प्रयागराज। Avimukteshwarananda controversy: माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। अब मेला प्रशासन ने दूसरा नोटिस भी जारी कर दिया है।
नोटिस में 24 घंटे के अंदर जवाब मांगते हुए चेतावनी दी गई कि संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने पर उनके शिविर को मिली सुविधाएं, जमीन आवंटन रद्द किया जा सकता है और भविष्य में माघ मेले में उनके प्रवेश पर स्थायी रोक लगाई जा सकती है। यह नोटिस उनके आश्रमों श्री शंकराचार्य आश्रम शाकंभरी पीठ, सहारनपुर और बद्रिका आश्रम हिमालय सेवा शिविर के नाम पर जारी हुआ।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष से मीडिया प्रभारी ने इसे बदले की कार्रवाई बताया और कहा कि नोटिस शिविर के पीछे चुपके से चिपकाया गया था, जिसकी जानकारी बाद में मिली। जवाब तैयार किया जा रहा है और जल्द भेज दिया जाएगा।
इसके अलावा अविमुक्तेश्वरानंद के वकील ने पहले नोटिस का जवाब दाखिल करते हुए 8 पेज का पत्र दिया, जिसमें 24 घंटे में नोटिस वापस लेने की मांग की गई। जवाब में कहा गया कि उनका पट्टाभिषेक पहले हो चुका है और प्रशासन के हवाले किए गए आदेश बाद के हैं। यदि नोटिस वापस नहीं लिया गया तो अदालत में अवमानना याचिका और अन्य कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
मौनी अमावस्या के स्नान के दिन उन्होंने पालकी (बग्घी) से संगम नोज तक जाने पर जोर दिया, जिसके कारण प्रशासन के साथ लंबी बहस हुई। करीब तीन घंटे तक दोनों पक्षों में तनातनी बनी रही। पुलिस ने बार-बार पैदल चलने की अपील की, लेकिन स्वामी जी और उनके समर्थक अपनी जिद पर अड़े रहे। इस दौरान उनके अनुयायियों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश भी की।
प्राधिकरण के अनुसार, इस हरकत से भीड़ प्रबंधन में भारी दिक्कत हुई और भगदड़ जैसी स्थिति बन सकती थी, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की जान को खतरा हो सकता था। क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा के लिहाज से यह गंभीर उल्लंघन माना गया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद खुद को शंकराचार्य बताकर बोर्ड और होर्डिंग लगाने पर भी सवाल उठाए गए, इसे अदालती निर्देशों की अवहेलना करार दिया गया।
मेला प्राधिकरण ने इस घटना पर 18 जनवरी को ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया। नोटिस में आरोप लगाया गया कि आपातकाल के लिए आरक्षित पांटून पुल नंबर 2 के बैरियर को तोड़ा गया और बिना अनुमति के भीड़भाड़ वाले रास्ते से पालकी लेकर संगम की ओर बढ़ा गया। उस समय लाखों श्रद्धालु स्नान कर रहे थे और केवल पैदल जाने की इजाजत थी। प्रशासन ने लाउडस्पीकर और वायरलेस से कई बार वाहन प्रतिबंध की घोषणा की थी।








