प्रयागराज। Shankaracharya Controversy : ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने माघ मेले को बीच में ही छोड़ दिया है। वे संगम में स्नान किए बिना ही बुधवार सुबह प्रयागराज से वाराणसी (काशी) के लिए रवाना हो गए।
प्रयागराज छोड़ने से पहले प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि उनका मन इतना आहत और परेशान है कि वे बिना पवित्र स्नान के ही यहां से जा रहे हैं। प्रयागराज को वे हमेशा आस्था और शांति की जगह मानते आए हैं। श्रद्धा के साथ यहां पहुंचे थे, लेकिन एक ऐसी घटना हुई जिसकी उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था।
शंकराचार्य ने आगे कहा कि इस मानसिक पीड़ा को कोई नेता या राजनीतिक दल ठीक नहीं कर सकता। वे नहीं समझ पा रहे कि आखिर कौन सी पार्टी या कौन सा नेता इस दर्द को कम कर सकेगा।
माघ मेला प्रशासन ने उन्हें सम्मानपूर्वक पालकी द्वारा संगम तक ले जाने, स्नान कराने और फूलों की वर्षा करने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया। उनका कहना था कि जब मन में इतना दुख और रोष हो, तो पवित्र गंगा का जल भी चैन नहीं दे पाता।
इस फैसले से संत समाज और भक्तों में काफी चर्चा छिड़ गई है। बिना संगम स्नान के मेला छोड़ना सिर्फ उनकी निजी व्यथा नहीं दर्शाता, बल्कि आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता जैसे बड़े मुद्दों को भी उजागर करता है।
अविमुक्तेश्वरानंद काशी पहुंच चुके हैं, जबकि माघ मेला प्रशासन की ओर से इस पूरे प्रकरण पर कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है।
‘…गहरे खालीपन और उदासी के साथ लौट रहा हूं’
शंकराचार्य ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि प्रयागराज की इस पवित्र भूमि पर वे शांति और आध्यात्मिक सुकून की तलाश में आए थे, लेकिन अब एक गहरे खालीपन और उदासी के साथ लौट रहे हैं। ऐसी स्थिति जिसकी उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था। यहां जो कुछ हुआ, उसने न केवल उनकी आत्मा को गहरी चोट पहुंचाई है, बल्कि न्याय और मानवता के प्रति हम सबके विश्वास पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
संगम में स्नान करना सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि मन की गहरी शांति और संतुष्टि का रास्ता है। लेकिन आज इतना दर्द और व्यथा है कि बिना स्नान किए ही इस संकल्प को अधूरा छोड़कर जाना पड़ रहा है। जब दिल में गुस्सा और अफसोस का तूफान हो, तो पानी की ठंडक भी बेमानी लगने लगती है।
उन्होंने कहा कि न्याय की उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। हम यहां से जा रहे हैं और पीछे सिर्फ सत्य की गूंज और कई अनुत्तरित सवाल छोड़ रहे हैं, जो इस हवा में हमेशा गूंजते रहेंगे। अब बस थोड़ी शांति और अकेलेपन की जरूरत है, ताकि इस पीड़ा को अंदर तक समेटा जा सके। जिन लोगों ने हमारी इस व्यथा को महसूस किया और साथ दिया, उन सभी को दिल से धन्यवाद।






