खांटी कम्युनिस्ट अच्युतानंदन को पद्म विभूषण और केरल की सियासत में छिपा संदेश!

January 27, 2026 2:40 PM
Achuthanandan

लेंस डेस्क। वीएस अच्युतानंदन… केरल की राजनीति का वह नाम, जो दशकों तक खांटी कम्युनिस्ट, वर्ग संघर्ष, जमीन–मजदूर के सवाल और संघ–भाजपा के वैचारिक विरोध का प्रतीक रहा। 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद बनी सीपीआई(एम) की पहली पीढ़ी के आखिरी दिग्गजों में शामिल अच्युतानंदन को जब मोदी सरकार ने मरणोपरांत पद्म विभूषण देने का फैसला किया, तो केरल की राजनीति में स्वाभाविक रूप से हलचल मच गई।

इस साल दिए गए पांच पद्म विभूषणों में से तीन केरल से हैं। माकपा का चेहरा वी.एस. अच्युतानंदन, आरएसएस से जुड़े पी. नारायणन और न्यायपालिका से  केटी थॉमस।

लेकिन इनमें से जो सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह है इस सूची में वीएस अच्युतानंदन का नाम।

यह महज एक सम्मान नहीं, बल्कि केरल के राजनीतिक इतिहास और वर्तमान टकरावों के संदर्भ में एक बड़ा सवाल है- आखिर संघ और भाजपा, जिनका माकपा से राज्य में हिंसक और वैचारिक संघर्ष रहा है, वे अच्युतानंदन जैसे नेता को दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान देकर क्या संदेश देना चाहती हैं?

आइए मोदी सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस फैसले के पीछे की राजनीति को एक–एक कर समझते हैं।

वी.एस. अच्युतानंदन का जन्म 1923 में अलाप्पुझा के पुन्नाप्रा में हुआ। वे उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने पुन्नाप्रा–वायलार आंदोलन, मजदूर और किसान आंदोलनों और बाद में 1964 के पार्टी विभाजन के बाद माकपा की वैचारिक जमीन को खड़ा किया।

वे सिर्फ संगठनकर्ता नहीं थे, बल्कि माकपा की नैतिक और वैचारिक आवाज माने जाते थे। 2006 से 2011 तक मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। जमीन घोटालों और रियल एस्टेट लॉबी पर सवाल उठाए और अपनी ही पार्टी के भीतर ताकतवर गुटों से टकराने से भी परहेज नहीं किया।

यही वजह थी कि वे जनता में बेहद लोकप्रिय रहे, लेकिन पार्टी के भीतर हमेशा असहज नेता बने रहे।

केरल उन गिने–चुने राज्यों में है जहां आरएसएस–भाजपा और माकपा के बीच दशकों से जमीनी स्तर पर हिंसक टकराव होते रहे हैं- खासतौर पर कन्नूर जैसे इलाकों में। राजनीतिक हत्याएं, कार्यकर्ताओं पर हमले और संगठनात्मक वर्चस्व की लड़ाई यह सब केरल की राजनीति का कड़वा सच रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व लगातार कम्युनिस्टों को ‘विकास विरोधी’, ‘हिंसा की राजनीति करने वाला’ और ‘राष्ट्रविरोधी सोच’ वाला बताकर हमलावर रहा है।

खुद अच्युतानंदन हमेशा ही स्पष्ट तौर पर संघ और भाजपा के खिलाफ वैचारिक विरोध की पार्टी की लाइन के ही साथ रहे। वे आरएसएस को ‘समाज को बांटने वाली और सांप्रदायिक ज़हर फैलाने वाली ताकत’ बताते रहे। भाजपा को लेकर उनका साफ कहना था कि ‘यह पार्टी केरल की धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील राजनीति के बिल्कुल खिलाफ है।‘

ऐसे नेता को पद्म विभूषण देना अपने आप में वैचारिक विरोधाभास पैदा करता है।

तीन महीने बाद केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यह चयन यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार केरल की राजनीति को सिर्फ भाजपा बनाम माकपा के टकराव में नहीं देख रही, बल्कि एक विरोधियों को सम्मान देने वाला नया नैरेटिव गढ़ना चाहती है।

लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है।

वी एस अच्युतानंदन सीपीएम में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के मुखर विरोधी माने जाते थे।

इन दोनों कम्युनिस्ट नेताओं के बीच मतभेद 1990 के दशक में ही खुल कर नजर आने लगे थे।बाद में जब वीएस अच्युतानंदन मुख्यमंत्री बने तब यह टकराव और तीखा हो गया था।पार्टी के जानकार कहते हैं कि इस टकराव के पीछे दोनों ही नेताओं की व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता तो थी ही साथ है विकास के मॉडल की समझ को लेकर भी गहरे मतभेद थे।यह वह दौर था जब विजयन केरल सीपीएम के राज्य सचिव थे और अच्युतानंदन मुख्यमंत्री।

