रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कड़ा पत्र लिखकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु (Draupadi Murmu) के साथ हाल ही में हुए व्यवहार पर गहरी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे संवैधानिक मर्यादाओं के विपरीत बताते हुए आदिवासी समाज और मातृशक्ति का अपमान करार दिया।

मुख्यमंत्री साय ने अपने पत्र में कहा कि जनजातीय समाज से आने वाली देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के साथ किया गया यह व्यवहार केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, आदिवासी समाज और मातृशक्ति का अपमान है।
उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक परंपराएं और शिष्टाचार पूरी दुनिया में सम्मानित रहे हैं। मतभेद को मनभेद में न बदलने की संस्कृति हमारी पहचान रही है, लेकिन राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति न्यूनतम शिष्टाचार का भी पालन न किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले जनजातीय समाज से आने वाली महिला राष्ट्रपति के प्रवास के दौरान कार्यक्रम से जुड़ी व्यवस्थाओं में लापरवाही और उनका अपमान किया जाना अत्यंत निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह घटना देश के करोड़ों आदिवासियों, पिछड़ों, दलितों और मातृशक्ति की भावनाओं को आहत करने वाली है।
अपने पत्र में उन्होंने यह भी कहा कि पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी राज्य सरकार के व्यवहार को लेकर स्वयं राष्ट्रपति को अपनी पीड़ा सार्वजनिक करनी पड़ी। यह स्थिति लोकतांत्रिक इतिहास के लिए चिंताजनक है और इससे पश्चिम बंगाल जैसे प्रतिष्ठित राज्य की छवि को भी ठेस पहुंची है।
मुख्यमंत्री साय ने संदेशखाली की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वहां भी जनजातीय समाज की महिलाओं के साथ हुई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था। वंचित और जनजातीय समाज के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने ममता बनर्जी से आग्रह किया कि वे इस विषय पर देश और समाज से क्षमा मांगते हुए अपनी भूल स्वीकार करें और भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा संवैधानिक पदों के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए देश को आश्वस्त करें।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था का प्रतीक हैं और उनके सम्मान से ही लोकतंत्र की गरिमा जुड़ी हुई है। इसलिए किसी भी राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर संवैधानिक पदों का सम्मान किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जनजातीय समाज से आने वाली राष्ट्रपति के सम्मान से जुड़ा यह विषय पूरे देश की अस्मिता और स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस प्रकरण में जिम्मेदारी के साथ कदम उठाए जाना जरूरी है।










