रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच एक नया सवाल खड़ा हो गया है। हाल के महीनों में सुरक्षा बलों को नक्सलियों के कब्जे से करोड़ों रुपये का सोना (Naxalites’ gold) और नकदी बरामद हुई है।
ताजा मामले में बीजापुर जिले में 25 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद करीब 7 किलो से ज्यादा सोना और करोड़ों रुपये नकद बरामद किए गए हैं।
लेकिन अब इस सोने के स्रोत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कोंटा के पूर्व विधायक और आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने दावा किया है कि नक्सलियों के पास मिला सोना संभवतः विदेशी बैंकों, खासकर स्विट्जरलैंड से आया हो सकता है, और इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि आखिर नक्सलियों के पास इतनी बड़ी मात्रा में सोना कैसे पहुंचा?
दरअसल, बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के दौरान सुरक्षा बलों को लगातार सफलता मिल रही है।
केंद्र सरकार ने ऐलान कर दिया है कि देश से नक्सलवाद अब लगभग खत्म हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त भारत अभियान का ऐलान किया था।
इसके बाद से लगातार चले ऑपरेशन और सरेंडर नीति की वजह से नक्सली संगठन काफी कमजोर हो चुका है। ज्यादातर नक्सली या तो मारे जा चुके हैं या फिर सरेंडर कर चुके हैं। कई टॉप कमांडर तक मारे गए। इनमें महासचिव बसवराजु, कोसा दादा, राजू दादा और माड़वी हिड़मा जैसे कमांडर मारे गए।
इसके बाद संगठन के कई टॉप कमांडरों ने भी हथियार डाल दिए हैं, और अब जो थोड़े बहुत नक्सली बचे हैं वे इस स्थिति में नहीं हैं कि पहले की तरह सशस्त्र संघर्ष या बड़े पैमाने पर नक्सली हिंसा को आगे बढ़ा सकें।
अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में ऐलान किया कि देश लगभग नक्सल मुक्त हो चुका है। उन्होंने कहा था कि कई राज्य पहले ही नक्सल मुक्त हो चुके थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार होने की वजह से इस अभियान में कुछ देरी हुई।
संसद में गृह मंत्री के ऐलान के दिन ही बीजापुर जिले में पूना मारगेम – पुनर्वास से पुनर्जीवन अभियान के तहत 25 माओवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 12 महिला नक्सली भी शामिल हैं।
इन सभी पर मिलाकर करीब 1 करोड़ 47 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
आत्मसमर्पण के दौरान सुरक्षा बलों को माओवादी इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक बरामदगी भी मिली।
कुल 14 करोड़ 6 लाख रुपये की संपत्ति बरामद की गई, जिसमें करीब 2 करोड़ 90 लाख रुपये नकद और लगभग 7.20 किलो सोना, जिसकी कीमत 11 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जा रही है।
इसके अलावा AK-47, LMG, SLR और INSAS समेत 90 से ज्यादा घातक हथियार भी बरामद किए गए।
यह पहली बार नहीं है जब बस्तर में नक्सलियों के पास से सोना बरामद हुआ हो। इससे पहले जगदलपुर में सरेंडर किए गए नक्सलियों के पास से भी करीब डेढ़ किलो सोना बरामद किया गया था।
यानी अब यह सवाल लगातार उठ रहा है कि नक्सली संगठन के पास इतनी बड़ी मात्रा में सोना आखिर आया कहां से?
इसी मुद्दे को लेकर सुकमा जिले के कोंटा से पूर्व विधायक और आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने बड़ा दावा किया है।
दंतेवाड़ा सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत करते हुए मनीष कुंजाम ने कहा कि नक्सलियों के पास जो सोना मिला है, उसकी विदेशी कनेक्शन से जांच होनी चाहिए।
कुंजाम का कहना है कि पैसा तो नक्सलियों तक यहां के लोग और एजेंट पहुंचाते थे, लेकिन इतना सोना संभव है कि विदेशी बैंकों, खासकर स्विट्जरलैंड से आया हो। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर इस मामले से जुड़े सबूत भी सामने रखे जा सकते हैं।
मनीष कुंजाम ने नक्सलियों की विचारधारा और उनके व्यवहार पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वर्षों तक नक्सली जल-जंगल-जमीन की लड़ाई का दावा करते रहे, लेकिन असल में उनका लक्ष्य स्थानीय संसाधनों की रक्षा करना नहीं था।
कुंजाम के मुताबिक नक्सली लाल किले पर लाल झंडा फहराने का सपना देख रहे थे, जबकि जमीन पर वे कई जगहों पर खनन कंपनियों से पैसे लेकर खदानों को शुरू होने देते थे।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग जिलों में ग्रामीणों ने आमदई और रावघाट खदानों के खिलाफ लंबे समय तक आंदोलन किया, लेकिन इसके बावजूद खदानें शुरू हो गईं। उनका आरोप है कि बाद में नक्सलियों ने रेट बढ़ाकर कंपनियों और ठेकेदारों से वसूली शुरू कर दी।
इधर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सरेंडर किए हुए नक्सलियों के हवाले से यह भी दावा किया गया है कि 2016 की नोटबंदी के दौरान संगठन के पास बड़ी मात्रा में एक हजार और पांच सौ रुपये के पुराने नोट थे।
बताया जाता है कि इन नोटों को सीधे बदल पाना संभव नहीं था, इसलिए आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के जरिए इन नोटों के बदले सोना खरीदा गया और उसे जंगलों में अलग-अलग जगहों पर गाड़कर छिपा दिया गया था।
हालांकि इस दावे की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे नक्सलियों के पास सोना पहुंचने की एक संभावित कहानी सामने आती है।
पुलिस के अनुसार 1 जनवरी 2024 से 31 मार्च 2026 तक बीजापुर जिले में ही करीब 3 हजार माओवादी कैडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इस दौरान सुरक्षा बलों ने करीब 19 करोड़ 43 लाख रुपये से ज्यादा की संपत्ति बरामद की है, जिसमें नकद और सोना दोनों शामिल हैं।
बस्तर में बढ़ते आत्मसमर्पण और लगातार हो रही बरामदगी को नक्सलवाद के खिलाफ अंतिम चरण की लड़ाई माना जा रहा है।
लेकिन, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नक्सलियों के पास मिला करोड़ों का सोना आखिर आया कहां से, क्या यह केवल वसूली का पैसा था, क्या यह नोटबंदी के दौरान बदले गए पैसों का नतीजा है, या इसके पीछे कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी रहा है? यह सवाल अब जांच एजेंसियों और सरकार के सामने खड़ा है।