केरल में अच्युतानंदन के बहाने मोदी सरकार की पिनराई विजयन विरोधी वाम प्रगतिशील राजनीति को साधने की कोशिश मानी जा सकती है।

दूसरा बड़ा कारण स्वाभाविक रूप से जाति का मुद्दा है जिसे आमतौर पर भाजपा की चुनावी रणनीतियों के केंद्र में देखा ही जाता है।

वीएस अच्युतानंदन खुद भले ही आजीवन तमाम जातिगत अथवा धार्मिक आग्रहों,दुराग्रहों से मुक्त रहे हों लेकिन उनका जन्म जिस जाति में हुआ था वह है – एज़हावा।  जानकार बताते हैं कि पिछड़ा वर्ग के तहत आने वाली इस एज़हावा जाति की आबादी करीब पच्चीस फीसदी है । इस पुरस्कार के बहाने स्वाभाविक रूप से मोदी सरकार भावनात्मक तौर पर इतनी बड़ी आबादी को साधने की कोशिश करेगी ही।

केरल में परंपरागत रूप से मुख्य मुकाबला माकपा-नेतृत्व वाले एलडीएफ और कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच रहा है। भाजपा अब तक तीसरे स्थान पर रही है।

इन सबके अलावा, सीपीएम की परंपरागत नीति रही है कि उसके नेता सरकारी सम्मानों को स्वीकार नहीं करते।

ई.एम.एस. नंबूदरीपाद से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य तक, ऐसे उदाहरण मौजूद हैं। ऐसे में अच्युतानंदन को यह सम्मान और उनके परिवार द्वारा इसे स्वीकार करना—दोनों ही बातें राजनीतिक रूप से अहम हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह फैसला बीजेपी की ‘क्रॉस-पार्टी आउटरीच’ रणनीति और केरल में वामपंथ के नैतिक प्रतीकों को सम्मान देकर लेफ्ट के वोट बेस में सेंध लगाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

अगर पद्म विभूषण में  वीएस अच्युतानंदन के नाम को छोड़ भी दें तो भी पद्म पुरस्कारों की सूची इस बार सिर्फ उपलब्धियों की पहचान भर नहीं रह गई।

इस बार इस सूची में राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की परछाई भी नजर आ रही है। 131 पद्म पुरस्कारों की इस सूची में जहां महाराष्ट्र 15 पुरस्कारों के साथ शीर्ष पर है, वहीं तमिलनाडु (13), पश्चिम बंगाल (11), केरल (8) जैसे राज्यों की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह वितरण आने वाले विधानसभा चुनावों से जुड़ा है।

खासतौर पर दक्षिण भारत के राज्यों खास तौर पर केरल  और तमिलनाडु का दबदबे से राजनीतिक संकेत साफ तौर पर समझा जा सकता है।

इस साल दिए गए 5 पद्म विभूषण पुरस्कारों में से 3 नाम केरल से हैं। केरल में तीन महीने बाद विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान का इतना बड़ा हिस्सा एक ही राज्य को मिलना, राजनीतिक दृष्टि से असामान्य माना जा रहा है।

पद्म विभूषण के अन्य नामों में हिंदी फिल्म सिनेमा के ‘ही मैन’ धर्मेंद्र हैं तो एक नाम उत्तरप्रदेश से कला क्षेत्र में बीएचयू से जुड़ी एन राजम है।

दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश से पद्म विभूषण पाने वाली वायलिन वादक एन. राजम की जड़ें चेन्नई (तमिलनाडु) से जुड़ी हैं। यानी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तमिलनाडु का प्रभाव यहां भी दिखता है।

बीजेपी लंबे समय से तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। ऐसे में कला, संस्कृति और चिकित्सा जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्रों के जरिए सॉफ्ट पॉलिटिकल मैसेजिंग को अहम माना जा रहा है।

पश्चिम बंगाल और असम, दोनों में आने वाले समय में चुनाव हैं। बंगाल में सभी 11 सम्मान पद्म श्री स्तर के हैं, जिनमें अभिनेता प्रोसेनजीत चटर्जी जैसे लोकप्रिय सांस्कृतिक चेहरे शामिल हैं—जो बताता है कि वहां सांस्कृतिक पहचान के जरिए राजनीतिक संवाद की कोशिश हो रही है।

