बिहार: 85 विधायक और 12 लोकसभा सांसदों के नेता कैसे बिहार की कुर्सी छोड़ने राजी हो गए?

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“नीतीश कुमार को 2025–30 के लिए लेकर आए थे, ये धोखेबाजी है। “राज्यसभा जाना है तो निशांत कुमार जाएं। हम लोग स्वागत करते हैं, लेकिन नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के हम लोग खिलाफ है।”

“नीतीश कुमार के खिलाफ षड्यंत्र किया जा रहा है। दावा किया कि शराब माफिया और पार्टी के कुछ नेता जो है वो नीतीश कुमार को दिल्ली भेजना चाह रहे हैं।”

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की खबर के बाद जदयू  के नाराज कार्यकर्ता सुबह-सुबह सीएम आवास के बाहर जुट प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है। 

होली के अगले दिन यानी 5 मार्च को 11 बजने में कुछ मिनट पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करके बताया कि वे राज्यसभा जा रहे हैं। उन्होंने लिखा कि वो इसलिए राज्यसभा जा रहे हैं, क्योंकि अब तक उन्होंने तीन सदनों लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद का प्रतिनिधित्व किया है। इस चौथे और उच्च सदन में जाने की उनकी अभिलाषा शेष थी, इसलिए वे वहां जा रहे हैं। आसान भाषा में कहें तो वे अब बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे।

दिल्ली के हाथों में होगी शासन की बागडोर

इस सबके बाद सबके जेहन में यह सवाल उठ रहा है कि महज तीन महीने पहले बंपर जीत हासिल कर दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार, जिनकी पार्टी के पास 85 विधायक, 12 लोकसभा और चार राज्यसभा सांसद हैं। बिहार ही नहीं, केंद्र की सत्ता की चाबी भी उनके हाथ में मानी जाती है। कुर्मी जैसी स्वजाति जाति के अलावा राज्य की 36 फीसदी अतिपिछड़ी जातियों और 50 फीसदी महिलाओं का मजबूत समर्थन उनके पास है। फिर उन्होंने अचानक बिहार की सत्ता छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला क्यों लिया?

जदयू की ओर से राज्यसभा के लिए दो नाम तय माना जा रहा था। पहला, रामनाथ ठाकुर, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे, पिछले दो टर्म से राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं। दूसरा नाम नीतीश कुमार के बेटे निशांत का था, जिनकी एक-सवा साल से राजनीति में एंट्री और पिता की विरासत संभालने की अटकलें चल रही थी।

हाल ही इन चर्चाओं को बल तब मिला जब नीतीश के करीबी मंत्री श्रवण कुमार और अशोक कुमार चौधरी ने मीडिया को पुष्टि दी कि होली के बाद निशांत का राजनीतिक सफर शुरू हो जाएगा। लेकिन 3 मार्च के दोपहर होते-होते सीएम हाउस का माहौल उलट गया। जदयू की राज्यसभा उम्मीदवार सूची में देरी होने लगी और अंदरूनी खबरें आईं कि बीजेपी ने साफ संदेश दिया कि नीतीश जी को अब कुर्सी छोड़ देनी चाहिए।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के नामांकन की बात कहने के साथ ही यह तय हो गया है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है। हिंदी पट्टी का यह इकलौता सूबा है जहां भाजपा न कभी सरकार बना पाई, न ही उसका मुख्यमंत्री बन सका। हालांकि अब इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि राज्य में पहली बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना सकती है।  मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नीतीश कुमार के पद छोड़ने की चर्चा के साथ ही नए मुख्यमंत्री को लेकर भी कई नामों की चर्चा शुरू हो गई है। वहीं जदयू के कुछ नेता चाहते हैं कि नीतीश कुमार यदि दिल्ली जाते हैं, तो निशांत कुमार को सीएम पद की जिम्मेदारी सौंपी जाए। अब बिहार की राजनीति का एक नया दौर शुरू होने वाला है, जहाँ शासन की बागडोर दिल्ली के हाथों में होगी।

बिहार में राजनीति किस तरफ जा रहा?

दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे पंकज कुमार का शोध कार्य भारतीय समाज में जाति पर केंद्रित हैं। वह बताते हैं कि,”बिहार की वर्तमान राजनीतिक स्थिति यह संकेत दे रही है कि सत्ता और प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया अब ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित हो रही है। दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र का वास्तविक लोकतंत्रीकरण हो रहा है।

बिहार की राजनीति पहले सवर्ण वर्चस्व के चरण से निकलकर ओबीसी चरण में पहुंची थी, लेकिन अब यह ओबीसी राजनीति की अंतिम पंक्ति तक आ गई है। मानो वह त्रिवेणी संघ की सामाजिक सीढ़ी के आखिरी पायदान को छू रही हो। यह स्थिति एक ओर ओबीसी राजनीति के एक ऐतिहासिक चरण के समापन का संकेत देती है, तो दूसरी ओर एक नए सामाजिक-राजनीतिक उभार की भूमिका भी तैयार कर रही है। दरअसल, यह परिवर्तन अति पिछड़े वर्गों की राजनीति के उभरते हुए चरण का संकेत है।”

