अमेरिकन कमीशन ने RSS और RAW पर प्रतिबंध की करी सिफारिश, भारत को विशेष चिन्ता वाला देश घोषित करने की मांग

March 16, 2026 12:03 PM
RSS & RAW

नई दिल्ली। यूनाइटेड स्टेट कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम नाम के एक अमेरिकन कांग्रेस द्वारा गठित कमीशन ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानि रॉ (RSS & RAW) पर बैन लगाने की सिफारिश की है।

मोदी सरकार के आने के बाद ऐसी सिफारिश पहले भी हुई है। हालांकि इस सिफारिश पर अभी तक कभी अमल नहीं किया गया है।

अमेरिकन कांग्रेस को सिफारिश में इस सरकारी संस्था ने कहा है कि भारत को ‘विशेष चिंता वाला देश’ (Country of Particular Concern – CPC) घोषित करे क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत व्यवस्थित, निरंतर और गंभीर धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों में शामिल है या उन्हें प्रेरित करता है।

अमेरिकी कांग्रेस के सामने पेश की गई अमेरिकन कमीशन की रिपोर्ट।

अमेरिकन कमीशन ने RSS और RAW को अधिनियम के गंभीर उल्लंघनों के लिए, उनकी संपत्तियों को सीज करने और अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंधित करने की मांग की है।

भारत और अमेरिका के बीच हुई ताजा ट्रेड डील के बाद आई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी सहायता और द्विपक्षीय व्यापार नीतियों को भारत में धार्मिक स्वतंत्रता में सुधार से जोड़ा जाए साथ ही भारत के खिलाफ आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट की धारा 6 को लागू करने की बात कही गई है।

कमीशन ने अमेरिकी नागरिकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ डराने-धमकाने और उत्पीड़न के आधार पर भारत को हथियार बिक्री रोकने को भी कहा है।

रिपोर्ट में अमेरिकन कांग्रेस से मांग की गई है कि अमेरिकी कांग्रेस को चाहिए कि ट्रांसनेशनल रिप्रेशन रिपोर्टिंग एक्ट 2024 को फिर से पेश करें और पारित करें, ताकि भारतीय सरकार द्वारा अमेरिका में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली ट्रांसनेशनल दमन की वार्षिक रिपोर्टिंग हो।

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता में गिरावट

कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2025 में, भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति में निरंतर गिरावट आई, क्योंकि सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और उनके पूजा स्थलों को निशाना बनाने वाली नई विधेयक लागू किया।

कई राज्य सरकारों ने एंटी-कन्वर्जन कानूनों को मजबूत किया या नए कानूनों में कठोर जेल सजा और धर्मांतरण की व्यापक परिभाषाएं शामिल कीं।

भारतीय अधिकारियों ने नागरिकों और धार्मिक अल्पसंख्यक शरणार्थियों की व्यापक गिरफ्तारी और अवैध निष्कासन किया तथा हिंदू राष्ट्रवादी तत्वों के हमलों की अनदेखी की।

रिपोर्ट में छत्तीसगढ़,असम समेत अन्य राज्यों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि पूरे वर्ष भर, कई राज्यों में हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ों ने मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाई की जिसको लेकर उन्हें कोई सजा नहीं मिली।

रिपोर्ट कहती है कि विश्व हिंदू परिषद (VHP) के एक प्रमुख नेता ने औरंगजेब की कब्र हटाने की मांग की, जो 17वीं शताब्दी के मुगल शासक थे। इसके बाद दंगे भड़के, जिसमें दर्जनों लोग घायल हुए और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं की भी इसमें भूमिका रही।

हिंदू भीड़ की हिंसा पर उठाई अंगुलियां

जून में, ओडिशा में हिंदू भीड़ ने 20 ईसाइयों पर हमला किया, जो हिंदू धर्म में धर्मांतरण से इनकार कर रहे थे। हमलों में पुलिस हस्तक्षेप नहीं हुआ, जिससे आठ लोग घायल हुए और अस्पताल में भर्ती हुए। अप्रैल में, कश्मीर के मुस्लिम-बहुल क्षेत्र में तीन बंदूकधारियों ने हिंदू तीर्थयात्रियों पर हमला किया, जिसमें 26 लोग मारे गए।

हमलावरों ने कथित रूप से पीड़ितों से कलमा पढ़ने को कहा और जो नहीं पढ़ सके, उन्हें मार डाला। इस हमले ने भारत में मुस्लिम-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया। कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की लक्षित हत्याएं हुईं।

उत्तर प्रदेश में, हिंदू राष्ट्रवादी समूह के सदस्यों ने कश्मीर हमले में मारे गए हिंदू के बदले एक मुस्लिम रेस्तरां कर्मचारी को गोली मार दी।सरकार ने भी कथित ‘अवैध’ प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए बल का इस्तेमाल किया।