बंगाल में फिल्मों से जुड़े लोकप्रिय लोगों का रुझान कहीं न कहीं टीएमसी की तरफ होता है, ऐसे में फिल्मों से जुड़े लोगों को चुनाव से पहले पद्म पुरस्कारों की सूची में जगह देना, यह बताता है कि टीएमसी के वोट बेस को भी भेदने की कोशिश की जा रही है।

पद्म पुरस्कारों में बस्तर का नाम भी इस बार प्रमुखता से है।

आदिवासी अंचल में मानव सेवा की मिसाल बने गोडबोले दंपत्ति डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले को भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान की घोषणा की है। मूल रूप से महाराष्ट्र के सातारा जिले के निवासी डॉ. गोडबोले दंपत्ति ने वर्ष 1990 में दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में काम करना शुरू किया। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता बुधरी ताती को पद्म पुरस्कार देने की घोषणा हुई है।

बस्तर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सल उन्मूलन अभियान चल रहा है।सरकार को इसमें बड़ी सफलता भी मिली है। यह माना जाता है कि जिस तरह नक्सल प्रभावित इलाके सरकार के एजेंडा पर हैं ऐसे में बस्तर को पद्म पुरस्कारों में प्रतिनिधित्व देना एक संदेश भी है।

कुल मिलाकर, पद्म पुरस्कारों की यह सूची चुनावी राज्यों को प्राथमिकता देने का संकेत दे रही है तो दूसरी तरफ वैचारिक विरोधियों को सम्मान देकर राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई है।

पद्म अलंकरण देश के सर्वोच्च नागरिक अलंकरण हैं। इनकी शुरुआत विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों के विशिष्ट योगदान को सराहे जाने से हुई। दरअसल मोदी सरकार ने पिछले बरसों में जिस तरह से चुनाव वाले राज्यों की हस्तियों को पद्म अलंकरण देकर राजनीतिक संदेश देने की शुरुआत की है।

यह वही रणनीति है जो पहले बिहार में कर्पूरी ठाकुर, उत्तरप्रदेश में चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं को सम्मान देकर अपनाई गई। इसलिए अच्युतानंदन के नाम को लेकर चर्चाएं हैं।

वी.एस. अच्युतानंदन को पद्म विभूषण देकर मोदी सरकार ने केरल की राजनीति में एक असहज लेकिन असरदार बहस छेड़ दी है। माकपा के वैचारिक किले में प्रतीकात्मक तौर पर सेंध लगाने की कोशिश है।

अभी इस समय तक सीपीएम की केंद्रीय समिति की प्रतिक्रिया तो नहीं आई है। परिवार ने भले ही इसे स्वीकार कर लिया हो और यह फैसला भी परिवार का ही होगा लेकिन पार्टी के होल टाइमर रहे वीएस अच्युतानंदन को लेकर सीपीएम के अपने स्टैंड  पर भी प्रेक्षकों की नजर है।

इधर इस सम्मान ने कांग्रेस को पूरे विमर्श से लगभग बाहर कर दिया है।

यह सम्मान अच्युतानंदन के संघर्ष और योगदान की मान्यता भी हो सकता है, लेकिन इसकी टाइमिंग और राजनीतिक संदर्भ इसे केरल की चुनावी सियासत से अलग नहीं होने देते।

केरल में सवाल अब यही है— क्या यह सम्मान वामपंथी विरासत को स्वीकार करने का संकेत है, या फिर वामपंथ की नैतिक पूंजी को भाजपा की राजनीतिक रणनीति में बदलने की कोशिश?

यह भी पढ़ें : 131 पद्म पुरस्कारों में धर्मेंद्र, शिबू सोरेन के अलावा बस्‍तर की सामाजिक कार्यकर्ता बुधरी ताती का नाम

दानिश अनवर

दानिश अनवर, द लेंस में जर्नलिस्‍ट के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों का अनुभव है। 2022 से दैनिक भास्‍कर में इन्‍वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग टीम में सीनियर रिपोर्टर के तौर पर काम किया है। इस दौरान स्‍पेशल इन्‍वेस्टिगेशन खबरें लिखीं। दैनिक भास्‍कर से पहले नवभारत, नईदुनिया, पत्रिका अखबार में 10 साल काम किया। इन सभी अखबारों में दानिश अनवर ने विभिन्न विषयों जैसे- क्राइम, पॉलिटिकल, एजुकेशन, स्‍पोर्ट्स, कल्‍चरल और स्‍पेशल इन्‍वेस्टिगेशन स्‍टोरीज कवर की हैं। दानिश को प्रिंट का अच्‍छा अनुभव है। वह सेंट्रल इंडिया के कई शहरों में काम कर चुके हैं।

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