बिलासपुर। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) की लगभग पांच एकड़ भूमि अग्रवाल समाज को देने की तैयारी की गई है। विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमेटी में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया है। अंतिम निर्णय कार्य परिषद की बैठक में लिया जाएगा।
खबर के मुताबिक, अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन की छत्तीसगढ़ प्रांतीय इकाई की ओर से विश्वविद्यालय प्रशासन से सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पांच एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था। इस प्रस्ताव को स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में मंजूरी दी गई है।
इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय परिसर में इसका विरोध शुरू हो गया है। विरोध करने वालों का कहना है कि विश्वविद्यालय की भूमि विद्यार्थियों की शिक्षा, शोध और भविष्य के विस्तार के लिए सुरक्षित रखी जानी चाहिए। उनका तर्क है कि यदि एक समाज को विश्वविद्यालय की भूमि दी जाती है तो भविष्य में अन्य संगठन और समाज भी इसी तरह की मांग कर सकते हैं।
खबर के अनुसार, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के पास कुल 556 एकड़ भूमि है। विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि इस विषय को सीधे स्टैंडिंग कमेटी के बजाय कार्यपरिषद के समक्ष रखा जाना चाहिए था, क्योंकि यह विश्वविद्यालय की संपत्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला है।
इसी बीच बहुजन साहित्य संस्थान के संजीत बर्मन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
संजीत बर्मन ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि जब से प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल ने कुलपति के रूप में पदभार संभाला है, तब से विश्वविद्यालय में शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने की बजाय परिसर को ‘धार्मिक गतिविधियों का केंद्र’ बनाने का प्रयास किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह गुरु घासीदास जी की विचारधारा के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि यदि अग्रवाल समाज को सामाजिक गतिविधियों के लिए भूमि की आवश्यकता है तो राज्य सरकार और जिला प्रशासन से जमीन उपलब्ध कराई जानी चाहिए, न कि विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए अधिग्रहित विश्वविद्यालय की भूमि का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जाए।
संजीत बर्मन ने अपने पोस्ट में यह भी लिखा कि विश्वविद्यालय की भूमि का उपयोग केवल विद्यार्थियों की शैक्षणिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, कौशल विकास और खेल गतिविधियों के लिए होना चाहिए।
उन्होंने कुलपति पर यह आरोप भी लगाया कि उनके मार्गदर्शन में संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के विपरीत धार्मिक अतिक्रमण को बढ़ावा दिया गया। उन्होंने दावा किया कि विरोध के बाद अधूरे निर्माण कार्य का उद्घाटन जल्दबाजी में कराया गया।
संजीत बर्मन ने पोस्ट में यह भी लिखा कि विश्वविद्यालय में कार्यरत अनुसूचित जाति वर्ग के अधिकारी, कर्मचारी और शिक्षकों ने इस मुद्दे पर अपेक्षित नैतिक साहस नहीं दिखाया। उन्होंने इसकी तुलना बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से करते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की।
फिलहाल इस पूरे मामले में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रशासन या कुलपति कार्यालय की ओर से संजीत बर्मन के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई पक्ष या स्पष्टीकरण जारी किया जाता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।









