भूपेंद्र यादव के स्टाफ को हटाए जाने के बीच अशोक खेमका ने उठाया अरावली का सवाल

नई दिल्ली। सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अशोक खेमका (Ashok Khemka) ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के निजी स्टाफ के चार अधिकारियों को हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया पर सरकार से जवाबदेही की मांग की है। यही नहीं, खेमका ने इस मामले को अरावली में खनन से भी जोड़ा है। खेमका ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री का भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ संदेश सही मायने में लागू किया जा रहा है तो कार्रवाई केवल मंत्री के स्टाफ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

अपनी पोस्ट में खेमका ने सवाल उठाया कि पर्यावरण मंत्रालय के उस सचिव के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जिसने कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय में अरावली मामले में एक अहस्ताक्षरित (unsigned) समिति रिपोर्ट पेश की। खेमका का आरोप है कि इस रिपोर्ट से अरावली क्षेत्र में पर्यावरणीय सुरक्षा कमजोर हुई और इससे खनन तथा रियल एस्टेट हितों को लाभ मिल सकता है। उन्होंने कहा कि “जवाबदेही आधे रास्ते पर नहीं रुकनी चाहिए।”

अशोक खेमका ने अपनी पोस्ट में सचिव के नाम का जिक्र नहीं किया है। केंद्र सरकार ने हाल ही में पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के कार्यालय से निजी सचिव, सहायक निजी सचिव और दो अतिरिक्त निजी सचिवों सहित चार अधिकारियों को हटा दिया। हालांकि सरकार ने इस कार्रवाई का आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया है। जिन अधिकारियों को हटाया गया वे हैंः


अमर सिंह (निजी सचिव) यह 2010 बैच के आईआरएस (IRS) अधिकारी थे, जिन्हें प्रशासनिक आधार पर उनके मूल विभाग (राजस्व विभाग) में वापस भेज दिया गया है।

शैलेश कुमार सिंह (अतिरिक्त निजी सचिव) यह केंद्रीय सचिवालय सेवा (CSS) के अधिकारी थे, जिन्हें समय से पहले उनके मूल कैडर (DoPT) में वापस भेज दिया गया है।

आयुष शरण (अतिरिक्त निजी सचिव) यह राजनीतिक नियुक्त थी। उनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई हैं। सिद्धार्थ यादव (सहायक निजी सचिव) यह भी राजनीतिक नियुक्त थी। उन्हें तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया गया है।

क्या है अरावली मामला?

अरावली पर्वतमाला देश की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में है और दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के पर्यावरणीय संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। हाल के विवाद में आरोप है कि मंत्रालय की एक समिति की रिपोर्ट ने संरक्षित क्षेत्रों की व्याख्या को कमजोर किया, जिससे खनन गतिविधियों को राहत मिल सकती है। इस मुद्दे पर पर्यावरणविदों और कुछ पूर्व अधिकारियों ने भी चिंता जताई है।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 6 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, हेल्थ, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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