह स्पष्ट है कि लोकसभा की संख्या में वृद्धि करने वाला कोई भी परिसीमन राजनीतिक रूप से न्यायसंगत होना चाहिए, न कि केवल गणितीय रूप से। परिवार नियोजन में अग्रणी रहे राज्यों और छोटे राज्यों को पूर्ण या सापेक्ष रूप से नुकसान में नहीं रखा जाना चाहिए। आनुपातिक वृद्धि वास्तव में सापेक्ष प्रभाव में कमी ला सकती है क्योंकि पूर्ण संख्याओं में अंतर बढ़ जाता है।’
कांग्रेस नेता ने कहा कि संसद का मानसून सत्र जुलाई के मध्य में शुरू होगा। उन्होंने लिखा, ‘अगर सरकार 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष के साथ अपने प्रस्तावों पर चर्चा करे, सार्वजनिक बहस के लिए समय दे, और फिर मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार करे, तो आसमान नहीं गिर जाएगा। अशांत समय में राजनीतिक बयानबाजी के अलावा, हमारी राजनीति में इतने दूरगामी बदलाव लाने की इस जल्दबाजी का कोई औचित्य नहीं है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और अलोकतांत्रिक है। महिलाओं के लिए आरक्षण यहाँ मुद्दा नहीं है। वह पहले ही तय हो चुका है। असली मुद्दा परिसीमन है, जो अनौपचारिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर, बेहद खतरनाक है और संविधान पर सीधा हमला है।’
इससे पहले, प्रधानमंत्री ने लिखा कि 2023 में महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना संसद में एकता का प्रतीक एक यादगार क्षण था।
उन्होंने कहा, ‘मैं उस दिन को भारत की संसदीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक मील का पत्थर मानता हूं। व्यापक विचार-विमर्श के बाद, हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पूरे देश में उसके सही अर्थों में लागू करने का समय आ गया है। यह अनिवार्य है कि 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण के साथ कराए जाएं। इससे भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में नई ऊर्जा का संचार होगा और जनता का विश्वास मजबूत होगा। इससे शासन में अधिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित होगा।’