राजनीति पर लिखने वाले प्रतिक पटेल बताते हैं कि,”जब तक राजद मजबूत थी, नीतीश कुमार मजबूत थे, भाजपा जब भी आंख दिखाती थी, कूद के इधर आ जाते थे। राजद कमजोर हुई, नीतीश कुमार खत्म ही हो गये। लालू जी ने सिर्फ खुद 15 साल राज नहीं किया, नीतीश जी को 20 साल राज करने का रास्ता भी तैयार किया। समाजवादी राजनीति को समझने वाले कुर्मी मित्र लोग उस दिन ज्यादा दुखी थे किसी भी राजद कार्यकर्ता से जिस दिन राजद की 25 सीट आई थी। उनको उस दिन ही समझ में आ गया था कि चाचा अब खत्म हो चुके हैं।”

बहुजन लेखक क्रांति कुमार बताते हैं कि,”नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन पत्र पर दस्तखत नही किया है, बल्कि नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक करियर को सरेंडर करने के लिए कागज पर दस्तखत किया है। बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार अधिकारी को उठाकर इधर उधर फेंक सकते हैं।

गरीबों के लिए योजना लागू कर सकते हैं। बिहार का पत्ता भी नीतीश कुमार को पूछ कर हिलेगा। राज्यसभा एमपी बनकर नीतीश कुमार केवल बोल सकते हैं। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना केवल उनके राजनीतिक करियर का पतन नही बल्कि बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति का भी पतन है।” 

बिहार के प्रसिद्ध ब्लॉगर और लेखक रंजन ऋतुराज बताते हैं कि,”नीतीश जी के मुख्यमंत्री काल के शुरुआती दौर में तत्कालीन एडीजी मुख्यालय सह कानून व्यवस्था अभयानंद सर से मेरी बात कभी हुई तो वो यही कहते थे की सीएम 16-16 घंटे काम करते हैं। नवंबर 2005 से अगले पाँच साल का कड़ी मेहनत का नतीजा था कि सन 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश जी के अगुवाई वाली गठबंधन को 3/4 सीट मिली।

बिहार के नए मुख्यमंत्री को बिहार में नीतीश के सन 2005 से 2010 वाली कार्य संस्कृति वापस लानी होगी। तभी हम सबसे निचले पायदान से ऊपर उठ सकते हैं। यह एक टॉप डाउन प्रोसेस है जिसे किसी भी हाल में नए मुख्यमंत्री को अपनाना ही होगा।” 

युवा हल्ला बोल के संस्थापक और कांग्रेस के नेता अनुपम बताते हैं कि, “नीतीश कुमार के बयान को पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे कि यह भाजपा ऑफिस से लिखकर भेजा गया हो! वरना नीतीश कुमार के कद का नेता खुद से क्यों लिखेंगे कि मैं “राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूं..” वो भी उस बिहार की सत्ता को छोड़कर जिसके लिए उन्होंने ना जाने कितने यूटर्न मारे।

सच ये है कि मोदी ने अंततः नीतीश जी के साथ भी वही किया जो हर उस आदमी के साथ करते हैं जिसने कभी इनका साथ दिया हो, चाहे शिंदे हो, नवीन पटनायक, केसीआर, महबूबा मुफ्ती, चौटाला, ठाकरे, वसुंधरा राजे, धनखड़, जोशी या आडवाणी। आने वाले समय में योगी आदित्यनाथ और गडकरी जैसों की भी बारी आएगी।”  

राजद की प्रवक्ता प्रियंका भारती बताती हैं कि,”भाजपा रूपी सांप्रदायिक बबूल को नीतीश जी ने ही बिहार में पाला पोसा ,उसे बड़ा किया, बिहार की मिट्टी में उसे पनपने दिया, इतिहास आपको इसी रूप में याद रखेगा।” 

खबरें हैं कि अब नीतीश के बेटे निशांत कुमार राजनीति में कदम रखने वाले हैं। लेकिन निशांत का स्वभाव बिल्कुल अलग माना जाता है। उनकी रुचि अध्यात्म में रही है। उन्होंने अपनी आधी उम्र तो गुजार ही ली है, पर सियासत कभी उनके जीवन का हिस्सा नहीं बनी। एकांतप्रिय यह शख्स राजनीतिक रणभूमि में कैसे उतरेगा? 

उतरेगा तो कितनी दूर तक टिक पाएगा,यह बड़ा सवाल है। उससे भी बड़ा सवाल है कि जदयू का भविष्य क्या? क्या नीतीश के बाद भी पार्टी प्रासंगिक बनी रहेगी? या धीरे-धीरे BJP की छाया बनकर रह जाएगी? सियासत का एक पुराना उसूल है कि हर दौर का अपना नायक होता है। कभी लालू का जमाना था, फिर नीतीश का। अब पाटलिपुत्र की मिट्टी पर नया अध्याय शुरू हो रहा है। अंजाम क्या होगा? वक्त ही बताएगा… खुदा ही जाने।

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