मई में, अधिकारियों ने 40 रोहिंग्या शरणार्थियों सहित कई लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें 15 भारतीय थे, और उन्हें बर्मा के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जल में छोड़ दिया गया, जहां उनके पास जीवन रक्षक जैकेट नहीं थे। जुलाई में, असम में अधिकारियों ने बंगाली-भाषी मुसलमानों को बड़े पैमाने पर निर्वासित किया, जिन्हें BJP नेताओं ने ‘घुसपैठिए’ कहा, भले ही वे भारतीय नागरिक थे।

अवैध प्रवासियों के उत्पीड़न का मुद्दा

सरकार ने ‘अवैध’ प्रवासियों को पकड़ने के लिए नए नियम और आदेश पारित किए, जिसमें विदेशी ट्रिब्यूनल को बिना उचित प्रक्रिया के गिरफ्तारी वारंट जारी करने और कथित विदेशी संदिग्धों को हिरासत केंद्रों में भेजने की शक्ति दी गई।

सरकार ने धार्मिक संस्थाओं को राज्य नियंत्रण में लाने के लिए भी कदम उठाए।

मई में, संसद ने वक्फ बिल पारित किया, जिसमें गैर-मुस्लिमों को वक्फ संपत्तियों (मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान आदि) के प्रबंधन बोर्ड में शामिल किया गया। इस बिल के जवाब में पश्चिम बंगाल में घातक विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें तीन लोग मारे गए।

सुप्रीम कोर्ट ने बिल के कुछ प्रावधानों पर फैसला करने के लिए सुनवाई की, जिसमें सरकार को विवादित संपत्ति के वक्फ होने की संख्या तय करने का अधिकार शामिल था। उसी महीने, उत्तराखंड विधानसभा ने अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USAME) अधिनियम पारित किया, जिससे मदरसा बोर्ड भंग हो गया और मदरसे तथा अन्य संस्थान राज्य नियंत्रण में आ गए, जिसमें सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भी शामिल हैं।

वक्फ कानून का जिक्र

रिपोर्ट कहती है कि भारतीय सरकार कई भेदभावपूर्ण कानून लागू करती है जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं, जिनमें विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA), 1967 के गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 2019 नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), 2025 वक्फ बिल और 2025 आप्रवासन और विदेशी विधेयक शामिल हैं।

उमर खालिद और शरजील का मामला

कमीशन कहता है कि इसके अलावा, सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों को जेल में डालने के लिए किया, जैसे उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य।

2020 CAA विरोध प्रदर्शनों में शामिल जगर सिंह जोहल को पांच साल तक बिना मुकदमे के जेल में रखा गया, जबकि एक जिला अदालत ने उन्हें ‘आतंकवादी’ गिरोह का सदस्य होने के आरोप से बरी कर दिया।

मार्च में, साजिश के आरोप में ब्रिटिश नागरिक को आठ महीने तक हिरासत में रखा गया।

मई में, एक मुस्लिम विश्वविद्यालय प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को सोशल मीडिया पर टिप्पणियों के लिए भारतीय न्याय संहिता के तहत गिरफ्तार किया गया।

सितंबर में, पुलिस ने उत्तर प्रदेश में ‘आई लव मुहम्मद’ पोस्टर लगाने वाले व्यक्तियों को गिरफ्तार किया, जिससे कई राज्यों में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। कश्मीर में पुलिस ने 401 मुसलमानों के खिलाफ मामला दर्ज किया।

पूर्व में गुजरात दंगों के आधार पर अमेरिकी विदेश विभाग ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का डिप्लोमैटिक वीजा रद्द कर दिया था। यह प्रतिबंध 2014 में प्रधानमंत्री बनने तक जारी रहा।​अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने तो अपनी वार्षिक रिपोर्ट्स में कई बार भारत को “विशेष चिंता वाले देश” (CPC) की श्रेणी में डालने और आरएसएस व कुछ नेताओं पर सेंक्शन लगाने का सुझाव दिया है। 2015 में एक सिख संगठन (SFJ) ने अमेरिका में आरएसएस को “आतंकी संगठन” घोषित करने की याचिका दी थी, जिसे ओबामा प्रशासन ने खारिज कर दिया । पूर्व बीजेपी की विदेशी शाखा ‘ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी’ को अमेरिका में ‘विदेशी एजेंट’ के रूप में पंजीकरण करने का निर्देश दिया गया था।
नहीं भुला जाना चाहिए की कमीशन की सिफारिशें केवल सलाहकारी होती हैं; अंतिम निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति और विदेश मंत्रालय का होता है, जिन्होंने अब तक प्रतिबंध लगाने से इनकार किया है।

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