तृणमूल का नाम-चिह्न गया, नंदीग्राम में उम्मीदवार ने भी नाम वापस लिया; ममता ने कहा- ‘हम झुकेंगे नहीं’

कोलकाता। बंगाल की राजनीति में 18 सितंबर का दिन तृणमूल कांग्रेस के लिए घटनाओं से भरा रहा। एक तरफ चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के पुराने नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न को आगामी उपचुनावों के लिए अस्थायी तौर पर फ्रीज कर दिया, तो दूसरी तरफ नंदीग्राम से ममता बनर्जी गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया। नामांकन वापसी के बाद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का ऐलान किया।

नंदीग्राम में 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। यह सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के दो विधानसभा क्षेत्रों—नंदीग्राम और भवानीपुर—से जीतने के बाद नंदीग्राम सीट छोड़ने से खाली हुई है। नंदीग्राम पहले से ही बंगाल की सियासत में खास महत्व रखता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने यहां ममता बनर्जी को बेहद करीबी मुकाबले में हराया था। इस बार उपचुनाव से पहले घटनाक्रम ने मुकाबले को और पेचीदा कर दिया है।

उम्मीदवार बनीं, फिर अचानक मैदान से बाहर

ममता गुट ने नंदीग्राम से शिक्षिका और स्थानीय कार्यकर्ता संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया था। 18 सितंबर को वह अपने पति सत्यजीत के साथ राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंचीं और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने मीडिया से कहा कि वह मुख्यमंत्री से आशीर्वाद लेने गई थीं। इसके कुछ घंटे बाद उन्होंने नंदीग्राम से अपना नामांकन वापस ले लिया। चूंकि नामांकन वापसी की अंतिम तारीख निकल चुकी है, इसलिए ममता गुट अब इस सीट पर अपना नया उम्मीदवार नहीं उतार सकता।

इस घटनाक्रम के बाद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल और कांग्रेस लंबे समय से अलग-अलग चुनाव लड़ते रहे हैं। ममता ने इसे व्यापक विपक्षी एकजुटता और भविष्य के गठबंधन के संदर्भ में भी पेश किया।

एक दिन में चुनाव आयोग का बड़ा फैसला

इसी बीच चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों में पार्टी के पुराने नाम और ‘फूल-घास’ वाले पारंपरिक चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया। आयोग ने कहा कि दोनों पक्ष पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा कर रहे हैं और उपचुनाव से पहले विवाद का अंतिम निपटारा संभव नहीं है। इसलिए अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों को अलग पहचान दी गई।

इसके बाद ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी चुनाव चिह्न मिला, जबकि ऋतब्रत बनर्जी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ और लिफाफा चिह्न आवंटित किया गया। यह व्यवस्था फिलहाल संबंधित उपचुनावों के लिए लागू है।

ममता ने कहा- ‘हम झुकेंगे नहीं’

चुनाव आयोग के फैसले और अपनी उम्मीदवार के नामांकन वापस लेने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने आयोग और भाजपा पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने आयोग के फैसले को लोकतंत्र के लिए ‘काला दिन’ बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी न झुकेगी और न पीछे हटेगी। उन्होंने पुराने चुनाव चिह्न और पार्टी की पहचान को लेकर कानूनी और राजनीतिक लड़ाई जारी रखने की बात कही।

ममता ने आरोप लगाया कि भाजपा उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रही है और तृणमूल के बागी नेताओं को भाजपा का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में हुए पार्टी विभाजनों का भी संदर्भ दिया। इन आरोपों पर भाजपा और चुनाव आयोग का पक्ष अलग है; चुनाव आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में दोनों गुटों को समान अवसर देने और आगामी चुनावी प्रक्रिया को स्पष्ट रखने की बात कही है।

ममता ने नंदीग्राम में कांग्रेस के समर्थन के साथ-साथ असम की नगांव सीट पर भी कांग्रेस को समर्थन देने की बात कही। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व से उनकी बातचीत हुई है और नंदीग्राम का फैसला भविष्य की विपक्षी एकजुटता के लिए संदेश है। उन्होंने यह भी कहा कि वह लड़ाई जारी रखेंगी और पार्टी की मूल पहचान वापस पाने के लिए आगे की कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेंगी।

अब नंदीग्राम में मुकाबला किनके बीच?

ममता गुट की उम्मीदवार के नामांकन वापस लेने के बाद नंदीग्राम में अब भाजपा की हासिरानी रथ, कांग्रेस के मिलन प्रधान, डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के मोहम्मद एतेशामुल हक और सीपीआई के शांति गोपाल गिरी मैदान में बताए जा रहे हैं। ममता गुट का उम्मीदवार अब इस मुकाबले का हिस्सा नहीं है।

नंदीग्राम का यह उपचुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि यहां मुकाबला सिर्फ एक विधानसभा सीट का नहीं रह गया है। एक तरफ तृणमूल के भीतर नाम और चुनाव चिह्न को लेकर संघर्ष है, दूसरी तरफ ममता गुट ने अपनी उम्मीदवार के हटने के बाद कांग्रेस का समर्थन चुना है। अब 6 अक्टूबर की वोटिंग और 9 अक्टूबर की मतगणना बताएगी कि इस बदले हुए समीकरण का चुनावी असर क्या रहता है।

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