बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह जिला नालंदा सोशल मीडिया और समाचार पत्र की सुर्खियों में है। 26 मार्च की शाम 6 से 7 बजे के बीच बिहार के नालंदा जिले स्थित अजयपुर गांव में तीन युवकों ने कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से 20 वर्षीय महिला के साथ छेड़छाड़ की और बलात्कार का प्रयास किया। सोशल मीडिया पर यह वीडियो काफी वायरल हो रहा है। 42 सेकंड के वीडियो को 3 क्लीप में वायरल किया गया। यह घटना मणिपुर की उस कुख्यात घटना की याद दिला रही है, जिसमें महिलाओं के साथ सार्वजनिक रूप से अभद्रता की गई थी।
वायरल वीडियो का पूरा सच
वायरल वीडियो के मुताबिक गांव के दबंग अशोक यादव, मतलू महतो और रविकांत कुमार महिला को जबरन पकड़कर सड़क पर घसीटा, उसके साथ अभद्रता की और कपड़े फाड़ने की कोशिश की। आरोपियों के साथ पीछे बड़ी संख्या में लोग चल रहे हैं। इस दौरान महिला मदद के लिए चिल्लाती रही, लेकिन मौजूद लोग तमाशबीन बने रहे।
ग्रामीणों के मुताबिक युवती का पति बिहार से बाहर पुणे में काम करता है। कथित तौर पर लड़की को बंद कमरे में एक युवक के साथ कथित आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। शादीशुदा होने के बावजूद पर-पुरुष से संबंध बनाने का आरोप लगाया और वहशी भीड़ उस पर टूट पड़ी!
पीड़ित महिला ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि, “मैं अपना मोबाइल रीचार्ज कराने गई थी, तभी ग्रामीणों ने मुझे मोबाइल रिपेयर करने वाले तकनीशियन के साथ देख लिया। उन्हें शक हुआ कि हमारे बीच संबंध है। जल्द ही भीड़ इकट्ठा हो गई और दुकान का गेट बाहर से बंद कर दिया गया। मेरे समुदाय के लोग वहां पहुंचे, जिसके बाद मुझे उत्पीड़न और शारीरिक हमले का सामना करना पड़ा। मैं खिड़की के रास्ते दुकान से बाहर निकलने में सफल रही, लेकिन कुछ लोगों ने मुझे जबरन शादी करने के लिए मजबूर किया और माथे पर जबरदस्ती सिंदूर लगाने की कोशिश की। मैं रोती रही और गिड़गिड़ाती रही कि मैं शादी नहीं कर सकती।”
‘समाज और गांव के लोग मुझे सजा देने वाले कौन होते हैं?’ वह सवाल करती है।
मुजफ्फरपुर की रहने वाली नेहा महिला अधिकारों से संबंधित एनजीओ में काम कर चुकी है। वह बताती है कि, ‘गांव में अबला स्त्री पर बदचलन होने का आरोप लगा दिया जाता है। यदि वह विधवा है तो बदचलन के साथ-साथ उसे डायन भी करार दे दिया जाता है। खासकर समाज में रह रही अकेली स्त्री का हाल तो उस कहावत की तरह है कि गरीब की जोरू सबकी भोजाई। समाज आज उस मोड़ पर पहुंच गया है जहां स्त्री सिर्फ काम वासना की वस्तु रह गई है।’
महिला की गरिमा से जुड़ी गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है। थाना केस संख्या-194/2026 में भारतीय न्याय संहिता की धारा 74, 75, 76, 115(2), 126(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया।
नालंदा के वीभत्स मामले में पूरी रात पुलिस की छापामारी चली है। पुलिस ने सात लोगों को उठाया है, महिला को पहचान के लिए एसपी दफ्तर बुलाया गया। इस मामले में आरोपी दो व्यक्तियों अशोक यादव और मतलू महतो उर्फ नवनीत कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया है। तीसरा व्यक्ति रविकांत कुमार फरार है। डीजीपी ने इस मामले में गिरफ्तार अभियुक्तों का स्पीडी ट्रायल चलाने का आदेश दिया है। एक सप्ताह के अंदर सभी को सजा मिल जाए इसके लिए लोक अभियोजक से लेकर विधि विशेषज्ञों की एक पूरी टीम को लगाया गया है।
