सम्राट चौधरी के सीएम बनते ही जग्गी वासुदेव को बिहार में करोड़ों की जमीन 15 रूपये में

नई दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव में NDA को भारी बहुमत से मिली जीत के बाद पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बधाई देने वालों में आध्यात्मिक गुरु एवं ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव का भी नाम था। तत्कालीन मुख्यमंत्री को बकायदे पत्र लिखकर वासुदेव ने एनडीए सरकार की जीत को बिहार की जनता के विश्वास का प्रतीक बताया था।अब बिहार सरकार ने मुंगेर में जग्गी वासुदेव को 99 एकड़ जमीन एक रुपए प्रति एकड़ की दर से लीज पर दे दी है।

15 रुपए में दे दी गई 15 एकड़ जमीन

नीतीश कुमार के जाते ही और सम्राट चौधरी के आते ही मुंगेर में योग सेंटर बनाने के लिए 15 एकड़ जमीन 99 साल की लीज पर दी है। 1 रुपए में 1 एकड़ जमीन दी गई।

इससे पहले पटना में श्मशान घाट भी जग्गी वासुदेव के फाउंडेशन को दे दिया गया। बताया जा रहा है कि जो जमीन दी जा रही है वो करोड़ों में है और उसका कुल रकबा 15 एकड़ है।

मुंगेर में बनेगा योगी शिविर

कल ही सम्राट चौधरी की कैबिनेट में यह आदेश पास हुआ है। जिसके अंतर्गत मुंगेर जिले के तेलडीहा में उस जमीन पर योग सेंटर बनेगा उस मुंगेर में जहां देश भर से लोग योग सीखने आते हैं। पत्रकार पंकज झा लिखते हैं कि ईशा फांउडेशन को जो जमीन दी गई है,सरकार ने इसी साल 2.64 करोड़ खर्च करके उसका अधिग्रहण किया है। तेलडीहा का प्रसिद्ध मंदिर यहां है। दुर्गा पूजा में लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। सम्राट चौधरी इसी इलाके के विधायक है।बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर के बदले ईशा फ़ाउंडेशन को लगभग फ़्री में ज़मीन देने का फ़ैसला हो गया।

नई नहीं है गुरुओं की पैठ

योग, और अध्यात्म के नाम पर सत्ता के शीर्ष गलियारों में संतों और गुरुओं की पैठ नई नहीं है, लेकिन सुशासन का दावा करने वाली बिहार सरकार द्वारा जिस तरह सद्गुरु और उनके अभियानों को लेकर पलक-पावड़े बिछाए जा रहे हैं, उसने राज्य की प्राथमिकताओं पर गंभीर नीतिगत और नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

सम्राट का समर्पण आलोचना के घेरे में नीतियां

​कुछ समय पहले तक पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सद्गुरु के बीच भाषाई और वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आए थे। हिंदी को लेकर हुए विवाद में सद्गुरु ने बिहार के मुख्यमंत्री को नसीहत तक दे डाली थी। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और सम्राट चौधरी की ताजपोशी के बाद इस समीकरण में बड़ा यू-टर्न देखा गया है। चुनावी जीतों पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान से शुरू हुआ यह सिलसिला अब सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और संसाधनों के आवंटन के आरोपों तक पहुंच गया है।

कार्पोरेट शैली में काम करते जग्गी

​आलोचकों का कहना है कि सरकार पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चलने वाले ईशा फाउंडेशन के ‘कावेरी कॉलिंग’ या ‘मिट्टी बचाओ’ (Save Soil) जैसे वैश्विक अभियानों को बिहार में सरकारी मंच और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने में जरूरत से ज्यादा उदारता दिखा रही है।​बिहार जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े और बाढ़-सूखे की विभीषिका से हर साल जूझने वाले राज्य में जहां स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी ढांचे दम तोड़ रहे हैं, वहां एक कॉर्पोरेट शैली में चलने वाले आध्यात्मिक संगठन को तरजीह देना जनता के साथ छलावा माना जा रहा है।

​योग की आड़ में कॉर्पोरेट एजेंडा

​सद्गुरु के अभियानों की आलोचना केवल बिहार में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी होती रही है। जानकारों का एक बड़ा धड़ा ईशा फाउंडेशन के वृक्षारोपण मॉडल को ‘अवैज्ञानिक’ और ‘कॉर्पोरेट पीआर’ का हिस्सा मानता है वहीं योग सेंटर को छलावा।

बिहार सरकार द्वारा बिना किसी गहन वैज्ञानिक समीक्षा के इन अभियानों का हिस्सा बनना राज्य की नीति के खोखलेपन को उजागर करता है। सरकार योग प्रशिक्षण और ‘जल-जीवन-हरियाली’ जैसे अपने खुद के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स को मजबूत करने के बजाय बाहरी संस्थाओं को अपनी साख का इस्तेमाल करने की छूट दे रही है।

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