बंगाल चुनाव नतीजों पर सवाल: पराकला प्रभाकर बोले- ‘53 सेकंड में एक वोट’ लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बड़ा संदेह

Parakala Prabhakar

लेंस न्यूज। अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक Parakala Prabhakar ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अंग्रेजी अखबार द हिंदू में प्रकाशित अपने लेख ‘Deconstructing the Bengal ‘miracle’ में उन्होंने दावा किया कि भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे सिर्फ सत्ता विरोधी लहर नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की “संदिग्ध गति” और मतदाता सूची संशोधन जैसे कई कारक भी जिम्मेदार हो सकते हैं।

लेख में कहा गया है कि, केंद्रीय मंत्रियों, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पार्टी नेताओं ने बंगाल चुनाव में अभूतपूर्व प्रचार अभियान चलाया। प्रधानमंत्री ने खुद 18 रैलियां कीं, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री ने करीब 50 सभाओं को संबोधित किया। इसके साथ ही केंद्रीय एजेंसियों और अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती भी चर्चा में रही।

पराकला प्रभाकर ने चुनाव आयोग के मतदान आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि बंगाल में कई चरणों में मतदान की गति ‘अविश्वसनीय’ थी। उनके मुताबिक पहले और दूसरे चरण में सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक कई समय स्लॉट में औसतन 40 से 50 सेकंड के भीतर एक वोट दर्ज हुआ। लेख में कहा गया कि मतदान केंद्रों पर पहचान सत्यापन, स्याही लगाना, फॉर्म एंट्री, वीवीपैट और ईवीएम प्रक्रिया को देखते हुए इतनी तेज गति व्यावहारिक नहीं मानी जा सकती।

उन्होंने तुलना करते हुए लिखा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में यह दर दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बेहद असामान्य है। लेख के अनुसार भूटान में प्रति वोट औसत समय 106 सेकंड, ब्राजील में 123 सेकंड और ब्रिटेन में करीब 102 सेकंड था, जबकि बंगाल में यह औसत केवल 53.7 सेकंड प्रति वोट बताया गया।

लेख में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के जरिए मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को भी बड़ा मुद्दा बताया गया। दावा किया गया कि कई सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। लेखक ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया भविष्य में मताधिकार को प्रभावित करने वाली दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

पराकला प्रभाकर ने निष्कर्ष में कहा कि पश्चिम बंगाल चुनाव परिणामों को केवल ‘एंटी इनकंबेंसी’ से नहीं समझा जा सकता। उनके अनुसार मतदान की असामान्य गति, मतदाता सूची संशोधन, केंद्रीय बलों की तैनाती और चुनाव आयोग की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका जैसे पहलुओं ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

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