CG NEWS : छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में रखे गए प्रसिद्ध वन भैंसे ‘छोटू’ की नस्ल शुद्धता को लेकर विवाद तेज हो गया है। वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने इसकी वैज्ञानिक जांच की मांग की, लेकिन वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे खारिज कर दिया। सिंघवी ने इसे लोकतंत्र में आम नागरिक की आवाज दबाने की कोशिश बताया है।
छोटू को ‘अंतिम शुद्ध जंगली भैंसा’ क्यों कहा जाता है?
वन विभाग छोटू को उदंती क्षेत्र का अंतिम शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा बताता रहा है लेकिन विभाग द्वारा दी गई डीएनए रिपोर्ट में सिर्फ क्षेत्र के भैंसों के आनुवंशिक आंकड़े हैं। रिपोर्ट में कहीं भी छोटू को शुद्ध नस्ल घोषित नहीं किया गया। यह रिपोर्ट भैंसों के बीच आनुवंशिक विविधता दिखाती है, न कि किसी एक जानवर की शुद्धता साबित करती है। सिंघवी का कहना है कि अगर छोटू सचमुच शुद्ध है, तो इसकी ठोस वैज्ञानिक रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय सार्वजनिक की जानी चाहिए। बिना प्रमाण के दावा वैज्ञानिक नहीं माना जा सकता।

शासन ने जांच के आदेश दिए, लेकिन..
सिंघवी ने शासन को पत्र लिखकर छोटू की शुद्धता जांचने की मांग की थी। शासन ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक को जांच के निर्देश दिए लेकिन अधिकारी ने बिना किसी नई वैज्ञानिक जांच के अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखा कि छोटू शुद्ध नस्ल का है और आगे सिंघवी के ऐसे पत्रों पर ध्यान न दिया जाए। सिंघवी ने इसे वन्यजीव प्रेमियों की आवाज दबाने की कोशिश करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग RTI में भी पूरी जानकारी नहीं दे रहा ताकि गलतियां सामने न आएं।
प्रजनन योजना और चिंताएं
वन विभाग असम से लाई गई शुद्ध नस्ल की मादा भैंसों को छोटू के साथ प्रजनन कराने की तैयारी कर रहा है। सिंघवी कहते हैं कि पहले छोटू की शुद्धता की पुष्टि जरूरी है। अगर बाद में छोटू शुद्ध नहीं निकला तो संतानें हाइब्रिड होंगी और पूरी कोशिश बेकार हो जाएगी।

छोटू की उम्र और प्रजनन क्षमता पर सवाल
दस्तावेजों में छोटू की उम्र अब भी 21 साल दिखाई जा रही है जबकि 2023 के RTI और 2025 की बैठक में भी यही दर्ज है। इससे उसकी असल उम्र 24 साल से ज्यादा हो चुकी है। जंगली भैंसे जंगल में 18-20 साल और कैद में 20-26 साल तक जीते हैं। छोटू बाड़े में है और उम्र के आखिरी दौर में पहुंच चुका है।वन्यजीव संस्थान की 2023 रिपोर्ट में पहले प्रजनन प्रयास असफल होने का जिक्र है। उम्र के कारण उसकी प्रजनन क्षमता बहुत कम हो गई है। मानव उम्र से तुलना करें तो वह 75 साल से ज्यादा के बराबर है।
विभाग से सवाल

2020 में असम से लाई गई मादा भैंसों को 6 साल तक बारनवापारा में क्यों रखा? अब अचानक छोटू से प्रजनन क्यों? 2017 में दो भैंसों को सिर्फ 27 हजार में खरीदा गया, लेकिन डीएनए जांच क्यों नहीं हुई? इनसे बने 18-20 हाइब्रिड भैंसों को वर्षों पालकर वंश वृद्धि बताया गया। अब वे कहां हैं? जांच क्यों नहीं हुई? अगर हाइब्रिड थे, तो जनता के 2.5 करोड़ रुपये क्यों बर्बाद किए? क्योंकि 2024-25 तक 2.46 करोड़ खर्च हो चुके हैं।
करोड़ों का खर्च, परिणाम शून्य?
विभाग ने हाइब्रिड भैंसों, जंगल सफारी में मुर्रा भैंसे दीप आशा और असम से लाए भैंसों पर करोड़ों रुपये खर्च किए। फिर भी कोई ठोस सफलता नहीं मिली। सिंघवी पूछते हैं कि क्या राजकीय पशु वन भैंसा के नाम पर जनता को गुमराह किया जा रहा है? यह मामला वन्यजीव संरक्षण, पारदर्शिता और सरकारी खर्च से जुड़ा है। वन विभाग की ओर से अभी कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है।