न्यायिक व्यवस्था व्यवहार में अक्सर जाति-आधारित ढाँचों से प्रभावित
दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे पंकज कुमार का शोध कार्य भारतीय समाज में जाति पर केंद्रित है। वह बताते हैं कि, “वर्तमान समय में दलितों की तुलना में अतिपिछड़ी जातियों के भीतर असुरक्षा की भावना अधिक गहरी है। उनके लिए सुरक्षा एक केंद्रीय प्रश्न है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था व्यवहार में अक्सर जाति-आधारित ढाँचों से प्रभावित है। संस्थाओं के भीतर जातियाँ किस प्रकार काम करती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। नालंदा की घटना में पीड़ित महिला प्रजापति समुदाय से है जबकि आरोपित व्यक्ति अहिर और कुर्मी-धानुक समुदायों से बताए जा रहे हैं। इस प्रकार की घटनाओं में जो दुस्साहस दिखाई देता है वह अक्सर एक व्यापक जातीय नेक्सस से उत्पन्न होता है जिसकी जड़ें राजनीति, संस्थागत पहुंच और आर्थिक संरचनाओं तक फैली हैं।

मिथिला छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष आदित्य मोहन कहते हैं कि, “नालंदा ज्ञान की धरती कही जाती थी, नीतीश कुमार का गृह जिला है। लेकिन जिस तरह की घटना सामने आई है वो न केवल वीभत्स है बल्कि घृणित और शर्मनाक है। इसने पूरे बिहार को शर्मसार किया है।
नालंदा मणिपुर बन गया। सरेआम सड़क पर एक महिला को सामूहिक रूप से दबोचना, कपड़े फाड़ना और मॉलेस्टेशन। सामूहिक दुष्कर्म का प्रयास हुआ, लड़की का चिल्लाना सुनकर लोग दौड़े तो अपराधी भागे। अपराधियों की हिम्मत देखिए कि इसका वीडियो बनाकर भी उन्होंने वायरल किया। ये सब हो गया और नालंदा की पुलिस ने क्या किया? नालंदा की पुलिस ने मामले को दबा देने के लिए सामान्य छेड़खानी का चार्ज लगाया है।”
लेखक आदित्य कुमार गिरी लिखते हैं कि हमारी सरकार गोरक्षा करती है स्त्री रक्षा नहीं। सरकार की पार्टी से संबंधित बीसियों संगठन हैं जो देशभर में हिन्दू जगाते हैं, गोरक्षा करते हैं, मुसलमानों से सामान न खरीदने के लिए जागरूक करते हैं, मस्जिदों के सामने से शोभायात्रा निकालते हैं लेकिन स्त्री रक्षा के लिए कोई संगठन या इकाई नहीं बनाते। नालंदा में जो हुआ, आपको याद होगा मणिपुर में भी एक स्त्री को नग्न करके भीड़ घुमा रही थी। हाथरस में भी रेप हुआ। उत्तराखंड में अंकिता भंडारी का मसला हो। सरकार से जुड़े लोग स्त्री मुद्दों पर कुछ नहीं करते।
विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने कानून व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि, “यह सामूहिक बलात्कार का प्रयास था। महिला के साथ दुर्व्यवहार करने वालों ने उसके कपड़े फाड़ दिए। यह बिहार में चरमराई हुई कानून व्यवस्था की भयावह तस्वीर पेश करता है।”
नालंदा जैसी घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमने तरक्की तो बहुत की है, लेकिन इंसानियत और सभ्यता अब भी अधूरी है।











