नई दिल्ली | मीडिया (Media) समूहों ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि भारत सरकार का गोपनीयता कानून, जिसके तहत पत्रकारों को उन लोगों से सहमति लेनी होगी जिनके बारे में वे लिखते हैं। यह सेंसरशिप के बराबर है और इससे न्यूजरूम बंद हो सकते हैं। यह इस कानून के खिलाफ सबसे हाई-प्रोफाइल चुनौती है।
यह मुकदमा उस समय आया है जब 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत में प्रेस स्वतंत्रता में गिरावट के आरोप लग रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि कई मुख्यधारा मीडिया आउटलेट्स ने मोदी सरकार की पर्याप्त जांच नहीं की है। सरकार ने ऐसे आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि वह प्रेस स्वतंत्रता का सम्मान करती है।
21 न्यूज पब्लिशर्स के एक समूह ने, जिसमें अरबपतियों मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की कंपनियां भी शामिल हैं, गोपनीयता कानून को चुनौती दी है। उनका कहना है कि यह जांच पत्रकारिता को कुचल देगा और नई दिल्ली को पत्रकारों के स्रोतों की पहचान करने देगा। रॉयटर्स ने सोमवार को इसकी रिपोर्ट की थी।
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की वकील माधवी गोराडिया दिवान ने जजों से कहा, “यह खबर की पूरी अवधारणा को बदल रहा है।”उन्होंने आगे कहा, “अगर हमें अनुमति लेनी पड़े तो न्यूजरूम बंद हो जाएंगे… यह पूरी तरह पूर्व-सेंसरशिप का शासन होगा।”
यह मुकदमा मोदी के गोपनीयता कानून के खिलाफ सबसे हाई-प्रोफाइल चुनौती है। अब तक केवल फ्री स्पीच एक्टिविस्ट्स और छोटे न्यूज आउटलेट्स के एक समूह ने इसे चुनौती दी थी।सुप्रीम कोर्ट ने माम
ले को अगले महीने के लिए पोस्ट कर दिया।
बड़े मीडिया समूह बनाम मोदी
मीडिया कंपनियों को अगस्त में सरकार के साथ एक बैठक में आश्वासन मिला था कि कानून प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा करेगा, लेकिन यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन की तरह पत्रकारों के लिए लिखित छूट न होना चिंताजनक था। न्यूज पब्लिशर्स ने इस महीने की शुरुआत में फाइलिंग में यह कहा था।पब्लिशर्स मांग कर रहे हैं कि कानून के अधिकांश विवादास्पद प्रावधान, जो मई 2027 से लागू होंगे, रद्द किए जाएं। उनका कहना है कि कानून पब्लिशर्स को कहानियां मिटाने के लिए मजबूर कर सकता है और सरकार को पब्लिशर्स से ऐसी जानकारी मांगने की शक्ति दे सकता है जिससे रिपोर्टरों के स्रोत उजागर हो जाएं।
DNPA, जिस समूह ने मोदी सरकार को चुनौती दी है, के सदस्यों में अंबानी की Network18, अडानी की NDTV और अन्य प्रमुख मीडिया समूह शामिल हैं, जैसे इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट (जो टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का हिस्सा है और भारत की सबसे ज्यादा बिकने वाली अंग्रेजी दैनिक का प्रकाशक है। सुनवाई के दौरान मीडिया समूहों के वकील दिवान ने कहा कि कानून के पहले संस्करणों में पत्रकारों को बाहर रखा गया था, लेकिन अंतिम संस्करण में ऐसा नहीं किया गया।









