नेशनल ब्यूरो। दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तीन शिक्षाविदों पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया। कोर्ट ने उन्हें कक्षा 8 की NCERT पाठ्यपुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” कि सामग्री से न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश करने के लिए जिम्मेदार ठहराया। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह उन सोशल मीडिया शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा जो इस आपत्तिजनक सामग्री का समर्थन करके न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
तीन शिक्षाविदों को सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों और परियोजनाओं से किसी भी काम से प्रतिबंधित कर दिया गया है। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमलया बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की बेंच ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह ऐसे सोशल मीडिया तत्वों की पहचान करे।
NCERT ने बताया कि विवादित अध्याय Textbook Development Team (TDT) द्वारा तैयार किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्रोफेसर मिशेल डैनिनो ने की थी और इसमें सुपर्णा दिवाकर तथा आलोक प्रसन्ना कुमार शामिल थे। इन तीनों को भविष्य में NCERT की किसी भी गतिविधि से जुड़ने की अनुमति नहीं होगी।
बेंच ने कहा कि ये तीनों या तो न्यायपालिका के बारे में उचित जानकारी नहीं रखते थे या जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश करके कक्षा 8 के छात्रो के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की। सुप्रीम कोर्ट ने सभी सरकारों और सरकारी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं को निर्देश दिया कि वे तुरंत इन तीनों से संबंध तोड़ लें। कोर्ट ने कहा, “हमें कोई कारण नहीं दिखता कि ऐसे लोगों को बच्चों के पाठ्यक्रम तैयार करने या पाठ्यपुस्तक अंतिम रूप देने जैसे किसी काम से जोड़ा जाए।”
कोर्ट ने केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, विश्वविद्यालयों और सरकारी फंड वाली सार्वजनिक संस्थाओं को आदेश दिया कि वे इन तीनों से तुरंत अलग हो जाएं और उन्हें कोई जिम्मेदारी न सौंपें जिसमें सार्वजनिक धन शामिल हो।हालांकि, कोर्ट ने तीनों को आदेश में संशोधन की गुहार लगाने का विकल्प दिया। वे सुप्रीम कोर्ट में आकर अध्याय “The Role of Judiciary in Our Society” में भ्रष्टाचार के जिक्र की व्याख्या दे सकते हैं।
कोर्ट ने कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, वेबसाइट्स और व्यक्तियों पर कड़ी नाराजगी जताई जो NCERT पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार के जिक्र का बचाव कर रहे थे। कोर्ट ने कहा, “26 फरवरी के आदेश जिसमें पूरी पाठ्यपुस्तक के प्रसार पर रोक लगाई गई थी के बाद कुछ तथाकथित सोशल मीडिया तत्वों ने गैरजिम्मेदार व्यवहार किया। हम बैल को सींगों से पकड़ने में विश्वास रखते हैं। हम केंद्र सरकार को निर्देश देते हैं कि ऐसे साइट्स, उन्हें चलाने वाले व्यक्तियों की पूरी जानकारी दे ताकि हम उचित कार्रवाई कर सकें। कानून को इन शरारती तत्वों के खिलाफ अपना रास्ता अपनाना चाहिए।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया ने न्यूटन के नियम को फिर से परिभाषित कर दिया है कि हर क्रिया के लिए समान और विपरीत प्रतिक्रिया” की जगह हर क्रिया के लिए असमान और मूर्खतापूर्ण अतिरिक्त प्रतिक्रिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि उसके 26 फरवरी और आज के आदेश “न्यायपालिका की संस्थागत कार्यप्रणाली की वस्तुनिष्ठ और वैध आलोचना को रोकने के लिए नहीं हैं। न्यायपालिका भी किसी अन्य संस्था की तरह कमियों से ग्रस्त है और यदि कोई विशेषज्ञ समिति ऐसी कमियों को उजागर करती है तो यह राष्ट्र की भावी पीढ़ी भावी जजों और वकीलों सहित अन्य के लिए स्वागत योग्य कदम होगा।”
लेकिन कोर्ट ने NCERT के इस रुख पर असहमति जताई कि विवादित अध्याय को विवाद के बाद उचित रूप से फिर से लिखा गया है। बेंच ने कहा कि NCERT एक के बाद एक जल्दबाजी में कदम उठाकर मामले को और जटिल बना रहा है और छात्रों तक न्यायपालिका की पारदर्शी जानकारी पहुंचने में बाधा डाल रहा है।
मेहता ने आश्वासन दिया कि पुराने अध्याय चार का कोई हिस्सा नई पाठ्यपुस्तक में शामिल नहीं किया जाएगा।बेंच ने आश्चर्य जताया कि National Syllabus and Teaching Learning Material Committee में कोई ज्यूरिस्ट या कानूनी क्षेत्र का व्यक्ति शामिल नहीं है ।
कोर्ट ने कहा कि विवादित अध्याय का संशोधित संस्करण तब तक पाठ्यपुस्तक में शामिल नहीं किया जाएगा जब तक डोमेन विशेषज्ञों की समिति द्वारा अनुमोदित न हो जाए, जिसमें पूर्व जज, प्रसिद्ध शिक्षाविद और विख्यात कानून व्यवसायी शामिल हों।
बेंच ने कहा, “यह सराहनीय होगा यदि केंद्र सरकार एक सप्ताह के भीतर डोमेन विशेषज्ञों की समिति गठित करे और इसमें भोपाल की National Judicial Academy को भी शामिल किया जाए ताकि NCERT द्वारा प्रस्तावित विधि अध्ययन पाठ्यक्रम कक्षा 8 और उच्च कक्षाओं के लिए को अंतिम रूप दिया जा सके।”








