नई दिल्ली | मलबे में दबे छात्रों कें घरों से आ रही निरंतर फोन कॉल से बेचैन छात्र कभी सत्य निकेतन (Satya Niketan)के मलबे के ढेर तो कभी AIIMS के ट्रामा सेंटर में बेसब्री से इधर से उधर घूमते हैं। उनके हाथ ने तस्वीरें हैं कान में सेलफोन। सीएम रेखा गुप्ता देर रात काफी देर तक खड़ी रहती हैं फिर मलबे के किनारे ही जमीन पर बैठ जाती हैं। मीडिया के कैमरे देर रात तक दृश्यों और उनके पीछे देखने की कोशिश कर रहे हैं। युवाओं, छात्रों में एमसीडी को लेकर बेहद गुस्सा है। अब तक छह की मौत हो चुकी है।
छात्रों युवाओं के साथ भेड़ बकरियों का व्यवहार
सत्य निकेतन में बिल्डिंग का गिरना सिर्फ एक घटना भर नहीं है यह दिल्ली एनसीआर में चहुंओर उग आए छात्रों ,युवाओं के शोषण, उत्पीड़न, सरकार की अनदेखी और मकान मालिकों की बदनीयती की वह कहानी है। जिसे सुनकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जायेंगे। सत्य निकेतन की घटना बताती है कि सरकार और प्रशासन ने बच्चों को भेड़ बकरी समझ रखा है न तो आसमान छूते किराए के नियमन को लेकर कोई प्रणाली विकसित है न तो इन इमारतों में सुरक्षा इंतजाम को लेकर कोई सिस्टम है।
समाचार एजेंसी एएनआई ने एम्स के हवाले से बताया कि हादसे में मरने वालों की संख्या 6 हो गई है।एम्स के मुताबिक़ ट्रॉमा सेंटर में 10 लोगों को लाया गया जिनमें से पांच की पहले ही मौत हो चुकी थी. गंभीर रूप से घायल एक व्यक्ति की बाद में मौत हो गई।तीन लोगों का इलाज चल रहा था और एक घायल को मामूली चोटों के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
AIIMS से लेकर सत्य निकेतन तक कोहराम
न्यूज आउटलेट द प्रिंट युवराज नाम के एक युवक की कहानी बताता है। मध्य प्रदेश के देवास से आए आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज के छात्र, सुबह की ट्रेन से दिल्ली पहुंचे थे। उनके सहपाठी युवराज ने कहा, “उसने मुझे बताया था कि थोड़ा आराम करेगा और फिर हम मीका सिंह के आने वाले कॉन्सर्ट के टिकट बुक करेंगे।”युवराज को सुबह करीब 10:30 बजे की बातचीत के बाद से शिवम से कोई खबर नहीं मिली।युवराज ने बताया, “दोपहर में उसकी मां ने फोन कर कहा कि आखिरी बार शिवम से करीब 1 बजे बात हुई थी, उसके बाद से वह उससे संपर्क नहीं कर पा रही हैं।” चिंतित होकर वह सत्य निकेतन पहुंचा अपने दोस्त का हाल जानने। लेकिन वहां पहुंचने पर उसे सिर्फ मलबा, एम्बुलेंस और मलबे के नीचे फंसे लोगों को निकालने की कोशिश करते आपातकालीन कर्मी दिखे।
जब शिवम के फोन पर संपर्क नहीं हो सका तो युवराज बचाव दल के अधिकारियों के पास गया। उन्होंने उसे अस्पतालों में जांच करने को कहा।युवराज ने कहा, “मैं आर्मी हॉस्पिटल, सफदरजंग और AIIMS गया लेकिन किसी को पता नहीं कि वह कहां है।” वह अभी पीपी एमएलभी AIIMS ट्रॉमा सेंटर के वेटिंग रूम में खबर का इंतजार कर रहा था।AIIMS के प्रवक्ता ने पुष्टि की है कि रविवार शाम तक मलबे के नीचे से निकाले गए 10 लोगों में से कम से कम चार को अस्पताल पहुंचते ही मृत घोषित कर दिया गया और एक की चोटों के कारण भर्ती होने के बाद मौत हो गई।
