CG NEWS: छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में 25 साल के अंधे और बूढ़े वन भैंसे ‘छोटू’ को लेकर एक बड़ा और विवादास्पद फैसला लिया जा रहा है। वन विभाग अब छोटू को असम से लाई गई तीन मादा वन भैंसों के साथ जंगल में ‘सॉफ्ट रिलीज’ करने की तैयारी कर रहा है। सवाल उठ रहा है – क्या 20 साल की कैद के बाद यह अंधा-बूढ़ा जानवर जंगल में खुद को बचा पाएगा या यह फैसला उसकी मौत का कारण बन जाएगा?

छोटू की दर्दनाक कहानी
वन भैंसा छोटू का जन्म 2002 में हुआ था शुरुआती 4 साल वह जंगल में स्वतंत्र घूमता रहा लेकिन 2006 में वन विभाग ने बिना किसी आधिकारिक आदेश के उसे पकड़कर बाड़े में बंद कर दिया तब से पिछले 20 साल से वह कैद में है। इन 20 सालों में छोटू से कई बच्चे पैदा हुए लेकिन वन विभाग ने उन्हें हाइब्रिड या क्रॉसब्रीड बताकर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व से बाहर कर दिया। अब छोटू 25 साल का हो चुका है यानी अपनी प्रजाति की औसत उम्र के आखिरी दौर में।जानकारों का कहना है कि इतनी उम्र में प्रजनन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है।

2023 की वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में खुद छोटू के केयरटेकर ने बताया था कि कुछ साल पहले मैटिंग का प्रयास किया गया था, जो असफल रहा।वन विभाग का नया प्लान – क्या है मोड ऑफ ऑपरेशन?12 जनवरी 2026 को अधिकारियों की बैठक में फैसला लिया गया कि असम से लाई गई तीन मादा वन भैंसों को बारनवापारा अभ्यारण्य से उदंती लाया जाएगा। प्लान इस प्रकार है:पहले 45 दिन तक सभी जानवरों को बाड़े में रखा जाएगा उसके बाद छोटू और तीनों मादाओं को रेडियो कॉलर लगाकर सॉफ्ट रिलीज किया जाएगा।
उद्देश्य स्पष्ट है – छोटू से इन मादाओं का प्रजनन कराकर उदंती-सीतानदी में शुद्ध नस्ल के वन भैंसों की संख्या बढ़ाना। छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वन भैंसा वर्तमान में काफी दुर्लभ हो चुका है।सबसे बड़ा सवाल – क्या छोटू जंगल में जी पाएगा?6 अगस्त 2025 को वन भैंसा गवर्निंग काउंसिल की बैठक में साफ लिखा गया कि छोटू पूरी तरह अंधा है। वह 20 साल से बाड़े में रहने का आदी हो चुका है और वन विभाग रोज उसे आहार देता है।

जानकारों का मानना है की अंधेपन की वजह से छोटू जंगल में दूर नहीं जा पाएगा। वह बाड़े के आसपास ही भटकता रहेगा। अगर मादाएं जंगल में विचरण करती हुई दूर चली गईं, तो प्रजनन लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
तीन मादाओं और उनके शावक पर खतरा
तीन मादाओं में से एक के साथ एक शावक भी है। वन भैंसा प्रजाति आमतौर पर बड़े झुंड में रहती है, जो खतरे के समय सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन सिर्फ 3-4 जानवरों का छोटा झुंड बाघों वाले इलाके में बेहद कमजोर साबित हो सकता है।पर्यावरणविदों का डर है कि ये मादाएं जंगल में अकेली पड़कर आसानी से बाघ का शिकार बन सकती हैं।

क्या उदंती अब प्रयोगशाला बन गया है?
पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सिंघवी इस पूरे मामले पर तीखे सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है ‘वन विभाग पिछले 20 साल से उदंती को वन भैंसों की प्रयोगशाला बना रखा है।’ उन्होंने कई उदाहरण दिए, 2006 में छोटू को बाड़े में बंद किया गया। आशा नाम की हाइब्रिड भैंस लाई गई। 2014 में क्लोनिंग का प्रयोग दीप आशा नाम की मुर्रा भैंस जो आज भी रायपुर जंगल सफारी में कैद है। 2018 में रम्भा और मेनका को खरीदा गया। करोड़ों रुपये खर्च कर हाइब्रिड बच्चे पैदा करवाए गए, फिर उन्हें रिजर्व से बाहर रिलोकेट कर दिया गया। छोटू का वीर्य निकालने के लिए एक लाख रुपये का शूट लगवाया गया, जो फेल हो गया।

सिंघवी पूछते हैं अगर छोटू से प्रजनन नहीं हुआ तो वन विभाग क्या करेगा? असम से 2020 और 2023 में मादाएं लाई गई थीं, तो उन्हें 6 साल पहले छोटू के पास क्यों नहीं लाया गया? अधिकारी सो रहे थे क्या? उन्होंने यह भी सवाल किया कि 2026 से 2030 तक हर साल 10 वन भैंसे असम से लाए जाएंगे लेकिन बारनवापारा में कैद बचे हुए चार वन भैंसों और उनके बच्चों का क्या होगा? प्रस्ताव में उनका जिक्र तक नहीं है।
वन विभाग का पक्षवन विभाग का कहना है कि इसका मकसद वन भैंसों की संख्या बढ़ाना है, जो सराहनीय प्रयास है। 17 गांवों के स्थानीय लोग भी छोटू और प्रजाति संरक्षण के लिए अपनी जमीन छोड़ने को तैयार हैं। हाल के वर्षों में सुरक्षा स्थिति सुधरने के बाद यह कदम उठाया जा रहा है।









