रायपुर। छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास के खिलाफ जारी मुहिम को 30 साल पूरे हो गए। यह अभियान दिसंबर 1995 में शुरू किया था डॉ. दिनेश मिश्र ने, जिसका नाम दिया गया था “कोई नारी टोनही नहीं”। उस समय जादू-टोने के शक में महिलाओं पर रोजाना अत्याचार होते थे। महिलाओं को टोनही (डायन) कहकर मारपीट, बहिष्कार और यहां तक कि हत्या तक की जाती थी।
इस समस्या को देखकर डॉ. मिश्र ने अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति बनाई। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों में वैज्ञानिक सोच जगाना, निर्दोष महिलाओं को बचाना और ठगों को सजा दिलाना था। समिति ने कभी भी सरकार या किसी से अनुदान नहीं लिया, सब कुछ अपनी मेहनत से किया।

डॉ. मिश्र ने बताया कि जादू-टोना का कोई अस्तित्व नहीं है, कोई महिला टोनही नहीं होती। बीमारियां बैक्टीरिया-वायरस से होती हैं, चमत्कार से नहीं। आज भी सामाजिक बहिष्कार जैसी बुराइयों के खिलाफ काम जारी है।
डॉ. मिश्र ने बताया कि उन्होंने 7 किताबें लिखीं, पैंफलेट बांटे, 20 हजार से ज्यादा लेख अखबारों में छपे। कई विश्वविद्यालयों में उनके काम पर चर्चा और थीसिस हुई।
क्या-क्या किया गया?

हजारों गांवों में 5000 से ज्यादा सभाएं की गईं, लाखों ग्रामीणों से मिलकर जागरूकता फैलाई। स्कूलों, कॉलेजों, एनएसएस-एनसीसी कैंपों में व्याख्यान और कार्यशालाएं हुईं। 3000 से ज्यादा टोनही प्रताड़ना के मामलों में पीड़ित महिलाओं से मिलकर मदद की, इलाज कराया और पुनर्वास में सहायता दी।
छत्तीसगढ़ सरकार से लगातार मांग की गई, जिसके 10 साल के प्रयास से 2005 में छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम बना और लागू हुआ। छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश, ओडिशा, असम, राजस्थान जैसे कई राज्यों में व्याख्यान दिए।
असम में डायन प्रताड़ना कानून बनाने में मदद की। ठगों की पोल खोली, उन्हें पुलिस के हवाले किया गया। त्योहारों पर विशेष अभियान चलाए, जैसे हरेली की रात गांव भ्रमण, रक्षाबंधन पर पीड़ित महिलाओं से राखी बंधवाना, गणतंत्र दिवस पर सम्मान, होली में कुरीतियों की होली जला कर लोगों को जागरूक किया गया।









