ग्रेट निकोबार परियोजना पर पुस्तक का लोकार्पण, ‘विकास मॉडल’ पर उठाए गए बड़े सवाल

कोलकाता। ग्रेट निकोबार द्वीप (Great Nicobar) पर प्रस्तावित मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को लेकर पर्यावरणीय, सामाजिक और आदिवासी अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर 21 जून को कोलकाता में आयोजित एक सार्वजनिक बैठक के दौरान परियोजना पर आधारित एक पुस्तक का लोकार्पण किया गया था।

पीपुल्स अलायंस फॉर इकोलॉजिकल एंड डेमोक्रेटिक सॉलिडैरिटी (PAEDS) द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम दोपहर 3 बजे कृष्णपदा घोष मेमोरियल ट्रस्ट, सूर्य सेन स्ट्रीट में हुआ था। इसमें पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और विभिन्न वर्गों के लोगों ने भाग लिया।

कार्यक्रम में पुस्तक के माध्यम से ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़े उन पहलुओं को सामने रखने का प्रयास किया गया, जिन पर आयोजकों का मानना है कि अब तक पर्याप्त सार्वजनिक चर्चा नहीं हुई है।

वक्ताओं ने कहा कि पुस्तक केवल परियोजना का विरोध नहीं करती, बल्कि विकास के मौजूदा मॉडल पर गंभीर सवाल उठाती है। पुस्तक में पूछा गया है कि क्या आर्थिक विकास के नाम पर जैव विविधता, प्राचीन वर्षावनों, समुद्री पारिस्थितिकी और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की अनदेखी की जा सकती है?

इसमें ग्रेट निकोबार को दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से एक बताते हुए लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार मेगापोड, कोरल रीफ और शॉम्पेन व निकोबारी समुदायों के जीवन, संस्कृति और अस्तित्व पर संभावित प्रभावों का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

पुस्तक यह भी सवाल उठाती है कि क्या इस परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक परिणामों पर पर्याप्त सार्वजनिक विमर्श और लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय पर्यावरणीय न्याय, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को विकास का आधार बनाया जाना चाहिए।

बैठक के बाद 22 जून को धर्मतल्ला (मेट्रो सिनेमा के सामने) एकजुटता सभा का भी आयोजन किया गया, जहां विभिन्न संगठनों और नागरिकों ने ग्रेट निकोबार के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के समर्थन में अपनी एकजुटता व्यक्त की।

हालांकि, केंद्र सरकार इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक महत्व और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक मानती है, जबकि पर्यावरण समूह इसके संभावित प्रभावों पर व्यापक सार्वजनिक बहस की मांग कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now