बढ़ सकती है मरने वालों की संख्या
इस बिल्डिंग के गिरने को लेकर तमाम तरह के दावे किए जा रहे हैं। बताया जाता है कि इन इमारतों को 100 साल की लीज़ पर दिया गया है। अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए वे लोग नीचे बेसमेंट बना रहे थे. उन्होंने ऊपर की बिल्डिंग मज़बूत कर दी, लेकिन नीचे के पिलर कमज़ोर थे। जिसकी वजह से वह बिल्डिंग गिरी है। बताया जा रहा है कि जिस वक्त घटना घटी उस वक्त बिल्डिंग में कई मज़दूर काम कर रहे थे वो सभी दब गए हैं। साथ ही बिल्डिंग के सामने फल वगैरह बेचने वाले रेहड़ी पटरी वाले भी थे वो भी दब गए हैं ।
मकान मालिक के खिलाफ मुकदमा
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया है। दिल्ली पुलिस ने इमारत के मालिक हरिराम और अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 हत्या की कोटि में न आने वाला आपराधिक मानव वध,290 यानि लापरवाही से निर्माण कार्य और 125(ए) जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कार्य के तहत FIR दर्ज की है।
ट्रामा सेंटर में आवाजाही पर रोक
AIIMS अधिकारियों ने अस्पताल भवन और वेटिंग सेंटर को अलग करने वाली गली में आवाजाही सीमित कर दी है। यहां घंटों से छात्र एक ही मांग कर रहे थे: “कृपया हमें अंदर जाने दें।”भीड़ में खड़े आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज के एक छात्र अपने दोस्त अर्पित जाज को ढूंढ रहे थे। उन्होंने कहा, “दोपहर 2 बजे उसके मां का फोन आया कि अर्पित पीजी में है। तब से मैं हर जगह पूछता रहा हूं लेकिन पता नहीं वह कहां है।” यह कहते हुए वह रो पड़े।उनके दोस्त के अनुसार जॉर्ज मध्य प्रदेश से हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षा उनके लिए सपने से भी बड़ी बात थी।दोस्त ने कहा, “अस्पताल अधिकारियों ने मुझे अज्ञात लोगों की तस्वीरें दिखाईं लेकिन वे सब पहचान से परे हैं, मुझे अब कुछ समझ नहीं आ रहा।
कुछ मरे कुछ की मौत का इंतजार
थोड़ी दूरी पर मोतीलाल नेहरू कॉलेज के छात्र कृष खड़े थे। वे अपने बचपन के दोस्त अभिषेक कुमार को ढूंढने आए थे, जो मूल रूप से वाराणसी के हैं। कृष ने कहा, “वह हॉस्टल डेज की पांचवीं मंजिल पर रहता था। मैंने उसे कई बार उस जगह को छोड़ने को कहा था क्योंकि हालत खराब थी, लेकिन वही उसकी जेब में आता था।कृष ने कहा, “वे अभिषेक से खाने-रहने का 15,000 रुपये लेते थे और चूंकि दूसरी किसी पीजी में इससे ज्यादा लगता, इसलिए वह वहीं रहता रहा।
”चार घंटे से ज्यादा इंतजार के बाद अस्पताल अधिकारियों ने कृष को बताया कि अभिषेक गंभीर हालत में हैं और उन्हें दिमाग में गंभीर चोट लगी है। लेकिन वह अपने दोस्त को इस हालत में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। उन्होंने कहा कि बचने की संभावना कम है लेकिन मैं उसे ऐसे नहीं देख सकता, इसलिए तब तक इंतजार करूंगा जब तक वह बेहतर न हो जाएं।









